अल्लाह पाक ने रसूलुल्लाह ﷺ को मुअल्लिम-ए-इंसानियत बना कर मबऊस फ़रमाया। चुनांचे रसूल-ए-पाक ﷺ का फरमान है:

إِنَّمَا بُعِثْتُ مُعَلِّمًا यानी मैं मुअल्लिम बना कर भेजा गया हूँ। (सुनन इब्न माजा, ज1, स218, रक़म 229 बाब: फ़ज़्ल उल उलमा वल हस अला तलब अल इल्म)


आप ﷺ ने तरबियत-ए-इंसानी के लिए मुख़्तलिफ़ तरीक़े इख़्तियार फ़रमाए, जिन में से एक मुअस्सिर तरीक़ा ”मिसालों के ज़रिए तालीम देना“ है । रसूलुल्लाह ﷺ की तालीमात में मिसालों का इस्तेमाल एक निहायत हकीमाना उसलूब था, जिस के ज़रिए आप ﷺ ने मुश्किल बातों को आम फहम अंदाज़ में समझाया। यह तरीक़ा न सिर्फ समझने में आसान होता है बल्कि ज़ेहन में नक़्श भी हो जाता है। मौज़ू के मुताल्लिक चंद फ़रामीन-ए-मुस्तफ़ा ﷺ मुलाहिज़ा कीजिए :


(1) ज़िक्रुल्लाह न करने वाले की मिसाल:

जो लोग ज़िक्र अल्लाह नहीं करते, उन की मिसाल देते हुए अल्लाह पाक के आख़िरी नबी ﷺ ने फ़रमाया: مَثَلُ الَّذِیْ یَذْكُرُ رَبَّهٗ، وَالَّذِیْ لَا یَذْكُرُ، مَثَلُ الْحَیِّ وَالْمَیِّتِ

तर्जुमा: जो अपने रब का ज़िक्र करता है और जो नहीं करता, दोनों की मिसाल ज़िंदा और मुर्दा की सी है। (सही बुखारी, ज8, स86, रक़म: 6407 किताब: अद दवात, बाब : फ़ज़्ल ज़िक्र अल्लाह अज़्ज़वजल)


जैसे ज़िंदा का जिस्म रूह से आबाद होता है और मुर्दा का जिस्म वीरान, ऐसे ही ज़ाकिर का दिल ज़िक्र से आबाद और ग़ाफ़िल का दिल वीरान होता है।


(2) बग़ैर ज़िक्रुल्लाह के मजलिस से उठने की मिसाल:

जो लोग अपनी मजलिस से अल्लाह का ज़िक्र किए बग़ैर उठते हैं, उन के बारे में नबी करीम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया: مَا مِنْ قَوْمٍ یَقُومُونَ مِنْ مَجْلِسٍ لَا یَذْكُرُونَ اللہ َ فِیْهِ، إِلَّا قَامُوا عَنْ مِثْلِ جِیفَةِ حِمَارٍ، وَكَانَ لَهُمْ حَسْرَةً

तर्जुमा: जो लोग किसी मजलिस से अल्लाह का ज़िक्र किए बग़ैर उठते हैं, वह मुर्दार गधे की मानिंद उठते हैं, और यह उन के लिए हसरत का बाइस होता है। (सुनन अबी दाऊद, ज5, स115, रक़म 4855, किताब अदब , बाब कराहीयत अन यक़ूम अर रजल मिन मजलिसिही वला यज़कुर अल्लाह)


मुफ़्ती अहमद यार खान नईमी रहमतुल्लाह अलैह ने इस की तशरीह में फ़रमाया: गोया यह ग़ाफ़िल लोग मुर्दार गधा खा कर उठे, जो पलीद भी है, हक़ीर भी और शैतान का मज़हर भी, क्योंकि इस के बोलने पर लाहुल ,पढ़ी जाती है। ग़रज़ यह कि अल्लाह के ज़िक्र से ख़ाली मजलिसें मुर्दार गधे की तरह हैं और इन में शिरकत करने वाले गोया वह मुर्दार खा रहे हैं।(मरातु अल मनाजीह, ज3,स361)


(3) क़ुरान की तिलावत न करने वाले की मिसाल:

दिल एक लतीफ़ और अजीब चीज़ है, जिस का सही रहना ज़रूरी है। क़ुरान की तिलावत इस दिल को ज़िंदा रखने का ज़रिया है। जो लोग क़ुरान की तिलावत नहीं करते, उन के बारे में अल्लाह पाक के आख़िरी नबी ﷺ ने फ़रमाया: إِنَّ الَّذِیْ لَیْسَ فِیْ جَوْفِهِ شَیْءٌ مِنَ الْقُرْآنِ، كَالْبَیْتِ الْخَرِبِ

तर्जुमा: जिस के सीने में क़ुरान नहीं, वह वीरान घर की तरह है।(जामे तिरमिज़ी, ज5, स35, रक़म 2913 बाब: फ़ज़ाइल अल क़ुरान अन रसूल अल्लाह ﷺ)


जैसे घर इंसान व सामान से आबाद होता है, वैसे ही दिल क़ुरान से आबाद होता है। जो दिल क़ुरान से ख़ाली हो, वह दिल वीरान और बे बरकत होता है।


(4) हाफ़िज़-ए-क़ुरान की मिसाल:

हाफ़िज़-ए-क़ुरान बनना अल्लाह पाक की एक बड़ी नेमत है। अगरचे हिफ़्ज़-ए-क़ुरान फ़र्ज़ नहीं, मगर जब कोई शख्स हिफ़्ज़ करे तो याद रखना इस पर ज़रूरी हो जाता है। चुनांचे रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: إِنَّمَا مَثَلُ صَاحِبِ الْقُرْآنِ، كَمَثَلِ صَاحِبِ الْإِبِلِ الْمُعَقَّلَةِ، إِنْ عَاهَدَ عَلَیْهَا أَمْسَكَهَا، وَإِنْ أَطْلَقَهَا ذَهَبَتْ

तर्जुमा: हाफ़िज़-ए-क़ुरान की मिसाल रस्सी से बंधे ऊंट के मालिक जैसी है, अगर निगरानी करे तो क़ाबू में रहेगा, वरना रस्सी तड़वा कर भाग जाएगा। (सही बुखारी, ज6, स193, रक़म 5031, किताब: फ़ज़ाइल अल क़ुरान, बाब इस्तज़कार अल क़ुरान, व तआहुदहु)


क़ुरान को याद रखने के लिए मुसलसल दोहराना ज़रूरी है, वरना वह दिल से महव हो जाता है।(यानी भुला दिया जाता है) अगर हाफ़िज़ क़ुरान क़ुरान-ए-पाक को दिल में बिठा ले तो वह दुनिया व आख़िरत में कामयाब होता है।


अल्लाह पाक के आख़िरी नबी ﷺ का तरबियती उसलूब इतना जामे और मुअस्सिर है कि आज भी आप ﷺ की दी गई मिसालें दिलों को रोशन करती हैं। आप ﷺ की हिकमत अमली यह थी कि मुश्किल बात को मिसाल के ज़रिए आसान बनाया जाए ताकि आम व ख़ास सब अफ़राद समझ सकें। आज के दौर में इस उसलूब को भी अपनाएं, तो तालीम व दावत मज़ीद मुअस्सिर बन सकती है। हमें भी चाहिए कि हम दीन की बात को लोगों के दिलों में उतारने के लिए हिकमत, मुहब्बत और मिसालों के साथ पेश करें।


अल्लाह पाक हमें अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन बजाहे ख़ातम अन नबीईन ﷺ।


✍🏻 मुहम्मद साएम तालिब कुरैशी