एआई इस्लामी इल्मी रिवायत के लिए चुनौती या सहूलियत?
✒️ मुफ्ती मुहम्मद तस्लीम उद्दीन अल-महमूदी
अस्र-ए-हाज़िर में हम जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसे बिला शुबह Digital Age या Information Era कहा जा सकता है। इस दौर में टेक्नोलॉजी ने इंसानी ज़िंदगी के हर गोशे को इस दर्जा मुतास्सिर किया है कि सोच, फहम, इब्लाग, तालीम और तहकीक के रिवायती साँचे बड़ी तेज़ी से तबदील हो रहे हैं। इल्म व तहकीक का मैदान इस तब्दीली का सबसे नुमायां मज़हर है, जहां जदीद टेक्नोलॉजी, बाल खुसूस Artificial Intelligence (AI), ने सीखने और सिखाने के तरीकों में एक इंकलाबी तब्दीली पैदा कर दी है।
इस्लामी उलूम अपनी सदियों पर मुहीत, मुस्तनद और मज़बूत इल्मी रिवायत के साथ आज भी पूरी कुव्वत के साथ मौजूद हैं। कुरान, हदीस, फिक़्ह, तफ़सीर और उसूल-ए-दीन जैसे उलूम ने उम्मत की फिक्री व अखलाकी तश्कील में बुनियादी किरदार अदा किया है। ताहम यह भी एक नाकाबिले इनकार हकीकत है कि बदलते हुए ज़माने के तकाज़े नई महारतों (Skills) और जदीद फहम का मुतालबा करते हैं। आज के दौर में अगर इस्लामी उलूम से वाबस्ता तुलबा, असातज़ा और अहल-ए-इल्म जदीद टेक्नोलॉजी और AI के बुनियादी तसव्वुरात से नावाकिफ रहें तो इल्मी दुनिया में मुअस्सिर किरदार अदा करना मुश्किल हो जाता है।
Artificial Intelligence ने मालूमात (Data) तक रसाई को न सिर्फ तेज़ (Fast Access) बल्कि मुनज़्ज़म (Organized) और मुअस्सिर (Efficient) भी बना दिया है। आज वो काम जो माज़ी में घंटों या दिनों में मुकम्मल होते थे, AI Tools की मदद से चंद मिनटों में अंजाम दिए जा सकते हैं। तहकीकी मवाद की तलाश (Research Search), हवाला जाती मवाद की तरतीब (Reference Management), तवील मकालात का खुलासा (Summarization), तर्जुमा (Translation) और हत्ता कि बसरी मवाद (Visual Content) की तैयारी तक, सब कुछ AI के दायरे-ए-कार में आ चुका है।
इसी बदलते हुए इल्मी मंज़रनामे को सामने रखते हुए यह तहरीर आवाम उन्नास, बाल खुसूस इस्लामी उलूम से वाबस्ता अफ़राद के लिए पेश की जा रही है, ताकि उन्हें मसनोई ज़ेहानत की दुनिया से इब्तिदाई मगर बामानी तारुफ़ हासिल हो सके। इस तहरीर का मकसद हरगिज़ यह नहीं कि AI को इस्लामी उलूम का मुतबादिल बना कर पेश किया जाए, बल्कि यह वाज़ेह करना है कि AI महज एक Tool है, जो अगर सही सिम्ट, दुरुस्त नीयत और इल्मी एहतिआत के साथ इस्तेमाल किया जाए तो तालीम व तहकीक में मुआविन साबित हो सकता है।
आज ChatGPT जैसे AI Platforms के ज़रिए इल्मी मज़ामीन के इब्तिदाई खाके तैयार किए जा सकते हैं, तवील तहकीकी मकालात का खुलासा बनाया जा सकता है, और पेचीदा मौजूआत को आसान ज़बान में समझा जा सकता है। इसी तरह Image Generation Tools के ज़रिए दरसी और दावती मकासिद के लिए मियारी Visual Material तैयार किया जा सकता है, जबकि Translation Software मुख्तलिफ ज़बानों के इल्मी ज़खीरे को एक दूसरे के करीब ला रहा है, जिस से इल्मी रसाई (Academic Reach) में गैर मामूली वुसअत पैदा हुई है।
ताहम इस सारी तरक्की के बावजूद एक निहायत अहम पहलू है जिसे नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता, और वो है Ethical Responsibility और इल्मी एहतिआत। मसनोई ज़ेहानत से हासिल शुदा मालूमात को बिला तहकीक कुबूल करना इल्मी दियानत के मुनाफी है। यह बात ज़ेहन नशीन रहनी चाहिए कि AI न तो वही है और न ही मासूम उन अल खता। यह महज इंसानी डेटा पर मबनी एक निज़ाम (System) है, जिस में गलती, कमी और खामी का इमकान हमेशा मौजूद रहता है। इस लिए इस्लामी उलूम के हवाले से AI से हासिल करदा हर बात को मुस्तनद मसादिर, मोतबर कुतुब और अहल-ए-इल्म की आरा की रोशनी में जांचना नागुज़ीर है।
दर हकीकत टेक्नोलॉजी बजात-ए-खुद न खैर है न शर, बल्कि इस का इस्तेमाल (Usage) ही इसे फायदा मंद या नुकसानदेह बनाता है। अगर AI को दीनी उसूलों, इल्मी शफ्फाफियत और तकवा के साथ अपनाया जाए तो यह तदरीस, तहकीक और दावत के मैदान में एक मज़बूत मुआविन साबित हो सकता है, और अगर इसे अंधा धुंध इख्तियार किया जाए तो यह फिक्री इंतशार और इल्मी कमज़ोरी का सबब भी बन सकता है।
यह तहरीर जदीद टेक्नोलॉजी और इस्लामी इल्मी रिवायत के दरमियान एक फिक्री मुकालमा (Intellectual Dialogue) कायम करने की एक अदना सी कोशिश है, ताकि हम जदीद ज़राए से इस्तेफादा करते हुए भी अपनी दीनी शनाख्त, इल्मी वकार और फिक्री ज़िम्मेदारी को महफूज़ रख सकें। इन शा अल्लाह आइंदा इक़साट में Artificial Intelligence के मुख्तलिफ पहलूओं, इस के अमली इस्तेमाल (Practical Applications), मुमकिना फवाइद व खतराट, और इस्लामी उलूम में इस के मोहतात और मुफीद इतलाक को मरहला वार और तफसील के साथ बयान करने की कोशिश की जाएगी, ताकि कारी न सिर्फ इस मौजू को बेहतर तौर पर समझ सके बल्कि उसे दुरुस्त सिम्ट में इस्तेमाल करने के काबिल भी हो सके।