इस्लाम में निकाह की फ़ज़ीलत व अहमियत और उसकी बरकतें


✍🏻 मुहम्मद आदिल अररियावी 

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 मुहतरम क़ारीईन निकाह इस्लाम का एक मुक़द्दस और फ़ितरी रिश्ता है जो इंसान को इफ़्फ़त सुकून और गुनाहों से हिफ़ाज़त अता करता है शरीयत ने इसे आसान बना कर फ़र्द और मुआशरे दोनों की इस्लाह का ज़रिया बनाया है इंसान की ज़िन्दगी की बुनियादी ज़रूरियात में से एक ज़रूरत जिंसी ख़्वाहिश रखी है जो कि एक फ़ितरी जज़्बा है इसलिए शरीयत ने इस जज़्बा की हलाल तस्कीन के लिए निकाह मुक़र्रर फ़रमाया है ताकि इंसान इंसानियत के जामा में रहे और अपनी ज़िन्दगी इफ़्फ़त व इस्मत के साथ गुज़ार सके बुलूग़त के बाद हर मुसलमान की ज़िन्दगी में कम अज़ कम एक बार ये मौक़ा आता है कि वो निकाह जैसे मुक़द्दस बंधन से अपनी नई ज़िन्दगी का आग़ाज़ करता है शरीयत ने निकाह को किस क़दर आसान रखा है कि इस में सिर्फ इतनी शर्त आइद की है कि दूल्हा दुल्हन और दो गवाह मजलिस में मौजूद हों जिन के सामने दूल्हा कह दे कि मैं ने तुम से निकाह किया और दुल्हन जवाब में ये कहे कि मैं ने क़ुबूल किया तो बस निकाह हो गया ज़ाहिरन ये दो जुमलों का तबादला है लेकिन इसी इज़ाब ओ क़ुबूल से एक दूसरे की ज़िम्मेदारी और हुक़ूक़ ओ फ़राइज़ मुताल्लिक़ हो जाते हैं निकाह की ये आसानी ज़िन्दगी में क़दम क़दम पर एतदाल और सादगी का दरस देती है निकाह के बाद दूल्हा दुल्हन एक नई ज़िन्दगी का आग़ाज़ करते हैं और इस मौक़ा पर नए हालात व मुशाहिदात सामने आते हैं शादी के बाद दुल्हन एक नए घर और नए लोगों में आती है इस मौक़ा पर ख़ानदान भर का हर फ़र्द इस शादी को मुबारक बनाने के लिए बिलउमूम और दूल्हा दुल्हन बिलख़ुसूस अहम किरदार अदा करते हैं हर मुसलमान निकाह पढ़ा सकता है आम तौर पर हमारे हाँ ये तास्सुर पाया जाता है कि मजलिस निकाह में किसी बुज़ुर्ग या साहिब इल्म का होना ज़रूरी है वैसे तो निकाह की बाबरकत मजलिस में अहल इल्म को दावत देना बरकत व सआदत है लेकिन ये ज़रूरी नहीं है सहाबा किराम रज़ि अल्लाहु अन्हुम का तर्ज़ ए अमल बताता है कि निकाह के सिलसिला में किसी क़िस्म का तकल्लुफ़ न फ़रमाते थे सहाबा को हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से जैसी मुहब्बत थी वो मोहताज ए बयान नहीं लेकिन हज़रत अब्दुल रहमान बिन औफ़ रज़ि अल्लाहु अन्हु जैसा जलील उल क़द्र सहाबी भी अपने निकाह में हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बुलाने का तकल्लुफ़ नहीं करते और निकाह की ख़बर मिलने पर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ़ से न कोई शिकवा था न कोई नाराज़गी इसलिए निकाह के लिए एहतिमाम और तकल्लुफ़ात से जिस क़दर बचा जाए इस में इतना ही राहत ही राहत हैـ हज़रत आइशा सिद्दीक़ा रज़ि अल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि क़ाला रसूलुल्लाहि सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तज़व्वजुन्निसाअ फ़इन्नहुन्न यअती नकुम बिलमाल (मुस्तदरिक हाकिम रक़म अल हदीस २६७९ किताब उन् निकाह) तर्जुमा रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि तुम औरतों से निकाह करो पस बेशक वो माल की आमद का ज़रिया बनेंगी (हाकिम)

निकाह के फ़वाइद । निकाह करने से इंसान पाक दामन रहता है और गुनाहों से महफ़ूज़ रहता है मुसलमान निकाह के बाद अपने अहल ए ख़ाना पर जो ख़र्च करता है वो सदक़ा है जिस पर उसे अज्र ओ सवाब मिलता है अल्लाह तआला ने मर्द ओ औरत के दरमियान जो फ़ितरी ताल्लुक़ रखा है निकाह से न सिर्फ जिंसी ख़्वाहिश की तकमील होती है बल्कि इस पर अज्र ओ सवाब भी मिलता है इंसान की रूह मुहब्बत व प्यार की मुतलाशी है और हर क़िस्म की रिया कारी से पाक मुहब्बत अल्लाह तआला ने निकाह में रखी है निकाह सिर्फ दो अफ़राद के मिलाप का नाम नहीं बल्कि इस के ज़रीए दो ख़ानदान आपस में मिलते हैं और इंसान एक दूसरे के दुख सुख में शरीक होता है और सिला रहमी करता है जो दुख या कि मुहब्बत व उख़ुवत और अज्र ओ सवाब का ज़रिया है इस्लाम मुआशरती ज़िन्दगी की तालीम देता है और रहबानियत का इस्लाम में कोई तसव्वुर नहीं निकाह की बरकत से मुआशरा में एक पाकीज़गी की फ़िज़ा क़ायम होती है जिस से नसब महफ़ूज़ हो जाता है मुआशरा में रहते हुए हर शख्स को ख़्वाहिश होती है कि इस को क़ुव्वत हासिल हो और क़ुव्वत हासिल करने का बेहतरीन ज़रिया औलाद है जो निकाह से हासिल होती है निकाह न सिर्फ इबादत है बल्कि अल्लाह तआला की अज़ीम नेमत है और अंबिया अलैहिम अस्सलाम की सुन्नत है वो ख़ातून जिसे देखना भी जाइज़ न था लेकिन निकाह की वजह से वो मर्द के लिए हलाल हो जाती है निकाह एक इबादत है जिस से इंसान की तकमील हो जाती है और कोई ऐसी इबादत नहीं जो आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने से लेकर अब तक मशरू रही हो और फिर जन्नत में भी बाक़ी रही हो वो निकाह के अलावा कोई नहीं निकाह की नेमत हासिल हो जाने पर अल्लाह तआला का शुक्र अदा करना चाहिए और इस की क़द्र करनी चाहिए ।

अल्लाह रब्ब उल इज्ज़त हम सब नेक सीरत बाहया हमसफ़र अता करे जो बेइंतिहा मुहब्बत करने वाली हो और जिन का निकाह हो गया है उन के दरमियान मुहब्बत अता फ़रमाएं आमीन सुम्मा आमीन या रब्ब उल आलमीन ।