गफलत के अँधेरे में हिसाब की दस्तक
05 جون، 2026
`मुफ्ती इब्राहिम गिफ़ारी `
प्रबंधक। मदरसाअबूजर गिफारी रजि.
abzghifariedu@gmail.com
﴿اقْتَرَبَ لِلنَّاسِ حِسَابُهُمْ وَهُمْ فِي غَفْلَةٍ مُعْرِضُونَ مَا يَأْتِيهِمْ مِنْ ذِكْرٍ مِنْ رَبِّهِمْ مُحْدَثٍ إِلَّا اسْتَمَعُوهُ وَهُمْ يَلْعَبُونَ لَاهِيَةً قُلُوبُهُمْ﴾
यह क़ुरआन की वह आवाज़ है जो सदियों का सफ़र तय करके आज भी इंसान के कानों में गूंज रही है। यह सिर्फ़ कुछ शब्द नहीं हैं, बल्कि सोए हुए लोगों को जगाने की एक ज़ोरदार पुकार है। यह ऐसी आवाज़ है जो दुनिया की चमक-दमक में खोए हुए इंसान को उसके अंजाम की याद दिलाती है।
क़ुरआन कहता है कि लोगों के हिसाब का समय बहुत क़रीब आ चुका है, लेकिन वे आज भी लापरवाही की चादर ओढ़े हुए हैं। कितना अजीब नज़ारा है! मौत हर रोज़ लोगों को अपने साथ ले जा रही है, कब्रिस्तान भरते जा रहे हैं, ज़माना बदल रहा है, उम्र घटती जा रही है, लेकिन इंसान यह समझता है कि अभी उसके पास बहुत समय बाकी है।
दुनिया की रंगीनियां और सुख-सुविधाएं उसके दिल को इस तरह अपने क़ब्ज़े में ले लेती हैं कि उसे आख़िरत की फ़िक्र ही नहीं रहती। दौलत की चाहत, नाम और शोहरत का नशा, इच्छाओं की चमक और मज़ों की खींच उसे उस मंज़िल से बेख़बर कर देती है जहाँ एक दिन उसे अपने रब के सामने खड़ा होना है।
क़ुरआन की शिकायत यह है कि जब भी उनके पास अल्लाह की तरफ़ से कोई नई नसीहत आती है, तो वे उसे सुनते तो हैं, लेकिन खेल-तमाशे की तरह। उनके कान सुनते हैं, मगर दिल नहीं सुनते। उनकी ज़बान क़ुरआन पढ़ती है, लेकिन उनकी रूह उस रोशनी से फ़ायदा नहीं उठाती। वे क़ुरआन को सिर्फ़ एक रस्म की तरह पढ़ते हैं, ज़िंदगी का रास्ता समझकर नहीं।
कितना दर्द भरा दृश्य है कि सारी दुनिया का पैदा करने वाला अपने बंदों को पुकार रहा है, उन्हें प्यार से समझा रहा है, उन्हें जहन्नम की आग से बचाने के लिए बार-बार चेतावनी दे रहा है, लेकिन लोग उस पुकार को सुनकर भी अनदेखा कर देते हैं।
"लाहियतन क़ुलूबुहुम"
यानी उनके दिल ग़ाफ़िल हैं।
असल बीमारी यही है। जब दिल दुनिया की मोहब्बत में डूब जाए तो नसीहत असर नहीं करती। जब दिल इच्छाओं का ग़ुलाम बन जाए तो क़ुरआन की आवाज़ धीमी पड़ जाती है। जब दिल अल्लाह की मोहब्बत से खाली हो जाए तो आख़िरत की याद बोझ लगने लगती है।
अल्लाह से मोहब्बत करने वाले लोग कहते हैं कि दिल एक आईने की तरह होता है। जब उस पर गुनाहों की धूल जम जाती है तो उसमें सच्चाई की रोशनी दिखाई नहीं देती। फिर इंसान क़ुरआन सुनता है लेकिन रोता नहीं, मौत का ज़िक्र सुनता है लेकिन डरता नहीं, जन्नत की खुशख़बरी सुनता है लेकिन उसके लिए चाहत पैदा नहीं होती, जहन्नम का ज़िक्र सुनता है लेकिन उसके दिल में डर पैदा नहीं होता।
ये आयतें हमें बुलाती हैं कि हम अपने दिल का हिसाब करें। क्या हमारा दिल भी दुनिया की दौड़ में खो गया है? क्या हम भी क़ुरआन सुनते हैं लेकिन उसके मुताबिक़ ज़िंदगी नहीं जीते? क्या हम भी मौत को सिर्फ़ दूसरों का मामला समझते हैं?
आज ज़रूरत इस बात की है कि हम लापरवाही की नींद से जाग जाएँ। अपने दिलों को क़ुरआन की रोशनी से ज़िंदा करें। अपने कर्मों और कामों का हिसाब करें, इससे पहले कि हमारा हिसाब लिया जाए। अपनी आँखों में आख़िरत का ख़याल बसाएँ और अपने दिलों में अल्लाह की मोहब्बत को जगह दें।
याद रखिए! हिसाब का दिन दूर नहीं है। ज़िंदगी की शाम तेज़ी से क़रीब आ रही है। दुनिया की हर बहार एक दिन पतझड़ में बदल जाएगी। हर मुस्कान ख़ामोशी में बदल जाएगी। हर महफ़िल सूनी हो जाएगी। लेकिन अल्लाह के लिए बहाया गया एक आँसू, क़ुरआन के लिए धड़कने वाला एक दिल, और आख़िरत की फ़िक्र में गुज़ारी गई एक रात हमेशा बाक़ी रहेगी।
आइए! क़ुरआन की इस पुकार को स्वीकार करें। अपने दिलों को जगाएँ और उस दिन की तैयारी करें जब न धन काम आएगा, न औलाद, बल्कि वही दिल काम आएगा जो अपने रब के सामने साफ़ और सच्चा होकर पेश होगा।
ऐ अल्लाह! हमारे दिलों को ग़फ़लत से जगा दे, क़ुरआन को हमारे दिलों की बहार बना दे और हमारे सीनों की रोशनी बना दे।
आमीन।
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