हालिया डिबेट, कुछ गलतफहमियों का इजला 
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डिबेट शानदार रही, अंदाज़े इस्तदलाल जानदार रहा, इस्लामियाने हिन्द खुशियों में नहा गए, मुफ़्ती साहब यकीनन काबिले कद्र हैं, हमें मुनफ़ियत की उम्मीदें वाबस्ता हैं, आइंदा फितन की राह में उनके सभी अहबाब सदे सिकंदरी बनेंगे, अक़ली कसौटी पर इस्लामी हक़्क़ानियत को साबित करेंगे, तौहीद का मसला भी ज़ेरे बहस आएगा, मसला गुलामी भी वाज़ेह किया जाएगा, बेसत नबी की हिकमत पर भी कलाम होगा, जिहाद की गलतफहमियां भी दूर की जाएंगी। इंशाअल्लाह 

अगर ऐसा हुआ तो हिंदी इस्लाम आइंदा सुर्ख रू होगा
मगरिब ज़दा अरब को आईना दिखाएगा। 

सरदस्त चंद बातें पेश खिदमत हैं
डिबेट से क़ब्ल भी और डिबेट के बाद भी कुछ गलतफहमियां फैल गईं 

• बाज़ उलमाए किराम ने खदशात का इज़हार किया कि डिबेट नफ़ा बख्श नहीं होगी
नाज़रीन की तादाद ने उनकी राय को गलत साबित किया

• डिबेट में मुफ़्ती साहब ने सामईन का ख्याल रखा, अंग्रेज़ी लिसानी महारत का इस्तेमाल किया, फ़सल्फ़ियाना इस्लाहात से भी मदद ली, यही मौके का तक़ाज़ा था, जावेद साहब कहने लगे कि ज़रा आम ज़बान इस्तेमाल करें, हम जैसे चंद अफ़राद बड़े खुश हो कर इस क्लिप की तशरीह करने लगे कि देखो मौलवी जब अंग्रेज़ी बोलता है तो अंग्रेज़ी दां को भी समझ में नहीं आती। 
अर्ज यह है कि जनाबे आली! 
मसला अंग्रेज़ी ज़बान का नहीं! बल्कि इस्लाहाते फ़लसफ़ा का है, जावेद साहब की खता थी, यकीनन खता थी कि वो इस्लाहात से ना आशना थे लेकिन ज़बान से ज़रूर वाकिफ़ थे, अगर हम आम उर्दू दां के सामने आन व ज़मान का ज़िक्र करें, जिंस व अर्ज़ और जौहर का तज़किरा करें, आलमे मलकूत और आलमे नासूत का लफ़्ज़ इस्तेमाल करें तो बराहे करम दियानतदारी के साथ बताएं कि कितने अफ़राद को समझ में आएगा?? 
वाज़ेह हुआ कि यह ज़बान की कमज़ोरी नहीं थी, इस्लाहात से ना वाकिफ़ियत थी, इस को ख़ुशी का उनवान देना खुशफहमी के सिवा कुछ भी नहीं, मुफ़्ती साहब की ज़बान दानी देख कर खुशफहमी के बजाए अज़्मे मुसम्मम कर लेते कि हम भी अंग्रेज़ी सीखेंगे और इशाअते दीन की नीयत से सीखेंगे तो शायद बहुत मुनासिब होता। 

• बाज़ अफ़राद ने ताना दिया कि लोग जाहिल से मुनाज़रा करने पहुंच जाते हैं 
जनाबे आली! 
उन की जहालत पेश निगाहे नहीं थी, उनके बयानात के मुज़र असरत पेश नज़र थे, इस डिबेट के मुसबत मुनाफ़े मक़सूद थे। बहम्दुलिल्लाह हदफ़ हासिल करने में तवक्को से कहीं ज़्यादा कामयाबी मिली। 
ऐसे तबसरे बड़ों की शायाने शान नहीं! 

• उधर कुछ लोगों ने इस कामरानी को अपने खाते में मुंतकिल करने की कोशिश की कि यह दलाइल हमारे फलां साहब ने बयान किये हैं
साहिब! सिर्फ हथियार से कुछ नहीं होता, दुरुस्त इस्तेमाल करने वाला मुजाहिद कहलाता है। 

• बाज़ अफ़राद की तंग निगाही पर हैरत हुई कि वो इस डिबेट को मसलकी असबियत के हवाले करने लगे, कुछ कम फहम इसे इदारा जाती तफ़ौक की नज़र करने लगे । 
हाय रे कम निगाही! 
क्या यह इस कोताह नज़री का मौका था? 
नहीं बल्कि मुत्तफ़िक बैनुल मसालिक मौज़ू पर गुफ़्तगू हो, इस में कामयाबी हाथ लगे तो सभी को खुश होना चाहिए, अगर अब भी गम है तो हसद के सिवा और क्या हो सकता है? 

• अक़्ल परस्त दौर में वही दलाइल काम आए जो मुतक़द्दिमीन ने बयान किये और मुताख़िर अकाबरीन ने इस की तौज़ीह व तशरीह की खिदमत अंजाम दी, ज़रुरत पड़ी तो बस नए लिबादे और जदीद लब व लहजे की, लिहाज़ा जो अफ़राद अक़ली उलूम की दुश्वार फहमी की बिना पर इसे ज़ियाए औकात का सबब बताते हैं और मदारिस के फ़ायदा मंद निसाब को तब्दील कर देते हैं उन्हें ज़रूर गौर करना चाहिए कि इन उलूम के बगैर फितन का मुकाबला कैसे किया जाएगा? 
एक दूसरा तबका जो सिर्फ इन कुतुब के दाखिल निसाब होने पर ख़ुशी का इज़हार कर रहा है उन के लिए मकामे फिक्रमंदी है कि 
 अभी मज़ीद नज़र सानी की ज़रुरत है, जो किताबें दाखिल निसाब हैं उन के कदीम तर्ज़े तदरीस में थोड़ी सी जिद्दत पैदा कर दें, फिर तलबा की बुलंद परवाज़ का मुशाहिदा करेंगे! इंशाअल्लाह 

• अंग्रेज़ी ज़बान का मसला अब भी चीस्तां बना हुआ है, कुछ लोग सिरे से इंकार किये देते हैं, और कुछ इस तरह मशगूल होते हैं कि अच्छा खासा निसाब बदल देते हैं और कुछ तो वो हैं अंग्रेज़ी दुनयवी नफ़े के लिए सीखते हैं 
याद रखिये! 
एतेदाल पैदा करना होगा, इस दौरे जदीद में अंग्रेज़ी की ज़रुरत है, यकीनन ज़रुरत है, इस हकीकत को तस्लीम करने में जितनी ताखीर होगी उतना ही नुक्सान होता जाएगा। 
ग़रज़िके अंग्रेज़ी सीखी जाए, दीनी फ़ायदा पेश नज़र रहे, और मरऊबियत दिल के क़रीब भी न भटके। 

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✍🏻अबुल फज़ल नूरीؔ