इस्लाम एक मुकम्मल ज़ाब्ता-ए-हयात है जो मर्द व औरत दोनों को मसावी अहमियत देता है और हर एक को अपनी सलाहियतों के मुताबिक किरदार अदा करने की तरगीब देता है।
इस्लामी तारीख गवाह है कि खवातीन ने दीनी खिदमात में नुमायां किरदार अदा किया है।
आज के दौर में भी अगर खवातीन को सही रहनुमाई और मौके दिए जाएं तो वो उम्मत-ए-मुस्लिमा की इस्लाह और फलाह में बेहतरीन किरदार अदा कर सकती हैं।
इस्लाम में खवातीन का मकाम:
कुरान व सुन्नत में खवातीन को अज़ीम मकाम दिया गया है। उन्हें दीन के हुसूल और उसकी तबलीग का हक दिया गया है।
कुरान-ए-करीम में अल्लाह ताला इरशाद फरमाता है:
وَالْمُؤْمِنُوْنَ وَالْمُؤْمِنٰتُ بَعْضُهُمْ اَوْلِیَآءُ بَعْضٍۘ-یَاْمُرُوْنَ بِالْمَعْرُوْفِ وَیَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَیُقِیْمُوْنَ الصَّلٰوةَ وَیُؤْتُوْنَ الزَّكٰوةَ وَیُطِیْعُوْنَ اللّٰهَ وَرَسُوْلَهٗؕ-اُولٰٓىٕكَ سَیَرْحَمُهُمُ اللّٰهُؕ-اِنَّ اللّٰهَ عَزِیْزٌ حَكِیْمٌ
[सूरۃ التوبہ: 71]
तर्जुमा-ए-कंजुल ईमान:
और मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें एक दूसरे के रफीक हैं, भलाई का हुक्म देते और बुराई से मना करते हैं और नमाज़ कायम रखते हैं और ज़कात देते हैं और अल्लाह व रसूल का हुक्म मानते हैं। ये हैं जिन पर अनकरीब अल्लाह रहम करेगा। बेशक अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है।
इस आयत में मर्द व औरत दोनों को नेकी का हुक्म देने और बुराई से रोकने का ज़िम्मेदार करार दिया गया है।
इस से वाज़ेह होता है कि खवातीन भी दीन की दावत और इस्लाह-ए-मुआशरा में शरीक हैं।
तारीख में खवातीन की इल्मी खिदमात:
इस्लामी तारीख में बेशुमार ऐसी खवातीन गुजरी हैं जिन्होंने इल्म-ए-दीन हासिल करने और उसे फैलाने में अहम किरदार अदा किया।
हज़रत आइशा सिद्दीका रज़ी अल्लाह अन्हा:
आप हदीस और फिकह में बुलंद मकाम रखती थीं। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:
خُذُوا نِصْفَ دِينِكُمْ عَنْ هَذِهِ الْحُمَيْرَاءِ
[मुसनद अहमद: 26359]
अपने दीन का आधा हिस्सा इस (हज़रत आइशा) से हासिल करो।
आप से दो हजार दो सौ दस (2210) अहादीस मरवी हैं, और सहाबा किराम रज़ी अल्लाह अन्हुम अहम मसाइल में आप से रुजू किया करते थे।
हज़रत उम्म सलमा रज़ी अल्लाह अन्हा:
आप फिकह और मसाइल-ए-दीन में गहरी बसीरत रखती थीं और बहुत सी अहादीस रिवायत कीं।
हज़रत उम्मे अतिया रज़ी अल्लाह अन्हा:
आपने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बराहे रास्त इल्म हासिल किया और कई अहादीस रिवायत कीं।
खवातीन की तालीम का इस्लामी हुक्म:
इस्लाम खवातीन को दीनी तालीम हासिल करने की न सिर्फ इजाज़त देता है बल्कि इस की तरगीब भी देता है। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है:
طَلَبُ الْعِلْمِ فَرِيضَةٌ عَلَى كُلِّ مُسْلِمٍ
[सुनन इब्न माजा: 224]
इल्म हासिल करना हर मुसलमान मर्द और औरत पर फर्ज़ है।
यह हदीस वाज़ेह करती है कि खवातीन को भी इल्म-ए-दीन हासिल करने का पूरा हक है।
आज के दौर में मुस्लिम खवातीन को दरपेश मसाइल:
दीनी तालीम से दूरी:
बहुत सी खवातीन दीनी तालीम से महरूम हैं और वो सिर्फ दुनियावी तालीम को फौकियत देती हैं। दुनियावी तालीम के अंदर बड़ी बड़ी डिग्रियां हासिल कर ली हैं लेकिन कुरान व नमाज़ पढ़ने का शऊर नहीं है। इन डिग्रियों का कोई फायदा नहीं अगर अल्लाह रब्बुल इज्जत की बंदगी का तरीका न आए।
चूंकि दुनियावी चीजें आरज़ी हैं, बाकी रहने वाली चीज दीन-ए-इस्लाम है। इसलिए खवातीन-ए-इस्लाम को चाहिए कि वो दीनी शऊर को अपने अंदर पैदा करें और अपने असलाफ की खवातीन की तरह मिसाली किरदार अदा करें।
अलबत्ता, इल्म के मैदान में जब औरत कदम रखे तो बे हयाई के साथ नहीं बल्कि इस्लामी तालीमात को पेशे नज़र रखते हुए और इस्लामी हुदूद की पासदारी करते हुए।
खवातीन की दीनी खिदमात को फरोग देने की जरूरत:
मुसलमान खवातीन को चाहिए कि वो दीनी तालीम हासिल करें और उसे दूसरों तक पहुंचाएं। जैसे कि आलिमा कोर्स करवाएं ताकि हमारे आस पास की खवातीन दीनी उलूम में महारत हासिल करें और शरीयत-ए-इस्लामिया को समझ सकें।
अगर आस पास कोई जरिया न हो तो ऑनलाइन खवातीन-ए-इस्लाम को पढ़ाएं ताकि जो बहनें और माएं आज के इस पुरफितन दौर में ऑनलाइन बे हयाई व बुराई की तरफ माइल हो रही हैं, उन्हें बचाया जा सके।
यह बात वाज़ेह रहे कि खवातीन की दीनी खिदमात में मर्दों की शमूलियत न हो, चाहे वो ऑनलाइन हो या ऑफलाइन। क्यों कि हम जिन्स से लोग बिला खौफ व खतर मिला करते हैं और दीनी तालीम हासिल करने में कोई खौफ पैदा न हो।
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:
لا يَخْلُوَنَّ رَجُلٌ بِامْرَأَةٍ إِلَّا مَعَ ذِي مَحْرَمٍ
[सही बुखारी: 5233]
कोई मर्द किसी औरत के साथ तन्हाई में न बैठे, मगर यह कि उसके साथ कोई महरम हो।
यह हदीस खवातीन की दीनी खिदमात में हुदूद का ताय्युन करती है, जिस के जरिए खवातीन इज्जत व इस्मत की हिफाजत के साथ दीन की खिदमत कर सकती हैं।