हिंदुस्तान का एक बादशाह था जिसका नाम सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक़ था, निहायत जाह-ओ-जलाल और रौब-ओ-दबदबे में मशहूर था। यह हिंदुस्तान के मशहूर बादशाहों में माना जाता है।

 

उनके अदल-ओ-इंसाफ़ के सिलसिले में इब्न बतूता ने एक अपना चश्मदीद वाक़िया लिखा है। 

एक मर्तबा सुल्तान के ख़िलाफ़ एक हिंदू ने अदालत में शिकायत की कि बादशाह ने उसके लड़के को बेवजह मारा है। क़ाज़ी ने बादशाह को मुद्दआ अलैह की हैसियत से अदालत के कटहरे में तलब किया और मुक़दमे की समाअत की। और आखिर फ़ैसला यह किया कि बादशाह पर जुर्म साबित है, इससे बदला लिया जाए। सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने बे-चूँ-ओ-चरा अदालत के फ़ैसले के सामने सर तस्लीम ख़म कर दिया। इब्न बतूता लिखते हैं,

मैंने देखा बादशाह ने अदालत के फ़ैसले के मुताबिक़ हिंदू ज़ादा को दरबार में बुलाया और उसके हाथ में छड़ी दे कर कहा: मुझ से बदला ले ले। 

मज़ीद यह कि लड़के को अपने सर की क़सम दे कर कहा: कि जिस तरह मैंने तुझ को मारा तो भी मुझ को इसी तरह मार _

 

इब्न बतूता का बयान है 

कि अब लड़के ने बादशाह के 21 छड़ियाँ मारीं यहाँ तक कि एक मर्तबा बादशाह की टोपी भी सर से गिर पड़ी................

 

यह इंतिहाई अदल-ओ-इंसाफ़ की एक मिसाल है जो हिंदुस्तान के बादशाहों ने क़ायम रखी थी जिस की वजह से हिंदुस्तान के अंदर अल्लाह ने उनकी हुकूमत को बाक़ी रखा और उनके अदल-ओ-इंसाफ़ की वजह से वह अवाम-ओ-ख़वास सब में मशहूर रहे। कहा जाता है हुकूमत ज़ुल्म के साथ क़ायम नहीं रह सकती। कुफ़्र के साथ रह सकती है। 

और आज कल बड़े बड़े बादशाह बड़े बड़े लोग जिनके ऊपर जुर्म साबित हो भी जाता है वह अदल-ओ-इंसाफ़ की अदालत से और कचहरी से मावरा नज़र आते हैं।

नक़्श हयात: मौलाना हुसैन अहमद मदनी 

हिस्सा दोम स( 15)

मोहम्मद शोएब क़ासमी 

ख़ादिम मदरसा दार अल-रशाद बंकी बाराबंकी