तख़स्सुस फ़ि अल-इफ़्ता में "रद्द अल-मुहतार" की अहमियत:

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इफ़्ता के काम में "रद्द अल-मुहतार" की बहुत ज़्यादा अहमियत है जो अल्लामा ख़सकफ़ीؒ की किताब ”दुर्रे मुख्तार“ पर अल्लामा शामीؒ का लिखा हुआ हाशिये है। जिस तरह इस किताब का मतन, इस की शरह तमाम कुतुब-ए-फ़िक़्ह में इम्तियाज़ी मुक़ाम रखता है, इसी तरह इस का हाशिये भी तमाम हवासी में सब से बेहतर और जामे है।

मुफ़्ती अबुलुबाबा शाह मंसूर साहिब दामत बरकातहुम ने ”आदाब-ए-फ़तवा नवीसी“ में ”रद्द अल-मुहतार“ के मुकम्मल तार्रुफ़ के साथ इस की अहमियत की चंद वुजूहात भी बयान की हैं, जिन का ख़ुलासा तालिब-ए-इल्म साथियों के सामने रखना अहम है।


इस हाशिये की अहमियत की वुजूहात दर्ज ज़ैल हैं:

1। पहली वजह यह है कि अल्लामा शामी ؒ दूसरे मुसन्निफ़ीन से मुताख़िर हैं, उन्होंने पिछले तमाम फ़ुक़्हा की किताबों को सामने रख कर यह किताब तस्नीफ़ की है, लिहाज़ा इस किताब में फ़ुक़्हा उम्मत की बारह सदियों की मेहनत और तहक़ीक़ात का निचोड़ आगया है।

2। दूसरी वजह इस किताब का मुस्तनद होना है। मुसन्निफ़ ने कोई बात नक़ल करते वक़्त सिर्फ़ नक़ल पर एतमाद नहीं किया, बल्कि नक़ल के साथ इस बात का खूब इल्तिज़ाम किया है कि किस क़ौल का क़ाइल-ए-अव्वल कौन थे और इस क़ाइल की अपनी असली इबारत क्या है? क्योंकि कभी नाक़िल-ए-अव्वल से ग़लती हो जाती है, बाद वाले हज़रात को इल्म नहीं होता और वह नाक़िल-ए-अव्वल पर एतमाद करते चले जाते हैं और यूँ वह ग़लती सदियों तक चली आती है। इस की कुछ मिसालें अल्लामा शामीؒ ने ”शरह उक़ूद रस्म अल-मुफ़्ती “ में बयान की हैं।

3। तीसरी वजह यह है कि यह किताब निहायत जामे है। अल्लामा शामीؒ की आदत यह है कि साबिका तमाम अक़वाल व मबाहिस को सामने रख कर ततबीक़ या तरजीह की सूरत बयान फरमाते हैं। अगरचे मुतक़द्दिमीन की किताबें रुसूख फ़ि अल-इल्म में बहुत बढ़ कर हैं, लेकिन मुफ़्ती के लिए ”रद्द अल-मुहतार“ से इस्तग़ना नहीं है।

दूसरी कुतुब-ए-फ़िक़्ह से फ़तवा देने के लिए बहुत सी कुतुब को देखना पड़ता है, क्योंकि तरजीह में इख़्तिलाफ़ हो सकता है या कोई क़ौल मुतलक़ा ज़िक्र होता है, जिस के अंदर अहम क़ैद होती है और वह क़ैद किसी दूसरे फ़क़ीह ने ज़िक्र की होती है। लेकिन ”रद्द अल-मुहतार “ का मुताला करने वाला इतनी मेहनत बसे बेनियाज़ हो जाता है और ग़लती का इमकान भी कम से कम हो जाता है। इसी लिए यह किताब आज तक अह्ल-ए-फ़तवा हज़रात के लिए मरजा है।

4। चौथी वजह यह है कि अल्लामा शामीؒ ने निहायत एहतिआत से काम लिया है, उन से इफ़रात व तफ़रीत नहीं देखा गया।

मुफ़्ती आज़म हज़रत मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी ؒ फरमाते हैं:

”अल्लामा इब्न आबिदीन शामीؒ इंतिहाई वसी अल-मुताला होने के बावजूद इस क़दर तक़वा शेआर और मोहतात बुज़ुर्ग हैं कि आम तौर से अपनी ज़िम्मेदारी पर कोई मसला बयान नहीं करते, बल्कि जहां तक मुमकिन होता है अपने से पहले की किताबों में किसी न किसी के हवाले से बयान फरमाते हैं। अगर इन अक़वाल में बज़ाहिर तआरुज़ हो तो इन को रफ़ा करने के लिए भी हत्ता अल-इमकान किसी दूसरे फ़क़ीह के क़ौल का सहारा लेते हैं और जब तक बिल्कुल मजबूरी न हो जाए खुद अपनी राय ज़ाहिर नहीं फरमाते। और जहां ज़ाहिर फरमाते हैं वहां बिलउमूम आखिर में ”ताम्मुल या तदब्बुर“ कह कर खुद बरी हो जाते हैं और ज़िम्मेदारी पढ़ने वाले पर डाल देते हैं। यही वजह है कि बस्सा औक़ात उलझे हुए मसाइल में हम जैसे लोगों को उन की किताब से मुकम्मल शिफा नहीं हो पाती। लेकिन यह तरीक़ा ”रद्द अल-मुहतार“ में रहा है, मगर चूंकि अल्लामा शामीؒ ने ”अल-बहर अल-राइक़“ का हाशिये ”मिनहत अल-ख़ालिक़“ और ”तनक़ीह अल-हामिदिया“ बाद में लिखा है, इस लिए इन किताबों में मसाइल ज़्यादा मुनक़्क़ह अंदाज़ में आए हैं, जिन्हें पढ़ कर फैसला कुन बात मालूम हो जाती है।“(अल-बलाग़ मुफ़्ती आज़म नंबर)


किताब से इस्तिफ़ादा का तरीक़ा:

1। सब से पहले मसला के मज़ान मुतवक़्क़ेआ मुतअय्यन करें, यानी यह मसला किस किताब और किस बाब से ताल्लुक़ रखता है? सलवात से, या ज़कात से या बुयू से या हज़र व इबाहत वग़ैरह से।

2। इस के बाद पहले फ़ेहरिस्त में देखें, क्योंकि शामिया की फ़ेहरिस्त में अहम मसाइल पर बाक़ायदा "मतालिब" के नाम से उनवानत क़ायम किए गए हैं। मुमकिन है मसला किसी मतलब के तहत बऐनही मिल जाए।

3। अगर मतालिब में मसला न मिले तो मुताल्लिक़ा किताब, बाब या फ़स्ल का मतन देखें। वहां अगर सराहत से न मिले तो मतन के किसी मसला से मुनासिबत हो तो इस की शरह देखें और फिर हाशिये भी देख लें।

4। अगर इन मक़ामात पर भी मसला न मिले तो तक़रीबन हर बाब के आखिर में "फ़ुरू" के उनवान से अहम मुतफ़र्रिक मसाइल होते हैं, इन में देखें। इस के बाद अशआर होते हैं, यह भी अहम मसाइल पर मुश्तमिल होते हैं, इन का हाशिये देखें।

5। अगर फिर भी मसला न मिले तो "किताब अल-फ़राइज़" से पहले "मसाइल शत्ती" के उनवान के तहत हर बाब के रह जाने वाले मसाइल को ज़िक्र किया गया है, इन में तलाश करें। फिर भी न मिले तो जहद मुसलसल जारी रखें और साबिका तरतीब का एआदा करें।

जब भी मसला मिल जाए तो सियाक़ व सिबाक़ की रौशनी में मसला की मुकम्मल बहस पढ़ना ज़रूरी है, यानी मतन, शरह और हाशिये। बल्कि जहां बहस ख़त्म हो रही हो, इस से भी थोड़ा आगे तक देखें, क्योंकि बस्सा औक़ात क़ुयूद और तरजीह वग़ैरह आखिर में बयान होती है। अगर मुसन्निफ़ ने "कमा सैजी" लिखा हो या "कमा ज़करना" वग़ैरह लिखा हो तो इस मक़ाम को तला श करके ज़रूर देखें।

फ़तावा शामी की खुसूसियत में से एक नुमाया खुसूसियत यह है कि अल्लामा शामी रहमतुल्लाह अलैह ने अहम मसाइल के लिए मतालिब के नाम से मुस्तक़िल उनवानत क़ायम करके निहायत सैर हासिल बहस व तहक़ीक़ फरमाई है। इन मतालिब की अहमियत से हर तख़स्सुस के तालिब-ए-इल्म बखूबी वाक़िफ़ है। हमारे इस दौर में, जब तुलबा की इल्मी इस्तेदाद बतदरीज कम होती जा रही है, इस ज़रूरत को सामने रखते हुए मुफ़्ती फ़रीद कावी की निगरानी में तुलबा-ए-तख़स्सुस फ़ि अल-इफ़्ता ने मतालिब-ए-शामिया पर निहायत उम्दा काम किया है और इन मतालिब का ख़ुलासा उर्दू ज़बान में मुरत्तब किया है।