*सोशल मीडिया की चमक में खोई हुई नई पीढ़ी*

*ख़ामा बकफ़ मोहम्मद आदिल अररियावी*
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आज के इस आधुनिक दौर में अगर हम अपने आस-पास नज़र डालें तो एक अजीब मंज़र देखने को मिलता है। जहाँ भी जाएँ गली हो या बाज़ार घर हो या स्कूल हर जगह बच्चे और बच्चियाँ मोबाइल फ़ोन हाथ में लिए नज़र आते हैं। कोई वीडियो बना रहा है, कोई रील (Reel) तैयार कर रहा है, और कोई घंटों बैठकर दूसरों की रील्स देखने में मशरूफ़ है। ऐसा महसूस होता है कि जैसे ये नई पीढ़ी एक अलग ही दुनिया में खो गई है एक ऐसी दुनिया जो हक़ीक़त से ज़्यादा स्क्रीन के अंदर बसी हुई है।
इन रील्स में हर तरह का मवाद मौजूद होता है कुछ चीज़ें मुफ़ीद भी होती हैं, लेकिन बहुत सा ऐसा मवाद भी होता है जो अख़लाक़ी तौर पर दुरुस्त नहीं होता। बच्चे और बच्चियाँ, ख़ास तौर पर कम उम्र, इन चीज़ों को बिना समझे देखते रहते हैं। फिर आहिस्ता-आहिस्ता वही चीज़ें उनकी सोच का हिस्सा बन जाती हैं। वो जो कुछ देखते हैं, वैसा ही बोलने, वैसा ही लिबास पहनने और वैसा ही अमल करने की कोशिश करते हैं। यूँ उनकी शख़्सियत और किरदार सोशल मीडिया के असर में ढलने लगता है।
अफ़सोस की बात ये है कि इस में कहीं ना कहीं वालिदैन की भी कोताही शामिल होती है। आज कल अक्सर वालिदैन जब अपने बच्चों को नया मोबाइल ख़रीद कर देते हैं तो सब से पहले वो इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक या स्नैप चैट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अकाउंट्स बनाते हैं। वो ये सोचते हैं कि बच्चे मोबाइल के ज़रिए तालीम हासिल करेंगे, नई चीज़ें सीखेंगे, लेकिन हक़ीक़त इस के बरअक्स होती है। ज़्यादा तर बच्चे पढ़ाई के नाम पर मोबाइल का ग़लत इस्तेमाल करते हैं और अपना क़ीमती वक़्त ज़ाए कर देते हैं।
मज़ीद ये कि सोशल मीडिया ने अजनबी लोगों से राब्ता बहुत आसान बना दिया है। यही आसानी बाज़ औक़ात ख़तरनाक साबित होती है। बच्चियाँ जज़्बाती तौर पर जल्द मुतास्सिर हो जाती हैं, और जब वो किसी अजनबी से बात चीत शुरू करती हैं तो आहिस्ता-आहिस्ता इस में दिलचस्पी लेने लगती हैं। बात चीत दोस्ती में बदलती है, और बाज़ औक़ात ये दोस्ती एक ऐसे ताल्लुक़ में तबदील हो जाती है जो उनकी ज़िंदगी के लिए नुक़सानदेह साबित होता है।
कुछ वाक़िआत ऐसे भी सुनने में आए हैं जिन में इब्तिदा एक सादा सी ऑनलाइन बात चीत से हुई, लेकिन अंजाम इंतिहाई अफ़सोसनाक निकला। कहीं धोका दिया गया, कहीं इस्तेहसाल हुआ, और कहीं ज़िंदगी तक ज़ाए हो गई। ये वाक़िआत हमें ये सोचने पर मजबूर करते हैं कि हम कहाँ खड़े हैं और हमारी नई नस्ल किस सिम्त जा रही है।
ताहम ये बात भी समझना ज़रूरी है कि हर वाक़िया एक जैसा नहीं होता और हर ताल्लुक़ को एक ही नज़र से देखना दुरुस्त नहीं। असल मसला ये है कि बिना सोचे समझे, बिना तहक़ीक़ के, और बिना किसी रहनुमाई के ताल्लुक़ात क़ायम किए जा रहे हैं, जो ख़तरनाक साबित हो सकते हैं।
इस सारे मामले में सब से बड़ी ज़िम्मेदारी वालिदैन पर आइद होती है। उन्हें चाहिए कि वो अपने बच्चों को मुकम्मल आज़ादी देने के बजाए उनकी रहनुमाई करें। बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल पर नज़र रखें, उनके दोस्तों के बारे में जानें, और उनके साथ ऐसा ताल्लुक़ क़ायम करें कि वो अपने मसाइल और बातें खुल कर शेयर कर सकें। सिर्फ़ डाँट डपट से मसला हल नहीं होगा, बल्कि मुहब्बत, समझदारी और तरबियत से बेहतरी आएगी।
साथ ही बच्चों और बच्चियों को भी ये समझना होगा कि सोशल मीडिया की दुनिया हक़ीक़त नहीं होती। वहाँ जो कुछ दिखाया जाता है, वो अक्सर एक बनावटी ज़िंदगी होती है। हर शख़्स अपनी बेहतरीन तस्वीर दिखाता है, लेकिन इस के पीछे की हक़ीक़त मुख़्तलिफ़ हो सकती है। इस लिए अंधा एतमाद करना, ख़ास तौर पर अजनबी लोगों पर, इंतिहाई ख़तरनाक हो सकता है।
 यही कहा जा सकता है कि मोबाइल और सोशल मीडिया खुद बुरे नहीं हैं, लेकिन इन का ग़लत इस्तेमाल यक़ीनन नुक़सानदेह है। अगर हम इन्हें सही तरीक़े से इस्तेमाल करें तो ये इल्म, तरक़्क़ी और राब्ते का बेहतरीन ज़रिया बन सकते हैं, लेकिन अगर हम इन के ग़लत पहलूओं में खो जाएँ तो ये हमारी नस्लों को तबाह भी कर सकते हैं।
अल्लाह ही बेहतर हिदायत देने वाला है, लेकिन हमें भी अपनी ज़िम्मेदारी को समझना होगा और अपनी आने वाली नस्ल को महफ़ूज़, बाअख़लाक़ और बाशऊर बनाने के लिए संजीदा इक़दामात करने होंगें।
अल्लाह रब्बुल इज्जत आप हम सब को अक़्ल ए सलीम अता फरमाए दीन की सही समझ अता फरमाए आमीन सुम्मा आमीन या रब्बुल आलमीन ।