جنة की राह सब को दिखाकर चले गए
इल्म ओ अमल की शमा जला कर चले गए

वो पीर ज़ुल्फ़िकार जो पीरों के पीर थे
ऐसे गए कि सब को रुलाकर चले गए

अरवाह-ए-बे सुकून को दरस-ए-सुकून दिया
उजड़े हुए दिलों को बसाकर चले गए

तारीक रास्तों में जलाते रहे चिराग़
तक़वा का जाम सब को पिलाकर चले गए

दुनिया के हर फ़रेब से बच कर रहे सदा
कितनों को राह-ए-हक़ पे चला कर चले गए

ले कर चले जहाँ में तसव्वुफ़ का वो عَلَم
लाखों को नक़्शबंद बनाकर चले गए

जो दूर थे ख़ुदा से, ख़ुदा के रसूल से
उन को ख़ुदा की राह बताकर चले गए

सुनते थे हम भी आप की तक़रीर दिल पज़ीर
शीरीं ज़बां में दीन सुनाकर चले गए

अज़हर जो रब से दूर थे नज़दीक कर दिया
बन्दों का रिश्ता रब से मिलाकर चले गए

अज़: आफ़ताब अज़हर सिद्दीक़ी
किशन गंज, बिहार

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