हमारे मुल्क हिंदुस्तान में हिजाब का मसला वक़्तन फ़वक्तन ज़ेरे बहस आता रहता है। बा'ज़ लोग हिजाब को गैर ज़रूरी समझते हैं और इसे औरत के लिए कैद खाना बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि हिजाब औरत की इज्जत व इस्मत का मुहाफ़िज़ है।

अफ़सोस का मक़ाम यह है कि हिजाब को सबसे ज्यादा खतरा किसी और से नहीं बल्कि हमारी अपनी जहालत, बेतवज्जुही, बे अमली और नाकदरी से है।

अगर हमने अपने घरों में शरई पर्दे को नाफ़िज़ न किया तो मुआशरती बिगाड़ का रास्ता हम खुद हमवार करेंगे।

हिजाब को खतरा कहां से है?

हिजाब को खतरा हुकूमत या फिरका परस्त जमातों से नहीं, बल्कि हमारी बे अमली से है।

कवानीन तब बनते हैं जब हमारी बदअमालियां सामने आती हैं।

इसलिए हमें सोचना होगा कि क्या हमने अपने घरों में शरई पर्दे का निजाम कायम किया है?

अगर हम अपनी बेटियों को नामुनासिब लिबास पहना कर मखलूत तालीमी इदारों में भेजते हैं तो इसके जिम्मेदार हम खुद हैं।

इस पर आवाज उठाने वालों से मुतालबा बाद में करें, पहले अपने घरों में इस्लामी अहकाम को जिंदा करें।

मुआशरती बिगाड़ की असल वजह:

डाउरी केस और ट्रिपल तलाक जैसे कवानीन हमारी बदअमालियों की वजह से बने।

जब हम अपनी बेटियों को बेपर्दा रखते हैं, गैर महरमों के सामने पेश करते हैं, और मुआशरती तकरीबात में हुस्न व जमाल की नुमाइश करवाते हैं तो इसका अंजाम यही होगा कि बेहयाई आम होगी और मुआशरती बिगाड़ बढ़ता जाएगा।

इसलिए वक़्त आ गया है कि:

अपने घरों में शरई माहौल पैदा करें।

नौजवान बेटियों और बीवियों को चचा ज़ाद या खाला ज़ाद भाइयों से पर्दा करवाएं।

हमारे मुआशरती रवैये ही इस बिगाड़ की असल वजह हैं, हमें अपनी इस्लाह करनी होगी।

तुर्की के मदारिस में जब कोई लड़की बुलूगत को पहुंचती है तो वह अपने जेब खर्च से बुरका खरीदती है।

मदरसे में उसके लिए खुसूसी तकरीब मुनअकिद होती है, जिसमें वह अहद करती है कि वह बुरके को कभी बदनाम नहीं करेगी और हर हाल में शरई पर्दे की पाबंदी करेगी।

तुर्की का यह अज़ीम नमूना हमें यह सबक देता है कि अगर हम अपनी नस्लों में दीनी शऊर पैदा करें तो कोई कुव्वत उन्हें इस्लामी इकदार से महरूम नहीं कर सकती।

लेकिन अफसोस! हमारे मुआशरे का हाल तो यह है कि:

काली चादर ओढ़ लेना या चंद करीबी नामहरमों से पर्दा कर लेना ही पर्दा समझ लिया जाता है, जबकि असल पर्दा वह है जो दिल व दिमाग में रासिख हो जाए।

मर्दों की जिम्मेदारी:

पर्दे की जिम्मेदारी सिर्फ औरतों पर नहीं बल्कि मर्दों पर भी है।

मर्दों को हमेशा यह सोचना चाहिए कि:

हम में से कितने ऐसे हैं जो बाजार में अपनी निगाहें नीची रखते हैं?

अगर हमारी बहन के साथ कोई गलत हरकत करे तो यह जुर्म है, लेकिन अगर हम करें तो कोई मसला नहीं?

इसलिए हमें सबसे पहले अपनी इस्लाह करनी होगी, क्योंकि:

"जो कौम अपने अंदर के फिरऔन को खत्म नहीं कर सकती, वह बाहर के फिरऔन का मुकाबला नहीं कर सकती।"

अमली इकदामात:

आज से ही इन कामों को अपनी जिम्मेदारी बनाएं:

अपने घरों में शरई पर्दे का माहौल कायम करें।

अपनी बेटियों को छोटी उम्र से पर्दे की तरगीब दें।

इस्लामी तालीम व तरबियत को आम करें।

अपनी निगाहों की हिफाजत करें।

अल्लाह वालों की सोहबत इख्तियार करें और दीनी कामों में लग जाएं।

मसला-ए-हिजाब का हल शिकायत करने में नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारियों को समझने और उन पर अमल करने में है।

अगर हमने अपने घरों में पर्दे को जिंदा न किया तो बाहर के हालात कभी नहीं बदलेंगे।

अल्लाह ताला से दुआ है कि वह उम्मत-ए-मुस्लिमा को शरई पर्दे की अजमत को समझने और उसे अपनी जिंदगियों में नाफ़िज़ करने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।