ज़िंदगी में बहुत से साथी आते और चले जाते हैं, मगर एक ऐसा रफ़ीक़ है जो हमेशा साथ रहे, जो कभी बेवफ़ाई नहीं करते, जो हर हाल में फ़ायदा ही देती है, इस का नाम है "किताब"।
किताब एक ऐसा ख़ज़ाना है जो इंसान के शऊर को रौशनी देती है, उस के ख़्यालात को जिला बख़्शती है और उसे तहज़ीब-ओ-वक़ार का आला मेयार अता करती है। एक अच्छी किताब इंसान को माज़ी से जोड़ती है, हाल में रहनुमाई करती है और मुस्तक़बिल का शऊर देती है।
किताब और इल्म की फ़ज़ीलत क़ुरआन-ओ-हदीस की रौशनी में:
अल्लाह तआला ने इंसान को इल्म के ज़रिए फ़ज़ीलत अता फ़रमाई और इस इल्म को महफ़ूज़ रखने और फैलाने का अहम तरीन ज़रीया किताबें हैं। क़ुरआन-ए-करीम और अहादीस-ए-मुबारका में कई मुक़ामात पर इल्म और किताब की अज़मत का बयान मौजूद है:
पहली वह्य: पढ़ने का हुक्म
अल्लाह तआला ने सब से पहला हुक्म "पढ़ने" का दिया
اِقْرَاْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِیْ خَلَقَۚ
[सूरह अलक़:1]
तर्जुमा-ए-कंजुल ईमान:
पढ़ो अपने रब के नाम से जिस ने पैदा किया।
यह आयत इस बात को वाज़ेह करती है कि इस्लाम में इल्म और किताब की कितनी अहमियत है।
अल्लाह तआला ने इंसान को पहले ही लम्हे में मुताला का हुक्म दे कर इल्म की तलब को दीन का बुनियादी रुक्न क़रार दिया।
इल्म वालों का बुलंद मक़ाम
अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
یٰۤاَیُّهَا الَّذِیْنَ اٰمَنُوْۤا اِذَا قِیْلَ لَكُمْ تَفَسَّحُوْا فِی الْمَجٰلِسِ فَافْسَحُوْا یَفْسَحِ اللّٰهُ لَكُمْۚ-وَ اِذَا قِیْلَ انْشُزُوْا فَانْشُزُوْا یَرْفَعِ اللّٰهُ الَّذِیْنَ اٰمَنُوْا مِنْكُمْۙ-وَ الَّذِیْنَ اُوْتُوا الْعِلْمَ دَرَجٰتٍؕ-وَ اللّٰهُ بِمَا تَعْمَلُوْنَ خَبِیْرٌ
[सूरह मुजादला:11]
तर्जुमा-ए-कंजुल ईमान:
ऐ ईमान वालो जब तुम से कहा जाए मजलिसों में जगह दो तो जगह दो अल्लाह तुम्हें जगह देगा और जब कहा जाए उठ खड़े हो तो उठ खड़े हो अल्लाह तुम्हारे ईमान वालों के और उन के जिन को इल्म दिया गया दर्जे बुलंद फ़रमाएगा और अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है।
यह आयत हमें बताती है कि जो लोग इल्म रखते हैं और किताबों से जुड़े रहते हैं, अल्लाह तआला उन के दरजात बुलंद फ़रमाता है।
इल्म हासिल करना फ़र्ज़ है
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
طَلَبُ العِلْمِ فَرِيضَةٌ عَلَى كُلِّ مُسْلِمٍ
इल्म हासिल करना हर मुसलमान मर्द-ओ-औरत पर फ़र्ज़ है।
[सुनन इब्न माजा: 224]
यह हदीस वाज़ेह करती है कि इल्म हासिल करना कोई मामूली अमल नहीं बल्कि हर मुसलमान पर लाज़िम है कि वह किताबों के ज़रिए इल्म हासिल करे और अपनी शख़्सियत में निखार पैदा करे।
मुताला ज़ेहन-ओ-रूह की ग़िज़ा:
जिस तरह जिस्म की सेहत के लिए मुतवाज़िन ग़िज़ा ज़रूरी है, इसी तरह ज़ेहन और रूह की तरक़्क़ी के लिए अच्छी किताबों का मुताला लाज़मी है।
एक दानिश्वर ने कहा:
मुझे बताओ तुम क्या पढ़ते हो, मैं बता दूँ गा तुम कौन हो!
किताबें पढ़ने से इंसान की फ़िक्र गहरी और सोच वसीअ होती है। जो लोग किताबों के दोस्त होते हैं, वह कभी तन्हा नहीं होते।
अज़ीम शख़्सियात और किताबों से मुहब्बत
दुनिया के अज़ीम मुफ़क्किरीन और कामयाब लोग हमेशा किताबों के दीवाने रहे हैं। अगर किसी की इल्मी-ओ-फ़िक्री लियाक़त का पता लगाना हो तो इस के मुताले से लगाया जा सकता है। यही वजह है कि दौर-ए-माज़ी जब ग़ुर्बत इस क़दर थी कि उन के घरों में लाइट नहीं होती थी। वह लोग किताबों को चाँद की रौशनी में पढ़ा करते थे। क़ुरआन ने अहल-ए-किताब को क्या दरस दिया? अल्लाह तआला ने अहल-ए-किताब के बारे में फ़रमाया:
مَثَلُ الَّذِیْنَ حُمِّلُوا التَّوْرٰىةَ ثُمَّ لَمْ یَحْمِلُوْهَا كَمَثَلِ الْحِمَارِ یَحْمِلُ اَسْفَارًاؕ-بِئْسَ مَثَلُ الْقَوْمِ الَّذِیْنَ كَذَّبُوْا بِاٰیٰتِ اللّٰهِؕ-وَ اللّٰهُ لَا یَهْدِی الْقَوْمَ الظّٰلِمِیْنَ
[सूरह जुमा: 8 ]
तर्जुमा-ए-कंजुल ईमान:
उन की मिसाल जिन पर तौरेत रखी गई थी फिर उन्हों ने इस की हुक्म बरदारी न की गधे की मिसाल है जो पीठ पर किताबें उठाए क्या ही बुरी मिसाल है इन लोगों की जिन्हों ने अल्लाह की आयतें झुठलाईं और अल्लाह ज़ालिमों को राह नहीं देता।
यह आयत इस बात को वाज़ेह करती है कि सिर्फ़ किताबें रखना काफ़ी नहीं, बल्कि उन से इल्म हासिल करना और अमल करना ज़रूरी है।
किताब से ग़फ़लत ज़वाल का सबब:
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
إذا ضُيِّعَتِ الأمانة فانتظر الساعة
जब अमानत ज़ाए कर दी जाए तो क़यामत का इंतिज़ार करो।
[सही बुख़ारी: 59]
इल्म और किताबों को छोड़ देना उम्मत के ज़वाल का सबब बन सकता है। क्यों कि किताब एक ऐसी अज़ीम साथी है जो कभी बेवफ़ाई नहीं करती, न थकती है और न शिकायत करती है। जो लोग किताब को अपना रफ़ीक़ बनाते हैं, वह दुनिया-ओ-आख़िरत में कामयाब होते हैं।
अगर आप भी चाहते हैं कि आप की सोच गहरी हो, आप की शख़्सियत बा-वक़ार हो, आप के उरूज का सितारा बुलंदी पर हो, और आप दुनिया में एक अलग मक़ाम हो तो किताबों को अपना बेहतरीन दोस्त बना लें।
यह वह साथी हैं जो कभी धोका नहीं देती, जो हमेशा सच का साथ देती हैं, और जो हर हाल में आप के इल्म-ओ-अमल को बेहतर से बेहतरीन बनाती हैं।
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हम सब को दीनी-ओ-इल्मी किताबों के पढ़ने और समझने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए आमीन या रब्बुल आलमीन