अज़कलम : मुफ़्ती मोहम्मद तस्लीम उद्दीन अल-महमूदी

अल्फ़ाज़ की मअनवियत व अहमियत से इनकार मुमकिन ही नहीं। दरअसल इंसानी हयात का सारा नक्शा इन्हीं अल्फ़ाज़ के लतीफ़ व दक़ीक़ ताने बाने में पोशीदा है। इंसान की नफ़्सी कैफ़ियात, उसका शऊर व अदराक, उसकी मुहब्बत व अदावत, उसकी मुसर्रत व हुज़्न—सब कुछ अल्फ़ाज़ के नाज़ुक धागों में मुंसलिक है। यही अल्फ़ाज़ हैं जो दिल व दिमाग पर अपनी अनमिट छाप छोड़ते हैं; कभी यह रूह को सकीनत अता करते हैं और कभी इज़्तिराब की आग भड़का देते हैं।

अल्फ़ाज़ की कायनात बड़ी नज़ाकत आश्ना और निरालगी से लबरेज़ है। एक ही लफ़्ज़ कभी मरहम बन कर ज़ख़्म मुंदमिल कर देता है और वही लफ़्ज़ किसी के दिल को कारी ज़ख़्म पहुंचा देता है। एक जुमला किसी के लिए चराग़-ए-हिदायत बन सकता है और वही जुमला किसी को शुकूक व ओहाम की ज़ुल्मतों में धकेल देता है।

इसी लिए कहा जाता है कि हक़ीक़ी कुव्वत अल्फ़ाज़ के इंतख़ाब में मुज़्मिर है। मौज़ूं और मुनासिब अल्फ़ाज़ इंसान की शख्सियत को जलाल व वक़ार अता करते हैं, जबकि नासाज़ और बिगड़े हुए अल्फ़ाज़ पूरी शख्सियत की इमारत को ज़मीं बोस कर देते हैं। अल्फ़ाज़ अगर आईना हों तो बातिन की तस्वीर गिरी करते हैं और अगर हथियार हों तो जहान की तक़दीर बदलने पर क़ादिर हो जाते हैं।

यही वजह है कि रब्ब-ए-कायनात ने भी अपने अबदी पैग़ाम को अल्फ़ाज़ के क़ालिब में ढाला—यानी क़ुरान-ए-हकीम, जो अल्फ़ाज़ का ऐसा मोजज़ा नुमा इम्तेज़ाज है जिस की ज़िया रहती दुनिया तक इंसानियत के क़ुलूब व अज़हान को मुनव्वर करती रहेगी।

अल्फ़ाज़ ही तख़लीक़ का संग-ए-बुनियाद हैं। यह बिखरे हुए दिलों को यकजा करते हैं, उजड़ी हुई दुनिया को आबाद करते हैं और नई जहानों के दर वा करते हैं। अल्फ़ाज़ महज़ ज़बान से अदा किए जाने वाले जुमले नहीं बल्कि यह एक कायनात हैं, एक कुव्वत हैं, एक मुक़द्दस अमानत हैं। अगर इन्हें हुस्न-ए-तदबीर से बरता जाए तो यह ज़िन्दगी को जन्नत अल-फ़िरदौस बना देते हैं और अगर इन्हें बिगाड़ के साथ इस्तेमाल किया जाए तो यही हयात को जहन्नम ज़ार में बदल देते हैं।