उम्मत की बहू बेटियों का फितना-ए-इर्तिदाद और उसका सद-ए-बाब
क़ारीईन किराम!
इस वक़्त सोशल मीडिया के खूनी पंजों में नौजवान गिरफ्तार हैं, उनका मुस्तकबिल दांव पर लगा हुआ है, नौजवान लड़कियाँ घरों से भाग रही हैं, जिन्सी जरायम आम होते जा रहे हैं, इस्लाम के बारे में शक व शुबह में डाला जा रहा है, इलहाद और बे-दीनी को فروغ मिल रहा है।
हज़रत मौलाना अली मियां नदवी फरमाते हैं कि
अगर किसी मां की गोद से बच्चा छीन लिया जाए तो कोहराम मच जाता है और आज ईमानदार माओं की गोद से बच्चे गैर-ईमानी ज़ेहन साज़ी कर के छीने जा रहे हैं।
(अज़ : मकातिब की अहमियत)
बड़ी तेज़ी के साथ हालात हमारे बच्चों के लिए खतरनाक बनते जा रहे हैं, अगर हम इधर तवज्जोह न दें तो इर्तिदाद और इलहाद का फितना हमारी नस्लों को तबाह कर देगा जिसके आसार शुरू हो चुके हैं, यह वो नाज़ुक वक़्त है कि ख्वाब-ए-गफलत से बाहर निकल कर नस्लों की हिफाज़त के लिए काम करें कि बच्चे गलत सोसाइटी, काबिल-ए-नफरत सोहबतें और गंदे माहौल में वक़्त गुज़ार रहे हैं जिसका नतीजा सिवाए तबाही और बरबादी के कुछ नहीं।
मुल्क के मुख्तलिफ इलाकों से यह रूह फरसा खबरें आ रही हैं कि मुसलमान लड़कियाँ गैर-मुस्लिम लड़कों से शादी कर रही हैं और अपना दीन व ईमान ज़मीर व हया बेच कर अपने खानदान और अपने समाज और मुआशरे पर बदनामी का दाग लगा रही हैं, इस तरह के इक्के दुक्के वाक़यात पहले भी पेश आते रहे हैं लेकिन कुछ अरसे से बाज़ाब्ता प्लानिंग के साथ मुसलमान लड़कियों को जाल में फंसाया जा रहा है और आए दिन इन लड़कियों की तादाद बढ़ती जा रही है।
आजकल अखबारों में और सोशल मीडिया पर लड़कियों के मुर्तद होने और घर से भाग कर गैर-मुस्लिम लड़कों से शादी करने की खबरें बकसरत आ रही हैं और मुल्क के मुख्तलिफ गोशों से आ रही हैं, इसके मुख्तलिफ असबाब हो सकते हैं उनमें से एक बड़ा सबब आज़ादी-ए-निस्वां है, तालीम-ए-निस्वां और आज़ादी-ए-निस्वां के नाम पर इस्लाम दुश्मन अनासिर ने बहुत ही होशियारी से औरतों को घरों से बाहर निकाला, जब कि इस्लामी तहज़ीब में पर्दा की एक खास अहमियत है, इस्लाम का मानना है कि औरत की इस्मत दुनिया की सबसे कीमती सरमाया है, यूनिवर्सिटी और कॉलेज के मखलूत निज़ाम-ए-तालीम ने पर्दा को एक बोझ गर्दाना, बिल आखिर हमारी मुसलमान बहनें पर्दे से आज़ाद हो गईं।
सोशल मीडिया के इस दौर में ईमान के डाकू खामोश तरीके से हमारी आने वाली नस्लों को इलहाद की तरफ ढकेल रहे हैं, अपनी औलाद को ईमान के डाकुओं से बचाएं ताकि हमारी आइंदा नस्लों में भी दीन बाकी रहे, एक मुसलमान के लिए औलाद सिर्फ एक दुनियवी नेमत ही नहीं बल्कि आखिरत का सरमाया और सदका-ए-जारिया हैं बशर्ते कि वो साहिब-ए-ईमान हो, इस वक़्त सारी दुनिया में मुलहिदीन की तादाद सोशल मीडिया के ज़रिया तेज़ी से बढ़ रही है और इसका शिकार आम मुसलमान घरानों के जवां साल बच्चे बच्चियां हो रहे हैं, नौजवानों तक रसाई का सबसे बड़ा ज़रिया कंप्यूटर और मोबाइल फोन है।
अपनी औलाद को बर्बाद होने से बचाना वालिदैन की ज़िम्मेदारी है खुसूसन इस दौर में जब कि टेक्नोलॉजी उरूज पर है जब से मोबाइल में नेट आया है, तन्हाई के गुनाह बहुत बढ़ गए हैं, फहशियत के मनाज़िर इस में देखे जा रहे हैं और जो इस में फंस जाता है फिर वो आसानी के साथ निकलता नहीं और जो उरियानियत के मनाज़िर देख रहे हैं उसका असर उनके दिल व दिमाग पर पड़ेगा, वैसी ही उसकी सोच बनेगी, ख्यालात गंदे तो उसका असर किरदार पर पड़ेगा, वालिदैन को इस जानिब तवज्जोह करने की ज़रूरत है।
इस्लाम और उसकी तालीमात में अजनबी मर्द व औरत या लड़के और लड़कियों के दरमियान दोस्ती का कोई तसव्वुर ही नहीं है, दीन-ए-इस्लाम ज़िना और हराम कारी के इस चोर दरवाजे को हराम करार देता है और सूरत-ए-हाल यह है कि नौखेज़ और कमसिन तुलबा व तालिबात के दरमियान गर्ल फ्रेंड और बॉय फ्रेंड की मलऊन रिवायत फैशन ज़दा रोशन ख्याल और मुहैज्ज़ब होने की अलामत बन चुकी है, इस माहौल में सबसे पहले दिल व निगाह की पाकीज़गी हया और झिजक खत्म हो जाती है, उसकी जगह बेगैरती और बेबाकी बेशर्मी व बे-हयाई उनमें सराइत करती हैं, धीरे-धीरे गुफ्त व शुनीद, बोसो किनार और हम आगोश होते हुए नौबत वहां तक पहुंच जाती है जिसको बयान नहीं किया जा सकता, जिन्सी तस्कीन हासिल किए बगैर उन्हें करार नहीं मिलता, आखिर कार वो वक़्त आता है कि शर्म व हया और गैरत को चाक कर के लड़कियाँ खुद अपने वालिदैन को अपनी पसंद से आगाह करती हैं और उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं, अगर वो मान जाएं तो ठीक वरना यह लड़कियाँ घरों से भाग कर या मुर्तद हो कर अपने बॉय फ्रेंड के साथ कोर्ट मैरिज कर के अपने वालिदैन और पूरे खानदान की इज्जत को दागदार बना देती हैं
आज कमसिन तुलबा व तालिबात के दरमियान गर्ल फ्रेंड और बॉय फ्रेंड की मलऊन रिवायत को रोशन ख्याली और मुहैज्ज़ब होने की अलामत समझा जा रहा है और इसको प्यार का नाम दे दिया गया, इस्लाम में अजनबी मर्द व औरत यानी गर्ल फ्रेंड और बॉय फ्रेंड के दरमियान प्यार व मोहब्बत या दोस्ती का कोई जवाज़ ही नहीं है, लिबरल इज्म और रोशन ख्याली की इस दुनिया में गर्ल फ्रेंड और बॉय फ्रेंड का मतलब आज़ाद शहवत रानी है जब चाहे जहां चाहे जिन्सी हवस पूरी करने में कोई कबाहात नहीं।
स्कूलों कॉलेजों और यूनिवर्सिटी के नौ उम्र तुलबा व तालिबात का अपने घरों से तो कॉलेज के नाम निकलना पढ़ाई के नाम पर पार्कों में जाना या डेटिंग पर जाना वगैरह लड़कियाँ भोली भाली होती हैं यह चंद डेट कुछ फिल्मों और थोड़े बहुत तोहफे तहाइफ से अपना जिस्म मर्दों के हवाले कर देती हैं लड़कियाँ याद रखें कि अक्सर लड़के गर्ल फ्रेंड से शादी नहीं करते और जिस से शादी करना चाहते हैं उसको गर्ल फ्रेंड नहीं बनाते।
इस्लाम में मियां बीवी के अलावा अजनबी मर्द व औरत के दरमियान जिन्सी ताल्लुक ज़िना कहलाता है ज़िना अज़ीम गुनाह और बदतरीन जुर्म है आम तौर पर मुआशरा में सिर्फ बदकारी को ज़िना समझा जाता है जब कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हराम देखने हराम सुनने हराम पकड़ने और हराम जगह तक चल कर जाने को भी ज़िना से ताबीर फरमाया है इसलिए कि यह मुबादियात ज़िना हैं जिसके बाद आदमी अमलन ज़िना में मुब्तिला हो जाता है ज़िना निहायत ही फतीह और मुजीब-ए-कुफ्र अमल है।
खुदारा अब भी वक़्त है अपनी औलादों को जहन्नुम की आग से बचाने की कोशिश करें उनकी आखिरत की फिक्र करें कहीं ऐसा न हो कि कल कयामत के दिन बाइस-ए-जहन्नुम न बन जाए। अल्लाह रब्बुल इज्जत हम सब को दीन की सही समझ अता फरमाए हम सब का खात्मा ईमान पर करें आमीन या रब्बुल आलमीन।।