جہیز – एक नासूर, एक सामाजिक अन्याय"मोहतरम सामईन!  
आज का मेरा मौज़ू है: जहेज़: एक लानत"
जहेज़ का मतलब है शादी के वक़्त दुल्हन के वालिदैन की तरफ़ से दामाद या उसके घर वालों को दी जाने वाली दौलत, सामान या तोहफ़े। बाज़ाहिर ये एक मोहब्बत भरा रिवाज लगता है, लेकिन हक़ीक़त में ये एक संगीन समाजी बुराई बन चुका है। ये रस्म इतनी जड़ें पकड़ चुकी है कि बग़ैर जहेज़ के रिश्ता करना आज भी कई इलाकों में मुश्किल या नामुमकिन बन गया है। बाज़ औक़ात लड़की की तालीम, दीनदारी और किरदार को नज़रअंदाज़ कर के सिर्फ़ जहेज़ को अहमियत दी जाती है। अगर हम इस्लामी नुक्ता-ए-नज़र से देखें तो इस्लाम में शादी को आसान और सादा बनाने का हुक्म है। रसूल अल्लाह ﷺ की बेटी हज़रत फ़ातिमा रज़ी अल्लाह अन्हा की शादी एक मिसाल है, जहाँ सादगी, मोहब्बत और बरकत नज़र आती है, न कि दौलत का मुज़ाहरा। निकाह को आसान और ज़िना को मुश्किल बनाना चाहिए, लेकिन अफ़सोस! हमारे मुआशरे में इसके बरअक्स हो रहा है। और आज मुआशरे में जहेज़ के कई नुक़सानात नज़र आ रहे हैं माली दबाव: मुतवस्सित और ग़रीब वालिदैन अपनी बेटी की शादी के लिए क़र्ज़ों में डूब जाते हैं।
हद तो तब होती है जब शादी के बाद जहेज़ कम होने पर लड़कियों को सताया जाता है, बाज़ औक़ात तो जान तक ले ली जाती है और अफ़सोस सद अफ़सोस बहुत सी नेक, बाहया लड़कियाँ सिर्फ़ इसलिए घर बैठी रहती हैं कि उनके वालिदैन जहेज़ नहीं दे सकते। मुआशरे में बाज़ लोग लड़कों को सिर्फ़ दौलत कमाने का ज़रिया समझते हैं हमें चाहिए कि न जहेज़ लें और न दें तालीम याफ़्ता नौजवानों को चाहिए कि अपने घर वालों को इस लानत से रोकें उलमा, असातज़ा और समाजी शख़्सियात को इस मौज़ू पर लोगों को बेदार करना चाहिए शादी के लिए तक़वा, दीनदारी और अख़लाक़ को मेयार बनाया जाए, न कि माल व दौलत को।
आख़िर में ये कहना चाहता हूँ 
जहेज़ सिर्फ़ एक माली बोझ नहीं, बल्कि एक बेटी की इज़्ज़त का सौदा है।  
आएँ! आज हम सब अहद करें कि हम इस ज़ालिमाना रस्म का हिस्सा नहीं बनेंगे।  
इस्लामी तालीमात पर अमल करेंगे और शादी को आसान बनाएँगे।
अल्लाह हमें सच्चाई के साथ जीने और ग़लत रिवाजों को ख़त्म करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।  
आमीन या रब्बुल आलमीन।

वस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह व बरकातहू

हाफ़िज़ अरमान आलम तजवीदी