लेखन सैयद खलील अहमद 

एक सफर के दौरान इमाम अहमद बिन हनबल रहमतुल्लाह ताला अलैह किसी शहर में रात गुजारने के लिए मस्जिद में दाखिल हुए।

मगर मुअज्जिन या खादिम-ए-मस्जिद ने उन्हें पहचाना नहीं और कहा: “यहां रात गुजारना मना है।”

इमाम अहमद रहमतुल्लाह ने नरमी से फरमाया:

“मैं सिर्फ चंद लम्हों के लिए यहां ठहर

 जाऊं?”
मगर वह शख्स बज़िद रहा और उन्हें मस्जिद से बाहर निकाल दिया।

इमाम अहमद रहमतुल्लाह ने मस्जिद के सहन में लेटने की कोशिश की तो वहां से भी निकाल दिया गया। इसी दौरान करीब ही एक नानबाई मौजूद था।

उसने इमाम अहमदؒ की हालत देखी और कहा:

“आइए, मेरे घर चलिए, मैं आपको अपने यहां पनाह देता हूं।”

जब इमाम अहमद बिन हनबल रहमतुल्लाह नानबाई के घर पहुंचे तो देखा कि वह शख्स हर वक्त "अस्तगफिर अल्लाह" पढ़ रहा है।

रोटियां पकाते वक्त, गूंथते वक्त, उठते बैठते हर लम्हा उस की जबान पर इस्तगफार जारी था।

इमाम अहमद रहमतुल्लाह ने पूछा:
“तुम्हें इस कसरत-ए-इस्तगफार से क्या फायदा हुआ?”

नानबाई ने जवाब दिया:
“जब से मैंने यह मामूल बनाया है, जो भी दुआ मांगता हूं, अल्लाह ताला कुबूल फरमा देता है —
सिवाए एक दुआ के जो अभी तक पूरी नहीं हुई।”

इमाम अहमद रहमतुल्लाह ने फरमाया:
“वह कौन सी दुआ है?”

नानबाई ने कहा:

“मैंने अल्लाह से दुआ की थी कि मुझे इमाम अहमद बिन हनबलؒ की जियारत नसीब हो।”

यह सुन कर इमाम अहमदؒ की आंखों में आंसू आ गए और फरमाया:
“सुब्हान अल्लाह! मैं ही अहमद बिन हनबल हूं।
अल्लाह ने मुझे तुम्हारे दरवाजे तक खींच लाया ताकि तुम्हारी दुआ कुबूल हो जाए!”

( रजब अल-हनबली , तबकात अल-हनाबिला ५४/१ ,
इब्न अल-जौजी, मनाकिब अल-इमाम अहमद, पृ १९०)

अल्लाहुम्मा अजअलना मिन अल-मुस्तगफिरिन अस-सादिकिन।