बिन्ते अबुल खैर आज़मीؔ
कभी कभी ज़िंदगी के हंगामों में, शोर, हुजूम और मसरूफ़ियत के बीच एक लम्हा ऐसा आता है जब दिल की सरहद पर कोई खामोश सी दस्तक होती है।
न वो आवाज़ कानों से सुनी जाती है, न आँखों से देखी जाती है; मगर रूह उसे पूरी तरह महसूस कर लेती है।
ये रब की दस्तक होती है वो रब जो बंदे से दूर नहीं, मगर बंदा खुद अपने रब से दूर हो जाता है।
ये दस्तक उस वक़्त सुनाई देती है जब दिल थक जाता है, उम्मीदें बोझ बनने लगती हैं, और दुनिया की चमक दमक आँखों को खैरा करने के बावजूद रूह को तारिक छोड़ देती है।
तब एहसास होता है कि असल ख़ला किसी चीज़ का नहीं, बल्कि किसी ज़ात का है।
वो ज़ात जिस के बगैर दिल का कोई गोशा आबाद नहीं हो सकता।
दिल एक सरहद है एक ऐसी हद जहां दुनिया खत्म होती है और आखिरत की झलक शुरू होती है।
यही वो मक़ाम है जहां ख्वाहिशात और हिदायत आमने सामने खड़ी होती हैं।
रब की दस्तक इसी सरहद पर होती है, जैसे वो बंदे से कह रहा है:
“अब भी लौट आओ, दरवाज़ा बंद नहीं हुआ।”
रब की ये पुकार कभी आज़माइश की सूरत में आती है, कभी किसी नेमत के छिन जाने में, और कभी किसी आयत, किसी नसीहत या किसी सजदे के आंसुओं में ढल जाती है।
गफलत ये है कि हम दिल के दरवाज़े पर दुनिया के इतने ताले लगा लेते हैं कि इस दस्तक को सुनने की फुर्सत ही नहीं मिलती।
जब इंसान रुक कर खुद से सवाल करता है मैं कहां खड़ा हूं?
किस सिम्त जा रहा हूं?
मेरी कामयाबी का मेयार क्या है?
तब ये सवाल दरअसल रब की दस्तक का तर्जुमा होते हैं।
यही लम्हा इंसान की ज़िंदगी का सबसे कीमती लम्हा बन सकता है, अगर वो इस दस्तक पर दरवाज़ा खोल ले।
दिल का दरवाज़ा खुलता है तो तौबा की खुशबू फैलती है, आँखों में नदामत उतरती है, और सजदे बोझ नहीं बल्कि सुकून बन जाते हैं।
तब मालूम होता है कि रब की दस्तक तो थामने आई थी, सहारा देने आई थी, रास्ता दिखाने आई थी।
दिल की सरहद पर रब की दस्तक दरअसल मोहब्बत की आख़िरी नहीं, पहली सदा है।
ये एलान है कि बंदा चाहे जितना भटक जाए, रब की रहमत उस से पहले पहुंच जाती है।
शर्त सिर्फ इतनी है कि बंदा गुरूर के पर्दे हटा दे और आजिज़ी से ये कह दे:
“ऐ मेरे रब! मैं आ गई हूं।”
जो इस दस्तक को पहचान लेता है, उस की ज़िंदगी की सिम्त बदल जाती है।
वो दुनिया में रहता है मगर दुनिया उस के दिल में नहीं रहती।
उस का दिल रब के नूर से रोशन हो जाता है, और यही रोशनी उसे अंधेरों से निकाल कर इतमीनान की शाहराह पर ले आती है।
काश हम सुन सकें…
काश हम पहचान सकें…
तो पूरी ज़िंदगी ज़ाया न करते
जज़ाकमुल्लाह खै़रन कसीरा व अहसनल जज़ा फिद दुनिया वल आखिरह