मौलाना रशीद अहमद गंगोही रहमतुल्लाह अलैह और फतावा रशीदिया

बकलम: मुआज़ हैदर
२२/ ज़ुलक़ादा १४४७ हिजरी

    फ़िक्र-ए-देवबंद जिन हज़रात की जानिब मंसूब है उनमें एक अहम नाम "हज़रत-ए-अक़दस, मौलाना रशीद अहमद गंगोही कुद्दस सिर्रहू" का है, आप का हम पर बड़ा एहसान है, अल्लाह ने आप को बेशुमार खूबियों से नवाज़ा था, तफ़क्कुह फ़िद्दीन में कमाल अता किया था, आप को फ़िक़्ह से फ़ितरी मुनासिबत थी, मुताले में बेपनाह वुसअत रखते थे, उसूल व फ़ुरूअ पर गहरी निगाह थी, नुसूस का इस्तेहज़ार, उनकी दर्जाबंदी, उसूल की रौशनी में उनका सही इस्तेमाल और उनके दरमियान पैदा होने वाले तआरुज़ को दूर करने का बेहतरीन मलका आप हासिल था, क़ुरान व सुन्नत में ऐसी गहराई मिली थी कि किसी भी वाक़िया और मसले में इब्तिदा ही से आप की नज़र सही फ़ैसले पर पहुंचती थी, बाद में तहक़ीक़ करने वाले जितनी भी तहक़ीक़ करें, किताबों की मुराजअत करें, बिलआख़िर आप की राय ही सेहत व सवाब का मेहवर रहती थी, इसी वजह से आप को "फ़क़ीह अन्नफ़्स" का लक़ब दिया गया।
    आप ने दाख़िली मुहाज़ को अपना मैदान-ए-अमल बनाया, अहले इस्लाम की सही खुतूत पर तरबियत, अकाइद की तसहीह, आमाल की दुरुस्तगी, क़ुल्ब की सलामती और रूहानियत की परवरिश पर आप ने ख़ास तवज्जोह दी, आप के क़लम से बेशुमार फ़तावे सादिर हुए, आप के फ़तवों का ज़ख़ीरा ज़माने के अहम तरीन मसाइल का मजमुआ है, "फतावा रशीदिया" आप के इस्तंबाती और इज्तिहादी मलका का मज़हर है, तसल्लुब फ़िद्दीन की निशानी है, अक़ली और नक़ली दलाइल से मुज़य्यन है, इस के मुताले से बेशुमार फ़वाइद हासिल होते हैं, अहले सुन्नत वल जमाअत के मिज़ाज व मज़क से वाक़फ़ियत होती है, एतदाल की सिफ़त पैदा होती है, ग़ौर व फ़िक्र की सिम्त बदलती है, आप मुख़्तसर और दो टूक अल्फ़ाज़ में जामे मानअ जवाब तहरीर फ़रमाते हैं, हतमी ताबीर इस्तेमाल करते हैं, इस्तेफ़्ता की तवालत से मुतास्सिर हुए बग़ैर असल मसले की निशानदेही पर इक्तिफ़ा करते हैं, जवाब में शरीअत की रिआयत मलहूज़ रखते हैं न कि मुस्तफ़्ती की चाहत, हर जवाब आप के मुजतहिदाना दिल व दिमाग़ की अक्कासी करता है, हर फ़तवा फ़क़ीह अन्नफ़्स और मुजतहिद होने की शहादत देता है।
     आप के फतावे को फ़िक्र की पुख़्तगी में बड़ा मक़ाम हासिल है, अक़ीदे की मज़बूती के लिए इस का मुताले नागुज़ीर है, इस का एक मोतद बह हिस्सा अकाइद और फ़िक्री सवालात से मुताल्लिक़ है, इबारत-ए-अकाबिर पर किए गए एतराज़ात का इस में तशफ्फी बख़्श जवाब है, हस्सास फतावे में अकाबिरीन वक़्त से भी दस्तख़त लिए हैं।
    आप के हां किसी की तकफ़ीर में हद दर्जा एहतियात है, अहले क़िबला में से आप ऐसे लोगों की तकफ़ीर नहीं करते जो अपनी इज्तिहादी ग़लती की वजह से तनक़ीद करते हों, आप अकाइद के बाब में एहतियाती पहलू अपनाते हैं, रसूमात की रोक थाम के सिलसिला में असल इल्लत को पेश नज़र रखते हैं, उसूली मसाइल में अज़ीमत की राह इख़्तियार करते हैं, फ़ुरूई और इख़्तिलाफ़ी मसाइल में उसूल को पेश-ए-नज़र रख कर आसान रास्ता अपनाते हैं।
    आप पर एह् या सुन्नत का बेपनाह ग़लबा था, सुन्नत की ऐसी शनाख़्त अता हुई थी कि कोई बिदअत अपना रूप बदल कर सुन्नत या मुस्तहब के रंग में नहीं आ सकती थी, लोग मुख़्तलिफ़ नाहिये से सवालात करते थे मगर हज़रत की फ़रासत व फ़िक़ाहत हर एक अक़ीदा और अमल की वह हैसियत मुतअय्यन कर देती थी जो क़ुरान व सुन्नत की रौशनी में वाक़ई होती थी, इस में किसी मुदाहनत का गुज़र न था, चाहे जितनी मुख़ालफ़त हो।
     आप ने मरव्वजा मिलाद की सख़्त तरदीद की, इस पर वक़्त के चंद उलमा ने भी मुख़ालफ़त की, मौलाना अब्दुल समीअ राम पूरी रहमतुल्लाह अलैह ने "अनवार सातिआ" में इसे मुदल्लल करने की कोशिश की, आप की ईमा पर मौलाना ख़लील अहमद सहारनपुरी रहमतुल्लाह अलैह ने मौज़ू से मुताल्लिक़ आप के इफ़ादात को "बराहीन-ए-क़ातिआ" में जमा कर दिया, आप के फतावे में मौजूद "किताब उल बिदआत" इसी किताब की तफ़सीर है।
      इस मजमुआ-ए-फतावी में फतवे की तख़रीज का इतना एहतिमाम नहीं है, १४४१ हिजरी में पड़ोस मुल्क के आलिम-ए-दीन जनाब मौलाना मोहम्मद खालिद हनफ़ी क्वेटा ने इस की बाक़ायदा तख़रीज की है, अलहमदुलिल्लाह मकतबा हनफिया क्वेटा इस वाले नुस्खे की इशाअत हो चुकी है।