*मदरसों के छात्रों से आदर्श विद्वानों तक क्षमता और आत्मविश्वास की यात्रा*


*खमा बकफ मुहम्मद आदिल अररियावी*
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आज के दौर में मदरसों के छात्रों के अंदर एक काबिल-ए-गौर और चिंताजनक रुझान यह देखने में आ रहा है कि उनमें से अक्सर छात्र अंजुमनों और साहित्यिक व शैक्षिक गतिविधियों में दिलचस्पी नहीं लेते और न ही उनमें व्यावहारिक रूप से हिस्सा लेते हैं। हालाँकि यही अंजुमनें छात्रों के व्यक्तित्व का निर्माण, उनकी क्षमताओं को निखारने और उनके अंदर आत्मविश्वास पैदा करने का एक बेहतरीन जरिया होती हैं। अफ़सोस की बात यह है कि जब छात्र इन मौकों को नज़रअंदाज़ करते हैं तो इसके नकारात्मक प्रभाव बाद में जाहिर होते हैं जो कभी-कभी बेहद शर्मिंदगी का कारण बनते हैं।
अगर आज एक छात्र अपने ज़मान-ए-तालिब इल्मी में अंजुमन से वाबस्ता नहीं होगा, इसमें शिरकत नहीं करेगा और अपनी तकरीरी व तहरीरी क्षमताओं को परवान नहीं चढ़ाएगा तो कल जब वह आलिम-ए-दीन बनकर मदरसा से फारिग होगा और उसे किसी मस्जिद में खिताब करने या किसी जलसे में वअज़ व नसीहत करने या आवाम के सामने दीन की बात रखने का मौका दिया जाएगा तो उस वक्त वह शदीद परेशानी और शर्मिंदगी का शिकार होगा क्योंकि उसे मुअस्सिर अंदाज़ में बात करना ही नहीं आएगा।
यह बात दुरुस्त है कि दरसी किताबें पढ़कर एक छात्र आलिम तो बन सकता है, वह इल्मी तौर पर मजबूत भी हो सकता है लेकिन अगर उसके अंदर इज़हार-ए-बयान की क्षमता नहीं है तो उसका इल्म महदूद होकर रह जाएगा और सिर्फ खास तबका ही इससे फायदा उठा सकेगा। आवाम-उन्नास तक दीन की बात पहुंचाने के लिए जरूरी है कि उसके पास अच्छी तकरीर करने की क्षमता हो, वह अपने ख्यालात को वाज़ेह, मुअस्सिर और दिलनशीन अंदाज़ में पेश कर सके।
लिहाज़ा हमें चाहिए कि हम ऐसे आलिम बनें जो सिर्फ खामोश न हों बल्कि बेहतरीन मुकर्रिर हों जो लोगों के दिलों में उतर कर बात करें, जिनकी गुफ्तगू में असर हो जो खास और आम दोनों तबकों के लिए मुफीद साबित हों। ऐसा आलिम जो अपने इल्म को ज़बान दे सके, जो अपने पैगाम को लोगों तक सही अंदाज़ में पहुंचा सके वही दरहकीकत कामयाब आलिम है।
इसीलिए जरूरी है कि बच्चों को बचपन ही से तहरीर व तकरीर की आदत डाली जाए, उन्हें लिखने की मशक करवाई जाए, बोलने के मौके फराहम किए जाएं ताकि उनके अंदर आत्मविश्वास पैदा हो और वह मुस्तकबिल में एक अच्छे मुसन्निफ और बेहतरीन मुकर्रिर बन सकें। तहरीर सीखना इसलिए भी जरूरी है कि इसके जरिए इंसान अपने ख्यालात को महफूज कर सकता है और दूसरों तक आसानी से पहुंचा सकता है।
हर छात्र को चाहिए कि वह हर फन में महारत हासिल करने की कोशिश करे। सिर्फ एक ही मैदान तक खुद को महदूद न रखे बल्कि हालात के मुताबिक जिस फन की जरूरत पेश आए उसमें अपनी क्षमताओं का मुजाहिरा करे। एक हमह जहत शख्सियत ही मुआशरे में ज्यादा मुअस्सिर किरदार अदा कर सकती है।
मैं तमाम छात्रों से निहायत खुलूस के साथ गुजारिश करता हूं कि वह मदरसा की चार दीवारी के अंदर रहते हुए अपने वक्त को कीमती समझें और हर मुमकिन फन में महारत हासिल करने की कोशिश करें। चाहे वह तकरीर हो, तहरीर हो या कोई और मुफीद हुनर हर चीज की मशक करें। अपने उस्ताद से रहनुमाई हासिल करें, अपने साथियों से सीखें और अपने आप को हर लिहाज़ से बेहतर बनाने की कोशिश करें।
याद रखें वही छात्र कामयाब होता है जो सीखने का जज्बा रखता है, मेहनत करता है और अपने अंदर की क्षमताओं को पहचान कर उन्हें निखारता है।
अल्लाह रब्बुल इज्जत हम सब को आलिम बा अमल बनाए, दीन का पक्का सच्चा रहबर बनाएं, आमीन या रब्बुल आलमीन।