”ज़ुल्म “ एक ऐसा लफ़्ज़ है, जिसके हक़ीक़ी मफ़हूम से अक्सर लोग ना-बिल्द हैं, आम तौर पर जब ज़ुल्म का लफ़्ज़ पर्द-ए-समाअत से टकराता है, तो यही ख़याल ज़ेहन में गर्दिश करता है, कि किसी ताक़तवर का कमज़ोरों को दबाना, उनको ज़ूद-ओ-कोब करना, दूसरे की ज़मीन ग़सब कर लेना, ग़ैर के सामान पर जब्रन क़ब्ज़ा कर लेना, हुक्मरां जमाअत का रअय्या के हुक़ूक़ अदा न करना, और कुर्सी पर विराजमान मग़रूर लोगों का अपने मातहतों के साथ ना-इंसाफ़ी करना ही ज़ुल्म है; हाल-आं-कि ज़ुल्म सिर्फ़ यही नहीं; बल्कि इसके अलावा ज़ुल्म के बहुत से अक़साम हैं, जिनको शब-ओ-रोज़ हम अंजाम देते हैं, और जिनके ज़ुल्म होने का हमें एहसास तक नहीं होता।
”ज़ुल्म“ एक अरबी लफ़्ज़ है, जिसका मतलब है ” वज़उश-शैई फ़ी ग़ैरि महल्लीही “ कि किसी शय को उसकी मुतअय्यना जगह के अलावा दूसरी जगह में रखना, किसी काम को उसके वक़्त मुक़र्ररा पर अंजाम न देना, और आज के काम को कल पर टाल देना ज़ुल्म है, ज़ुल्म के इस हक़ीक़ी मफ़हूम के ऐतबार से इसका दामन बहुत वसीअ है, जिसको मुख़्तसर मज़मून में बयान करना समंदर को कूज़े में समाने की तरह है।
आज हम ऐसे मुआशरे में सुकूनत पज़ीर हैं, जिसमें एक दूसरे पर ज़ुल्म करना, एक दूसरे के हुक़ूक़ अदा न करना, और अपने फ़राइज़-ए-मंसबी में कोताही करना आम है। चुनांचे औलाद वालिदैन की नाफ़रमानी में ख़ुश है, वालिदैन औलाद के हुक़ूक़ अदा करने से क़ासिर हैं, बीवी शौहर की इताअत-ओ-फ़रमां-बरदारी से आजिज़ है, शौहर बीवी पर ज़ोर ज़बरदस्ती को अपने लिए जाइज़ समझता है, भाई बहन को विरासत से महरूम कर के ज़्यादती करना ज़रूरी समझता है, और बहन आपसी झगड़े फ़रोग़ देने को रवा समझती है; खुलासा ये कि ज़ुल्म का एक तवील फ़हरिस्त है, जिनमें से चंद को सुपुर्द-ए-क़िरतास करना ज़रूरी है, जिनको हमारे मुआशरे में ज़ुल्म समझा ही नहीं जाता, और नेकी समझ कर बिला तरद्दुद अंजाम दिया जाता है।
(1) सबसे बड़ा और भयानक ज़ुल्म हमारे समाज व मुआशरे में बेवा और तलाक़ याफ़्ता लड़कियों पर किया जाता है, वालिदैन से ले कर मुआशरे में मौजूद हर फ़र्द इस में मुलव्वस है, चुनांचे हमारी सोसाइटी में बेवा और तलाक़ याफ़्ता बेटियों और बहनों की कोई हैसियत नहीं, उनको हक़ीर से हक़ीर तर समझा जाता है, उन पर तरह तरह की ज़्यादती को जाइज़ ही नहीं; बल्कि बेहतर समझा जाता है, उनकी ज़िंदगी हर तरह से तंग कर दी जाती है, खुद वालिदैन इस को बुरा भला कहना शुरू कर देते हैं, उनको तरह तरह के ताने देते हैं, उनकी छोटी सी ग़लती पर उनका जीना दो भर कर देते हैं, हमेशा ज़बान गाली गलौज से मुज़य्यन रहती है, अगर खुदा न ख़्वास्ता किसी मर्ज़ का शिकार हो जाएं, और घर के काम करने से आजिज़ आ जाएं, तो उनकी बीमारी की फ़िक्र करने के बजाए जब्रन इस बीमारी की हालत में भी उन से सारे काम करवाए जाते हैं, और इनकार की सूरत में या तो भूकी रखी जाती हैं, या घर से निकाल दी जाती हैं, जिस की वजह से जब उसके अंदर मज़ीद ज़ुल्म बर्दाश्त करने की सकत बाक़ी नहीं रहती, उनके सब्र का प्याला लब रेज़ हो जाता है, हर तरफ़ से उनके सहारे छीन लिए जाते हैं, और ज़मीन अपनी कुशादगी के बावजूद उनके लिए तंग दामानी का शिकवा करने लगती है, तो न चाहते हुए भी अपनी जान जान-ए-आफ़रीं के हवाले कर के इस मुसीबत भरी ज़िंदगी से छुटकारा पाने की कोशिश करती हैं। अफ़सोस है ऐसे मुआशरे पर! लानत है ऐसे वालिदैन और अफ़राद-ए-ख़ाना पर! जो बेटी और बहन का दर्द समझने के बजाए मज़ीद दर्द देते हैं, और उनके ज़ख़्म पर मरहम रखने के बजाए नमक छिड़कते हैं। खुदारा! वालिदैन अपनी आंखें खोलें, अपनी बेटी को बेटी समझें, उनके दर्द को महसूस करें, इस ज़ालिम दुनिया में उन्हें बे सहारा न छोड़ें, अपने लिए बोझ समझने के बजाए अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए, मुनासिब घराना देख कर उनकी शादी कराएं, अगर वो ग़लत रविश पर हैं, तो उनकी इस्लाह की फ़िक्र करें।
(2) हमारे मुआशरे में दूसरा जो ज़ुल्म है, जिस में अवाम व ख़ास, आलिम व जाहिल सब मुब्तिला हैं, वो है ग़ैर शादीशुदा औलाद पर ज़ुल्म, चाहे लड़का हो या लड़की दोनों पर सितम ढाया जाता है; बल्कि लड़की पर ज़्यादा ही ज़ुल्म होता है। आज माहौल इस तरह बन गया है, कि शादी ब्याह से क़ब्ल कम अज़ कम लड़के की ख़्वाहिश मालूम भी की जाती है, उसकी पसंद और नापसंद की रिआयत भी की जाती है; मगर अफ़सोस कि हमारी बेटियों की पसंदीदागी के बारे में किसी के दिल में ख़याल तक नहीं आता, वो बाप जो अपनी बेटी की मुहब्बत में जान तक दे देना गवारा करते हैं; मगर ब वक़्त-ए-निकाह वो भी ज़ालिम बन जाते हैं, और बेटी को सिर्फ़ अपनी अना और ज़िद की भेंट चढ़ा कर, महज़ माल व दौलत की फ़रावानी को देख कर, फ़ाजिर व फ़ासिक़ और अय्याश व बदमाश के साथ रुख़सत कर देते हैं, और शादी के बाद कभी पुरसान-ए-हाल की फ़िक्र भी नहीं रहती, कैसी ज़िंदगी गुज़ार रही है कोई परवा नहीं, ये ज़ुल्म ही नहीं सितम बालाए सितम है।
इसी तरह सही उम्र में निकाह न कराना भी एक तरह से औलाद पर ज़ुल्म है, कि इस की वजह से औलाद ग़लत रविश इख़्तियार करती है, और बिल आखिर मजबूर हो कर ज़िना कारी जैसे अज़ीम गुनाह के मुर्तकिब हो जाती है, यहां ये बात ज़ेहन नशीं करनी चाहिए कि सही वक़्त और सही उम्र पर शादी न कराने की वजह से जो ख़राबियां मुआशरे में जन्म लेती हैं, जिन बुराइयों का इर्तिकाब औलाद करती हैं, उन की ज़िम्मेदारी वालिदैन और सरपरस्तों पर भी आइद होती है, उनके नामा-ए-आमाल में भी गुनाह दर्ज होता है, और खुदावंद-ए-क़ुद्दूस की बारगाह में उन से भी बाज़ पुरस होगी।
(3) इसी तरह हमारी सोसाइटी में बीवी पर ज़ुल्म करना भी अपने लिए बहादुरी समझा जाता है, और इस पर ज़ोर ज़बरदस्ती करना अपना हक़ समझा जाता है, जिस की वजह से उस बेचारी पर न जाने किस किस तरह से ज़िंदगी दो भर कर दी जाती है, कि शौहर और दरिंदे में इम्तियाज़ कर पाना मुश्किल हो जाता है; हाल-आं-कि अहादीस-ए-मुबारका में मुतअद्दिद जगह पर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने औरतों के साथ भलाई और ख़ैर ख़्वाही करने का हुक्म दिया है, चुनांचे आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक मक़ाम पर फ़रमाया: ” इस्तौसु बिल निसाई ख़ैरन, फ़इन्नल मरअता खुलिक़त मिन ज़िलइन, व इन्ना औवजा शैइन फ़िज़्ज़िलई आलाहु, फ़इन ज़हब्ता तुक़ीमुहु कसरतहु, व इन तरक्तहु लम यज़ल औवजा, फ़स्तौसु बिल निसाई ख़ैरन.“ कि औरतों के बारे में एक दूसरे को नेकी की वसीयत करो, क्योंकि औरत पसली से पैदा की गई है, और पसली का सबसे ज़्यादा टेढ़ा हिस्सा उसका ऊपर वाला होता है। अगर तुम इसे सीधा करने लगोगे तो तोड़ दोगे, और अगर इसे छोड़ दोगे तो वो टेढ़ी ही रहेगी; लिहाज़ा औरतों के साथ नेकी का बर्ताव करो।(मिशकातुल मसाबीह हदीस:3238)। और एक दूसरी जगह इरशाद फ़रमाया: ” अन आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा क़ालत: क़ाल रसूलुल्लाहि ﷺ: ख़ैरुकुम ख़ैरुकुम लिअहलीही, व अना ख़ैरुकुम लिअहली.“ तुम में सब से बेहतर वो है जो अपने घर वालों के साथ सब से बेहतर हो, और मैं तुम सब में अपने घर वालों के साथ सब से बेहतर हूं।(मिशकातुल मसाबीह हदीस:3252) इन अहादीस की रौशनी में शौहर को चाहिए कि वो हर तरह से बीवी के साथ ख़ैरख़्वाही करे, उसको अपनी रफ़ीक़-ए-हयात समझ कर आज़ादी के साथ रहने दे, बेजा रोक टोक, और बिला वजह डांट डपट करने से बाज़ रहे, और आपसी मुहब्बत और उल्फ़त के साथ ज़िंदगी गुज़ारे।
(4) चौथा ज़ुल्म ये है कि औलाद अपने वालिदैन की नाफ़रमानी में हद से बढ़ गई है, बात बात पर वालिदैन को डांटना, उन को ज़लील करना, उन पर अपना ग़ुस्सा निकालना, और उन को कोसना मामूली बात हो गई है, आज उन की अहमियत और अज़मत को पस-ए-पुश्त डाल दिया जाता है, उन की इज़्ज़त तो कुजा? सही से उन का नाम लेना भी गवारा नहीं किया जाता, वो वालिदैन जिन्होंने इन की परवरिश की, इन की ज़रूरियात का ख़याल रखा, हर तरह के आराम व राहत पहुंचाने के लिए खुद मशक़्क़तों को झेला, तरह तरह के मसाइब बर्दाश्त किए, और ज़िंदगी में किसी तरह की परेशानी पैदा होने नहीं दिया, जिन की अज़मत के पेश-ए-नज़र क़ुरान करीम ने” उफ़“ तक कहने से भी मना किया है; मगर हाय अफ़सोस! आज तो उन पर मज़ालिम के पहाड़ तोड़े जाते हैं, हाल-आं-कि क़ुरान करीम में बार बार वालिदैन के साथ हुस्न-ए-सुलूक की तरग़ीब दी गई है, उन के लिए दुआए ख़ैर की ताकीद की गई है, और उन की नाफ़रमानी करने पर सख़्त धमकियां और वईदें सुनाई गई हैं; इस लिए औलाद को होश के नाखून लेने चाहिए, और इस अज़ीम गुनाह से तौबा कर के वालिदैन से माफ़ी मांगनी चाहिए और आइंदा किसी तरह की अज़ियत रसाई से बाज़ रहना चाहिए।
ये चंद बड़े मज़ालिम हैं, जिन को मज़ालिम समझा ही नहीं जाता, इन को अंजाम देते वक़्त इन के गुनाह होने का ख़याल भी नहीं आता, क़यामत और बअस बाद अल मौत पर ईमान रखने के बावजूद, ख़ौफ़-ए-खुदा का एहसास भी नहीं होता, सिर्फ़ ”इस्लाह-ए-मुआशरा “की हुंकार लगाते हैं; लेकिन अपने अंदर तब्दीली की फ़िक्र नहीं, हाल-आं-कि एक सालेह मुआशरे की तरवीज के लिए ज़रूरी है, कि अपने ऊपर आइद फ़राइज़ को हुस्न व ख़ूबी के साथ अंजाम दिया जाए, दूसरों के हुक़ूक़ पूरी अमानत व दियानतदारी के साथ अदा किए जाएं, ” कुल्लुकुम राइन व कुल्लुकुम मसऊलून अन रईय्यतिही “को ज़ेहन में महफ़ूज़ कर के अपनी ज़िम्मेदारी को अदा करना चाहिए, जब मुआशरे में मौजूद हर फ़र्द को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास हो जाएगा, तो यक़ीनन ये मुआशरा खुद ब खुद सालेह हो जाएगा, न किसी जलसे का स्टेज सजाना होगा, और न किसी पेशावर मुक़र्रिर को बुला कर पैसे बहाने की ज़रूरत होगी।
अल्लाह अमल सालेह की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए आमीन।
✍️: मुहम्मद शाहिद गुड्डावी