सदा-ए-कलम: लफ़्ज़ों से तब्दीली का सफ़र


तहरीर: मोहम्मद मसूद रहमानी अररियावी


कलम महज लकड़ी या प्लास्टिक का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि ये शऊर की वो ज़बान है जो खामोश हो कर भी बोलती है।

"सदा-ए-कलम" सिर्फ एक प्लेटफार्म का नाम नहीं है, बल्कि ये उन जज़्बों, फिक्रों और एहसासात की पुकार है जो मुआशरे में मुसबत तब्दीली लाना चाहते हैं।

एक लिखारी के लिए सबसे बड़ी ख़ुशी ये होती है कि उसे कोई ऐसा गोशा मयस्सर आए जहां वो अपने ख्यालात को बगैर किसी खौफ के, दियानतदारी के साथ रक़म कर सके।

सदा-ए-कलम ने हमें वो गोशा फराहम किया है। यहां का हर मज़मून, हर तहरीर और हर लफ़्ज़ एक चिराग़ की मानिंद है, जो जहालत के अंधेरों को मिटाने और इंसानियत को सही रास्ता दिखाने की कोशिश करता है।

मेरा इस प्लेटफार्म से जुड़ने का मक़सद महज लिखना नहीं, बल्कि अपने अल्फाज़ के ज़रिये टूटे हुए दिलों को जोड़ना, भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाना और उम्मत-ए-मुस्लिमा के इत्तेहाद की बात करना है। मैं समझता हूं कि अगर हमारा कलम किसी की इस्लाह नहीं कर सकता, तो वो महज स्याही का ज़िया है।

आइए! इस प्लेटफार्म के ज़रिये हम ये अहद करें कि हम जो भी लिखेंगे, वो सच्चाई पर मबनी होगा, जिस में नफरत के बजाए मोहब्बत की खुशबू होगी और जिस का मक़सद सिर्फ और सिर्फ रज़ा-ए-इलाही और इंसानियत की फलाह होगा।

हर्फ-ए-हक़ से है इबारत मेरी पहचान यहां

मैं "सदा-ए-कलम" से लिखता हूं दिल का अरमान यहां

✍️ मोहम्मद मसूद रहमानी अररियावी

(तालिब-ए-इल्म व मज़मून निगार)