हज़ारहा वाक़िआत, लाखों इल्मी नुकात इस छोटी सी जगह में समा जाते हैं, दिमाग़ का ख़ास्सा है, हाफ़िज़े की खुसूसियत है, जिस क़दर थकेगा, काम में लगेगा, इस्तेमाल में आएगा उसी क़दर क़वी होगा, अपने जौहर दिखाएगा, अगर इसे अली हालह छोड़ दिया जाए, इस्तेमाल न किया जाए तो कुंद ज़ेहनी मुक़द्दर है!
उलमाए अज़ाम की सवानह उमरी बताती है कि मुसलसल मुताला हाफ़िज़े को मज़बूत से मज़बूत तर बना जाता है!
आज नई टेक्नोलॉजी की सहूलत पसंदी बिला वास्ता तख़लीक़ी सलाहियतों पर शबख़ूँ मार रही है, क़लम व हर्फ़ ना आश्ना अफ़राद भी अदीब बने बैठे हैं, तहक़ीक़ी ज़ौक़ मानद पड़ रहा है, शरई मसाइल और फ़तावा में सेहत व सुक़म का इम्तियाज़ नापैद है, अदना फ़िक्र व ख़याल भी मसनोई ज़हानत की नज़र हो रहा है, कुछ सोचना हो या लिखना हो, औराक़ में छुपे इल्म के मोती तलाश करना हो, क्या ज़रूरत है कि ज़हमत उठाई जाए? ए आई मौजूद है, चंद सेकंड में सारा मवाद खिदमत आलिया में मौजूद होता है, अगर इस तहक़ीक़ के लिए तग व दौ की जाती, औराक़ छाने जाते, वरक़ गर्दानी की जाती, कुतुब खानों का चक्कर लगाया जाता तो दुरुस्त मवाद के साथ हज़ारहा तजरबे हाथ लगते!
अफ़सोस है, हैरत है कि एक साहिब तहक़ीक़, उसूल करखी की इबारत चैट जी पी टी पर तलाश करते हैं, उसी पर एतमाद करते हैं और जब तलाश करने के लिए निकलते हैं तो पूरी किताब में इबारत कहीं दस्तयाब नहीं होती, एक बड़ा तबक़ा है जो अपना हर मज़मून इसी की ज़कात व खैरात और भीक से लिखा करता है, हर हर्फ़ इसी का मिन्नत कश है, जब भी तक़रीर बनानी हो, मज़मून लिखना हो, या छोटी सी एला निया तहरीर लिखनी हो, वो कश्कोल बह दस्त चैट जी पी टी की खिदमत में मौजूद होता है, वो खुश फ़हमी में मुब्तिला हैं कि हम इल्मी अदबी तहरीर लिख रहे हैं, लोग तारीफ कर रहे हैं, लेकिन अहले ज़ौक़ दो सतर पढ़ कर उकता जाते हैं, उसलूब खुश्क से खुश्क तर होता है, सबसे बड़ी वजह ये है कि जब तक तहरीर में खून जिगर शामिल नहीं होगा, कारी पर खातिर ख़्वाह असर नहीं हो सकता!
इक़बाल की ज़बानी ये हक़ीक़त बारहा सुनी गई है कि
*दिल से जो बात निकलती है असर रखती है*
*पर नहीं ताक़त परवाज़ मगर रखती ये*
मगर ए आई की बनावटी तहरीर बे असर, बे एतबार और ला हासिल ये, सिर्फ़ ज़ेहनी अय्याशी और वक़्ती खुश फ़हमी के सिवा और कुछ भी नहीं!
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का उसलूब बला का सहर अंगेज़ था क्यों? हर लफ़्ज़ दिल की गहराई से निकलता है, इब्नुल हसन अब्बासी कुद्दस सिर्रहू ने वाक़िया नक़ल किया है कि एक अंग्रेज़ी मज़मून का तर्जुमा करते करते आँख से अश्क जारी हुए, इस क़दर आँसू बहते कि तर्जुमा शुदा वरक़ भीग जाता, तहरीर मिट जाती, दोबारा तर्जुमा करते लेकिन खुद पर क़ाबू रखना मुश्किल हो जाता, बड़ी मुश्किल से उन्होंने तर्जुमा मुकम्मल किया फिर रिसाले में शाए किया, और हम हैं कि माइक में चंद लफ़्ज़ कह कर आर्डर देते हैं और चंद सेकंड में तहरीर नुमूदार हो जाती है, अदना कोशिश से भी गुरेज़ां हैं, असर अंगेज़ी कहाँ से आएगी?
जब तक खून जिगर न हो, जहद मुसलसल न हो, फन व हुनर पर दस्तरस सिर्फ़ ख़याल है, ला हासिल ख़्वाब है!
इस पर भी इक़बाली फ़िक्र मशहूर है!
*रंग हो या खिशत ओ संग, चंग हो या हर्फ़ ओ सौत*
*मोजज़ए फन की है ख़ून जिगर से नुमूद*
एक शागिर्द सालहा साल उस्ताद की सोहबत उठाता है, मशीनी हुनर सीखने वाला धक्के खाता है, गालियाँ सुनता है, रोज़ ओ शब मेहनतें करता है, एक मुहक़्क़िक़ एक लफ़्ज़ की तहक़ीक़ के लिए हज़ाराहा सफ़हात खंगाल लेता है, एक मुहद्दिस एक लफ़्ज़ समझने के लिए बादिया पैमाई करता है, दूर दराज़ का सफ़र करता है, तब जाकर उन्हें कुछ हाथ आता है!
*बे कोशिश व जहद समर किस को मिला है*
*बे खून पिए लुक़्मा तर किस को मिला है ?*
ए आई की अफ़ादियत से इनकार नहीं , बेशुमार काम पलक झपकते अंजाम पा रहे हैं, वो तन तनहा पूरी टीम का काम कर रहा है, लेकिन इस हक़ीक़त का भी एतराफ़ करना होगा कि हज़ारहा मेहनत तलब तख़लीक़ी सलाहियतें जो जहद मुसलसल से हासिल हुआ करती थीं, आज उन का दौर ख़त्म होने को है, दुनिया में इंक़लाबात आते हैं, ईजादात का ज़माना आता है तो लोग एतदाल से मुनहरिफ़ हो जाते हैं।
आज ज़रूरत है एतदाल की, टेक्नोलॉजी के दुरुस्त इस्तेमाल की, याद रखना चाहिए कि हर वो इस्तेमाल जो फ़िक्र व अमल में सुस्ती और कम कोशी की तरफ़ ले जाए उस से हज़ार क़दम दूर रहना है, हम हर फ़िक्री काम के लिए ज़ेहन को ज़हमत फ़िक्र दें,
वरक़ गर्दानी दरकार हो तो फौरन किताब की तरफ़ रुजू करें, किसी लफ़्ज़ की तहक़ीक़ दरकार हो या हदीस का हवाला दरकार हो, खुद मक़दूर भर मेहनत करें, अपने मज़ामीन और इल्मी उमूर अज़ खुद अंजाम दें, सिर्फ़ दुनियावी उमूर में, किसी नए मक़ाम नई टेक्नोलॉजी के तार्रुफ़ के लिए महदूद इस्तेमाल करें!
मेरे उस्ताद मोहतरम ने बहुत पहले ख़बरदार किया था, कि इल्मी उमूर के लिए, तहक़ीक़ी कामों के लिए हरगिज़ इसे इस्तेमाल न करना
ज़ेहन सुस्त पड़ जाएगा, ज़ौक़ मुताला कम से कम तर हो जाएगा , फ़िक्री कुव्वत मानद पड़ जाएगी, तख़लीक़ी सलाहियतों को जंग लग जाएगा!
खुदाए करीम राह एतदाल मयस्सर करे... !
✍🏻अबुल फ़ज़ल हैदरीؔ
खुदाई कुदरत की अज़ीम तर निशानी इंसानी दिमाग़ है जो ख्यालात का महवर और वक़ाए की हिफ़ाज़त गाह है
हज़ारहा वाक़िआत, लाखों इल्मी नुकात इस छोटी सी जगह में समा जाते हैं, दिमाग़ का ख़ास्सा है, हाफ़िज़े की खुसूसियत है, जिस क़दर थकेगा, काम में लगेगा, इस्तेमाल में आएगा उसी क़दर क़वी होगा, अपने जौहर दिखाएगा, अगर इसे अली हालह छोड़ दिया जाए, इस्तेमाल न किया जाए तो कुंद ज़ेहनी मुक़द्दर है!
उलमाए अज़ाम की सवानह उमरी बताती है कि मुसलसल मुताला हाफ़िज़े को मज़बूत से मज़बूत तर बना जाता है!
आज नई टेक्नोलॉजी की सहूलत पसंदी बिला वास्ता तख़लीक़ी सलाहियतों पर शबख़ूँ मार रही है, क़लम व हर्फ़ ना आश्ना अफ़राद भी अदीब बने बैठे हैं, तहक़ीक़ी ज़ौक़ मानद पड़ रहा है, शरई मसाइल और फ़तावा में सेहत व सुक़म का इम्तियाज़ नापैद है, अदना फ़िक्र व ख़याल भी मसनोई ज़हानत की नज़र हो रहा है, कुछ सोचना हो या लिखना हो, औराक़ में छुपे इल्म के मोती तलाश करना हो, क्या ज़रूरत है कि ज़हमत उठाई जाए? ए आई मौजूद है, चंद सेकंड में सारा मवाद खिदमत आलिया में मौजूद होता है, अगर इस तहक़ीक़ के लिए तग व दौ की जाती, औराक़ छाने जाते, वरक़ गर्दानी की जाती, कुतुब खानों का चक्कर लगाया जाता तो दुरुस्त मवाद के साथ हज़ारहा तजरबे हाथ लगते!
अफ़सोस है, हैरत है कि एक साहिब तहक़ीक़, उसूल करखी की इबारत चैट जी पी टी पर तलाश करते हैं, उसी पर एतमाद करते हैं और जब तलाश करने के लिए निकलते हैं तो पूरी किताब में इबारत कहीं दस्तयाब नहीं होती, एक बड़ा तबक़ा है जो अपना हर मज़मून इसी की ज़कात व खैरात और भीक से लिखा करता है, हर हर्फ़ इसी का मिन्नत कश है, जब भी तक़रीर बनानी हो, मज़मून लिखना हो, या छोटी सी एला निया तहरीर लिखनी हो, वो कश्कोल बह दस्त चैट जी पी टी की खिदमत में मौजूद होता है, वो खुश फ़हमी में मुब्तिला हैं कि हम इल्मी अदबी तहरीर लिख रहे हैं, लोग तारीफ कर रहे हैं, लेकिन अहले ज़ौक़ दो सतर पढ़ कर उकता जाते हैं, उसलूब खुश्क से खुश्क तर होता है, सबसे बड़ी वजह ये है कि जब तक तहरीर में खून जिगर शामिल नहीं होगा, कारी पर खातिर ख़्वाह असर नहीं हो सकता!
इक़बाल की ज़बानी ये हक़ीक़त बारहा सुनी गई है कि
दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़त परवाज़ मगर रखती ये
मगर ए आई की बनावटी तहरीर बे असर, बे एतबार और ला हासिल ये, सिर्फ़ ज़ेहनी अय्याशी और वक़्ती खुश फ़हमी के सिवा और कुछ भी नहीं!
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का उसलूब बला का सहर अंगेज़ था क्यों? हर लफ़्ज़ दिल की गहराई से निकलता है, इब्नुल हसन अब्बासी कुद्दस सिर्रहू ने वाक़िया नक़ल किया है कि एक अंग्रेज़ी मज़मून का तर्जुमा करते करते आँख से अश्क जारी हुए, इस क़दर आँसू बहते कि तर्जुमा शुदा वरक़ भीग जाता, तहरीर मिट जाती, दोबारा तर्जुमा करते लेकिन खुद पर क़ाबू रखना मुश्किल हो जाता, बड़ी मुश्किल से उन्होंने तर्जुमा मुकम्मल किया फिर रिसाले में शाए किया, और हम हैं कि माइक में चंद लफ़्ज़ कह कर आर्डर देते हैं और चंद सेकंड में तहरीर नुमूदार हो जाती है, अदना कोशिश से भी गुरेज़ां हैं, असर अंगेज़ी कहाँ से आएगी?
जब तक खून जिगर न हो, जहद मुसलसल न हो, फन व हुनर पर दस्तरस सिर्फ़ ख़याल है, ला हासिल ख़्वाब है!
इस पर भी इक़बाली फ़िक्र मशहूर है!
रंग हो या खिशत ओ संग, चंग हो या हर्फ़ ओ सौत
मोजज़ए फन की है ख़ून जिगर से नुमूद
एक शागिर्द सालहा साल उस्ताद की सोहबत उठाता है, मशीनी हुनर सीखने वाला धक्के खाता है, गालियाँ सुनता है, रोज़ ओ शब मेहनतें करता है, एक मुहक़्क़िक़ एक लफ़्ज़ की तहक़ीक़ के लिए हज़ाराहा सफ़हात खंगाल लेता है, एक मुहद्दिस एक लफ़्ज़ समझने के लिए बादिया पैमाई करता है, दूर दराज़ का सफ़र करता है, तब जाकर उन्हें कुछ हाथ आता है!
बे कोशिश व जहद समर किस को मिला है
बे खून पिए लुक़्मा तर किस को मिला है ?
ए आई की अफ़ादियत से इनकार नहीं , बेशुमार काम पलक झपकते अंजाम पा रहे हैं, वो तन तनहा पूरी टीम का काम कर रहा है, लेकिन इस हक़ीक़त का भी एतराफ़ करना होगा कि हज़ारहा मेहनत तलब तख़लीक़ी सलाहियतें जो जहद मुसलसल से हासिल हुआ करती थीं, आज उन का दौर ख़त्म होने को है, दुनिया में इंक़लाबात आते हैं, ईजादात का ज़माना आता है तो लोग एतदाल से मुनहरिफ़ हो जाते हैं।
आज ज़रूरत है एतदाल की, टेक्नोलॉजी के दुरुस्त इस्तेमाल की, याद रखना चाहिए कि हर वो इस्तेमाल जो फ़िक्र व अमल में सुस्ती और कम कोशी की तरफ़ ले जाए उस से हज़ार क़दम दूर रहना है, हम हर फ़िक्री काम के लिए ज़ेहन को ज़हमत फ़िक्र दें,
वरक़ गर्दानी दरकार हो तो फौरन किताब की तरफ़ रुजू करें, किसी लफ़्ज़ की तहक़ीक़ दरकार हो या हदीस का हवाला दरकार हो, खुद मक़दूर भर मेहनत करें, अपने मज़ामीन और इल्मी उमूर अज़ खुद अंजाम दें, सिर्फ़ दुनियावी उमूर में, किसी नए मक़ाम नई टेक्नोलॉजी के तार्रुफ़ के लिए महदूद इस्तेमाल करें!
मेरे उस्ताद मोहतरम ने बहुत पहले ख़बरदार किया था, कि इल्मी उमूर के लिए, तहक़ीक़ी कामों के लिए हरगिज़ इसे इस्तेमाल न करना
ज़ेहन सुस्त पड़ जाएगा, ज़ौक़ मुताला कम से कम तर हो जाएगा , फ़िक्री कुव्वत मानद पड़ जाएगी, तख़लीक़ी सलाहियतों को जंग लग जाएगा!
खुदाए करीम राह एतदाल मयस्सर करे... !
✍🏻अबुल फ़ज़ल हैदरीؔ