अबू खालिद बिन नाज़िरुद्दीन कासमी। करीमगंज असम
आंसू क्या हैं? बस मोती हैं, चिपकने वाले, बहने वाले, गरम आंसू, फ़रियाद की ज़बान हैं, पुरानी यादों के तर्जुमान हैं, यह आंसू अनमोल ख़ज़ाना हैं, मस्तूर दोशीज़ा के हुस्न से ज़्यादा हसीन, और हूर से ज़्यादा मक़नून, यह दिल की अथाह गहराइयों से निकलने वाला आब-ए-हयात का चश्मा, सआदतों का सरचश्मा, और आरज़ुओं के सहरा में नख़लिस्तानों का मुज़्दा है, आंसू तन्हाइयों का साथी, दुआओं की क़बूलियत की नवीद, और इंसान के पास ऐसी मता-ए-बे-बहा है जो उसे दीदा-वरी की मंज़िल अता कर देती है।
यह मोती बड़े अनमोल हैं, यह ख़ज़ाना बड़ा गिरां माया है, इनकी क़ीमत यह है कि: ”इन का ख़रीदार कोई और नहीं ख़ुद रहमत परवरदिगार है“, जिस की रात अश्कों से मुनव्वर है, उस का
नसीब दरख़्शंदा है, उस का मुस्तक़बिल ख़ुद-शिनासी और ख़ुद-आगही का हक़दार है, याद रहे कि यह मोती कभी राएगां नहीं जाते! ـ
इंसान के आंसू उस के लिए इदराक की वुसअतें लिखते हैं, रूह की ज़बान आंसू हैं, रूह की नवा अश्क-ए-सहर है, और रूह की परवाज़ को आंसू ही तवानाई अता करते हैं।
ख़िरद की बे-मायगी को सरमाया जुनून अता करने वाला फ़रिश्ता आंसुओं के साथ नाज़िल होता है। आह-ए-सहर गाही आह-ए-रसा का दूसरा नाम है! आंसू ख़ालिक़ और मख़लूक़ के दरमियान पर्दा नहीं रहने देते, यह वह मोती हैं जो इंसान को उस के अपने बातिन से आश्ना करते हैं और चश्म-ए-गौहर बार दरअसल इनायत-ए-परवरदिगार है।
दुनिया के अज़ीम इंसान नाला-ए-नीम शब की दास्तान हैं, राज़ हाए सरबस्ता आशकार हो ही नहीं सकते जब तक आंख अश्क बार न हो, नाला-ए-नीम शब हमेशा के लिए मक़बूल है, बारगाह-ए-समदियत में आंसुओं की दरख़्वास्त रद्द नहीं होती! आंसुओं से ज़माने बदल जाते हैं, नसीब पलट जाते हैं, तूफ़ानों के रुख़ फिर जाते हैं, और गिरदाब में घिरे हुए सफीने साहिल-ए-मुराद तक आपहुंचते हैं, सब से बढ़ कर यह कि अश्कों के मोतियों की यह माला आलम-ए-बाला तक की ख़बर ले आती है,
यह आह-ए-सहर गाही बड़ी गिरां माया शय है; बल्कि यह अल्लाह के बंदों के हाथ में वह हथियार है जिस की मदद से उन ख़ुदा मस्तों ने कारहाए नुमायाँ सर अंजाम दिए और उन का नाम तारीख़ के सफ़हात पर ज़रीं हुरूफ़ में लिखा गयाـ
(*कुछ हाथ नहीं आता बे आह-ए-सहर गाही, सफ़हा: 17, तबअ: इदारा फ़रोग़-ए-इस्लाम, चरया कोट, मऊ, यूपी, इंडिया*)