एक जुमले ने जिंदगी का रुख बदल दिया :
कई बार उस्ताद या किसी बड़ी शख्सियत का सिर्फ एक जुमला तालिबे इल्म की जिंदगी ही बदल डालता है। और उम्मत को इससे वो फायदा पहुंचता है जो उस जुमला कहने वाले के तसव्वुर में भी नहीं होता। सिर्फ एक बात फर्श से अर्श तक पहुंचा देती है।
चंद मिसालें मुलाहिजा फरमाएं
1) इमाम शम्सुद्दीन अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन अहमद जहबी रहमतुल्लाह ताला अलैह जो असमाउर्रिजाल के इमामे कामिल हैं और अहले इस्तेकराए ताम से ताल्लुक रखते हैं अपने शेख इमाम बरजाली रहमतुल्लाह ताला अलैह के हवाले से फरमाते हैं:
هو الذي حبب إلي طلب الحديث فإنه رأی خطي فقال: خطک يشبه خط المحدثين فأثر قوله في وسمعت منه وتخرجت به في أشياء
ये वही हैं जिन्होंने मुझे तलबे हदीस का शौक दिलाया, उन्होंने मेरी लिखाई देख कर फरमाया: तुम्हारी लिखाई मुहद्दिसीन जैसी है, उनका ये कौल मेरे दिल में घर कर गया और मैंने उनसे समाअ किया और उनके जरिए कई उलूम में महारत हासिल की।
(अद्दुर्रुल कामिना, ٣\٢٣٨ )، (तारीखुल इस्लाम, ५३\४५६)، (फहरसुल फहारिस वल अस्बात, ١\٢٢٠)
इमाम बरजाली रहमतुल्लाह ताला ने तो एक जुमला इरशाद फरमाया, लेकिन इसके बदले उम्मत को "तारीखुल इस्लाम", "सियरु अलामुन नुबला", "तजकिरतुल हुफ्फाज", "मीजानुल एतेदाल", "तजहीब तहजीबुल कमाल" और "अल काशिफ" जैसी बुलंद पाया कुतुब उम्मत को इमाम जहबी के कलम से नसीब हुईं।
2) इमाम बुखारी रहमतुल्लाह ताला अलैह की अजीम किताब "अल जामिउल मुसनदुस सहीहुल मुख्तसर मिन उमूर रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम व सुननहु व अय्यामेही" जिसे हम "सही बुखारी" के नाम से जानते हैं इस किताब का मुहर्रिक भी इमाम बुखारी रहमतुल्लाह ताला अलैह के उस्ताद मोहतरम इसहाक बिन राहविया रहमतुल्लाह ताला अलैह का एक जुमला बना।
चुनांचे इमाम बुखारी रहमतुल्लाह ताला अलैह अपनी इस किताब के लिखने का एक सबब बयान करते हुए फरमाते हैं :
मैं इमाम इसहाक बिन राहविया की बारगाह में हाजिर था
कि आप ने फरमाया: काश तुम में से कोई एक ऐसी किताब लिखे जिस में सिर्फ रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सही अहादीस हों । इमाम बुखारी फरमाते हैं कि ये बात मेरे दिल में उतर गई लिहाजा मैं इस किताब को जमा करने में लग गया।
(मुल्खस्सन मिन अत तौजीह लिब्ने मुल्किन, ٢\٢८) ،(तगलिकुत तालीक लिब्ने हजर, ५\४१९)، (तहजीबुल असमा लिन नववी, ١\७४)، (तारीख इब्ने असाकिर, ५२\७२)، (अल बहरुल लजी जखर लिस सुयुती)
3) इमाम आज़म अबू हनीफा नुमान बिन साबित रहमतुल्लाह ताला अलैह जिनकी शख्सियत किसी तार्रुफ़ की मोहताज नहीं. इब्तिदाअन सिर्फ कारोबार में ही मश्गूलियत थी आप को इमाम आज़म बनाने वाली शख्सियत भी आप के उस्ताद मोहतरम इमाम आमिर बिन शराहबील अश शाबी रहमतुल्लाह ताला अलैह का एक जुमला ही था।
उकूदुल जुमान में है:
روی أبو محمد الحارثي بسنده عن الإمام أبي حنيفة قال: مررت يوما علی الشعبي وهو جالس فدعاني وقال إلی ما تختلف؟ فقلت أختلف إلی فلان ،قال: لم أعن السوق عنيت الاختلاف إلی العلماء، فقلت: أنا قليل الاختلاف إليهم ، فقال: لا تفعل وعليک بالنظر في العلم ومجالسة العلماء فإني أری فيک يقظة وحرکة، قال: فوقع في قلبي من قوله فترکت الاختلاف أي إلی السوق وأخذت العلم فنفعني الله بقوله.
अबू मुहम्मद अब्दुल्लाह हारिसी रहमतुल्लाह ताला अलैह अपनी सनद से इमाम अबू हनीफा से रिवायत करते हैं कि उन्होंने फरमाया: एक दिन मैं इमाम शाबी रहमतुल्लाह ताला अलैह के पास से गुजरा तो वो बैठे हुए थे उन्होंने मुझे बुलाया और फरमाया: कहां आना जाना रखते हो? मैंने जवाब देते हुए कहा : फलां के पास जाता हूं । इमाम शाबी ने फरमाया: मेरी मुराद बाजार नहीं बल्कि उलमा के पास जाना था। इस पर मैंने कहा: मैं उनके पास कम ही जाता हूं। उन्होंने फरमाया: ऐसा न करो बल्कि तुम्हें तो इल्मो उलमा की मजलिस की तरफ तवज्जो देनी चाहिए बेशक मैंने तुम में बेदार मगज़ी व जहानत देखी है
इमाम आज़म रहमतुल्लाह ताला अलैह फरमाते हैं उनकी इस बात ने मुझ पर बहुत असर किया और मैंने कारोबार तर्क किया और इल्म हासिल करने लगा। अल्लाह पाक ने उनकी बात की वजह से मुझे बहुत नफा अता फरमाया ।
(उकूदुल जुमान, वरक 64, मखतूत)
4) इमाम हसन बिन जियाद रहमतुल्लाह ताला अलैह फिकह हनफी के अजीम पेशवा हैं आप के उस्तादों में इमाम जुफर और इमाम अबू युसूफ रहमतुल्लाह ताला अलैहिमा जैसी अजीम हस्तियां शामिल हैं।
आप रहमतुल्लाह ताला अलैह फरमाते हैं: मैं इल्म हासिल करने के लिए पहले इमाम जुफर रहमतुल्लाह ताला अलैह के पास जाया करता था जो मसला मुझ पर दुश्वार होता मैं उन से उस मसले के मुताल्लिक सवाल करता तो वो मेरे लिए उस मसले की वजाहत करते लेकिन मैं समझ नहीं पाता था बिल आखिर जब मैं ने उन्हें थका दिया तो उन्होंने फरमाया: तेरी खराबी हो न तुम में सलाहियत है और न ही तुम्हें कोई नफा होता है मुझे नहीं लगता है तुम कभी कामयाब हो पाओगे।
हसन बिन जियाद फरमाते हैं : फिर मैं उनके यहां शिकस्ता दिल व गमगीन होकर निकल कर अबू युसूफ के पास आता तो वो मेरे लिए मसला की तफसील करते जब मैं समझ नहीं पाता तो मुझ से कहते: ठहर जाओ, फिर मुझ से पूछते: क्या इस वक्त भी तुम वैसे ही हो जैसे तुम ने शुरुआत की थी? मैं कहता: नहीं, कुछ चीजें समझ आई हैं अगरचे अपनी चाहत के मुताबिक मुकम्मल समझ नहीं पाया हूं, तो आप रहमतुल्लाह ताला अलैह फरमाते : *जो भी चीज कम होती है आखिर कार अपनी गायत को पहुंच ही जाती है तुम सब्र करो मुझे लगता है कि तुम अपनी मुराद को पहुंच ही जाओगे. हसन बिन जियाद फरमाते हैं: कि मुझे उनके सब्र से हैरत होती।
("हुस्न अत तकाजी फी सीरतुल इमाम अबी युसूफ अल काजी", स ५९)
उस्ताद के कहे पर अमल किया तो बिल आखिर एक वक्त आया आप रहमतुल्लाह ताला अलैह इमामत के दर्जे पर पहुंच ही गए।
नतीजा
लिहाजा आप अपने मा तहतों की हौसला अफजाई करें हौसला शिकनी न करें।
सद्दीका जारिया समझ कर आगे भी शेयर करें जजाकमुल्लाह खैरा