पहाड़ बनो, हवा में उड़ते पत्ते न बनो
ज़िंदगी के सफ़र में इंसान को बेशुमार हालात, आज़माइशें और तूफ़ानों का सामना करना पड़ता है।
कभी खुशियों की रोशनी दिल को मुनव्वर करती है,
तो कभी ग़मों की तारीकी इंसान को घेर लेती है।
ऐसे में असल कामयाब वही होता है जो अपने आप को मज़बूत रखता है,
जो हालात के धारे में बहने के बजाए अपनी जगह पर क़ायम रहता है—
बिल्कुल एक पहाड़ की तरह।
पहाड़ अपनी शान में खामोश मगर बेहद मज़बूत होता है।
तेज़ हवाएँ चलें, बारिशें बरसें या आंधियाँ आएँ, वह अपनी जगह से हिलता नहीं।
इस की यह इस्तिक़ामत हमें सिखाती है कि हमें भी ज़िंदगी के नशेब ओ फ़राज़ में साबित क़दम रहना चाहिए।
जब इंसान अपने उसूलों, अपनी सच्चाई और अपने सुकून पर क़ायम रहता है, तो दुनिया की कोई ताक़त उसे कमज़ोर नहीं कर सकती।
इस के बरअक्स, हवा में उड़ते पत्ते हमें एक और सबक देते हैं—कमज़ोरी और बेबसी का।
वह अपने इख़्तियार में कुछ नहीं रखते, हवा जिधर ले जाए, वह उधर ही बह जाते हैं।
अगर इंसान भी अपने जज़्बात, दूसरों की बातों और वक़्ती हालात के ताबे हो जाए, तो उस की ज़िंदगी भी बे सिम्त हो जाती है।
वह कभी खुशी में हद से बढ़ जाता है और कभी ग़म में टूट जाता है।
असल ताक़त इस बात में है कि इंसान अपनी अंदरूनी दुनिया को संभालना सीखे।
बाहर के हालात हमेशा हमारे क़ाबू में नहीं होते, लेकिन हमारा रद्द-ए-अमल ज़रूर हमारे इख़्तियार में होता है।
अगर हम अपने दिल को सुकून का आदी बना लें, अपने ज़ेहन को मज़बूत कर लें और अपने ख़यालात को मुस्बत रखें, तो कोई भी तूफ़ान हमें हिला नहीं सकता।
सुकून कमज़ोरी नहीं, बल्कि सब से बड़ी ताक़त है। यह वह ख़ज़ाना है जो इंसान को हर हाल में मुतवाज़िन रखता है।
जो शख्स अपने अंदर के सुकून को पा लेता है, वही असल में कामयाब होता है।
वह न तारीफ़ से मग़रूर होता है और न तनक़ीद से टूटता है।
हमें अपनी ज़िंदगी में पहाड़ जैसी मज़बूती पैदा करनी चाहिए।
हालात चाहे जैसे भी हों, हमें अपने उसूलों, अपने सब्र और अपने सुकून को नहीं छोड़ना चाहिए।
क्योंकि जो शख्स खुद पर क़ाबू पा लेता है, वही दुनिया पर भी क़ाबू पाने की सलाहियत रखता है।
आयशा ❤