लिखना महज शब्दों को कागज पर उतार देने का नाम नहीं, बल्कि यह एहसासों को मायने, ख्यालों को दिशा और जज्बों को मकसद अता करने का हुनर है। बहुत सी बासलाहियत महिलाओं के दिल में लिखने का शौक तो होता है, मगर रहनुमाई, सलीका और दुरुस्त सिम्त न मिलने के बाइस यह शौक बिखरा रह जाता है। इसी खला को पुर करने के लिए नवा-ए-कलम ने एक ऐसा मजमून निगारी कोर्स तरतीब दिया है जो महज लिखना नहीं सिखाता, बल्कि लिखने वाले को जिम्मेदार, बा-वकार और बा-असर कलमकार बनने की तरबियत देता है।

यह कोर्स उन इस्लामी बहनों के लिए है जो चाहती हैं कि उनकी तहरीर महज खूबसूरत न हो, बल्कि बामकसद हो; महज दिलकश न हो, बल्कि कारी के दिल में उतर जाने वाली हो; और महज जाती इजहार न हो, बल्कि मुआशरे की फिक्री व अखलाकी तामीर में किरदार अदा करे। यहां शौक-ए-कलम को सलीके में, हुनर को मकसद में और तहरीर को खिदमत में ढालने पर खुसूसी तवज्जो दी जाती है, ताकि कलम एक मुस्बत और तामीरी आवाज बन सके।

कोर्स का बाकायदा आगाज 5 जनवरी से हो रहा है और इसकी मुद्दत तीन माह पर मुश्तमिल है। इस दौरान मजमून निगारी के बुनियादी उसूल, फिक्री पुख्तगी, उसलूब की दुरुस्ती, मौजू के इंतखाब, और तहरीर में असर व रब्त पैदा करने जैसे अहम पहलूओं पर रहनुमाई पेश की जाएगी। चूं कि एक अच्छा लिखारी बनने के लिए सिर्फ सीखना काफी नहीं बल्कि मुसलसल मशक और अमली तरबियत जरूरी है, इसलिए कोर्स की तकमील के बाद तीन माह की इजाफी अमली तरबियत भी दी जाएगी, ताकि सीखा हुआ इल्म मजबूत महारत में ढल सके।

यह कोर्स फीस के ऐतबार से भी निहायत सहल है; सिर्फ 1000 रुपये एक बार अदा करना होगी, ताकि ज्यादा से ज्यादा शौकीन और संजीदा तालिबात इससे फायदा उठा सकें। यह मौका खास तौर पर इस्लामी बहनों के लिए है, जो अपने कलम को दीन, अखलाक और समाजी भलाई के लिए इस्तेमाल करना चाहती हैं।

अगर आप भी चाहती हैं कि आपकी तहरीर आपकी पहचान बने, आपके अल्फाज मकसद के हामिल हों और आपका कलम खैर का जरिया बने, तो नवा-ए-कलम का यह मजमून निगारी कोर्स आपके लिए एक मजबूत आगाज साबित हो सकता है।

राब्ता: 9005224744
नवा-ए-कलम