मदारिस-ए-इस्लामिया की बुनियादें तारीख़ के उन रोशन, ताबानाक और सुनहरी औराक़ में पैवस्त हैं जो सदियों क़ब्ल इख़्लास, लिल्लाहियत, इल्म और रूहानियत की रौशनी से रक़म किए गए। ये वो अज़ीमुश्शान इदारे हैं जिन्होंने हर दौर के फ़ितनों और आज़माइशों का निहायत हिकमत, बसीरत और इस्तिक़ामत के साथ मुक़ाबला करते हुए न सिर्फ़ दीन-ए-इस्लाम की हिफ़ाज़त का फ़रीज़ा अंजाम दिया बल्कि मुआशरे की फ़िक्री, अख़लाक़ी और रूहानी तामीर में भी एक कलیدی और नाक़ाबिल-ए-फ़रामोश किरदार अदा किया। आज के इस पुरआशोब, पुरफ़ितन और तग़य्युर पज़ीर दौर में भी मदरिस-ए-इस्लामिया अपनी पूरी आब-ओ-ताब, वक़ार और अज़मत के साथ क़ायम हैं और उनकी इल्मी व रूहानी शुआएँ चार दांग-ए-आलम में फैल रही हैं।
ज़ेर-ए-नज़र मज़मून में, इंशा अल्लाह तआला, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी (केरल) में गुज़रने वाली ग्यारह साला तालीमी व तरबियती ज़िंदगी को क़दरे तफ़सील, खुलूस-ए-नियत और एहसास-ए-तशक्कुर के साथ क़लम बंद करने की सआदत हासिल की जा रही है। ये महज़ एक ज़ाती दास्तान नहीं बल्कि एक ऐसे इदारे की झलक है जो अपने दामन में हज़ारों ख़्वाबों की ताबीर समेटे हुए है। उम्मीद-ए-वासिक़ है कि कारीईन इस तहरीर को मुहब्बत व तवज्जोह से पढ़ेंगे और इससे इल्मी व फ़िक्री इस्तिफ़ादा हासिल करेंगे।
ये एक मुसल्लमा हक़ीक़त है कि मदरिस-ए-इस्लामिया ने इब्तिदा ही से इंसान साज़ी, किरदार साज़ी और फ़िक्र साज़ी में बुनियादी और फ़ैसला कुन किरदार अदा किया है। इन इदारों में तालीम देने वाले असातिज़ा-ए-किराम महज़ मुअल्लिम नहीं होते बल्कि वो मुरब्बी, मुसलिह, रहबर और मोहसिन होते हैं, जो अपने शागिर्दों को न सिर्फ़ इल्म की रौशनी अता करते हैं बल्कि उनके दिलों को अख़लाक़, अदब और तक़वा की दौलत से भी मालामाल करते हैं। उनकी शबाना रोज़ मेहनतें, बे लौस काविशें और मुख़लिसना जुहद ही वो सरचश्मा है जिससे तुलबा की शख़्सियत निखरती और संवरती है। यही तुलबा आगे चल कर अपने अपने मैदान में इमाम, ख़तीब, मुफ़क्किर, मुहद्दिस, मुसन्निफ़, सियासत दान, साइंस दान, प्रोफ़ेसर, वकील और जज बनते हैं और मुआशरे की रहनुमाई का फ़रीज़ा अंजाम देते हैं। हक़ीक़तन ये सब मदरिस-ए-इस्लामिया ही का फ़ैज़ान है, और ये फ़ैज़ान इंशा अल्लाह रहती दुनिया तक जारी रहेगा।
अगर दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी की बात की जाए तो ये मसलक-ए-अहल-ए-सुन्नत व जमात का एक अज़ीमुश्शान इल्मी मरकज़, एक दरख़्शाँ मीनार-ए-नूर और एक मोतबर व मोतमद इदारा है, जो सलफ़-ए-सालिहीन के नक़्श-ए-क़दम पर चलते हुए और इमाम-ए-अहल-ए-सुन्नत, आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान फ़ाज़िल-ए-बरेल्वी रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात की रौशनी में अपनी इल्मी व दीनी ख़िदमात अंजाम दे रहा है। इस इदारे की एक नुमायां खुसूसियत ये है कि यहां दीनी उलूम के साथ साथ अस्री उलूम को भी निहायत मुतवाज़न अंदाज़ में निसाब का हिस्सा बनाया गया है, ताकि तुलबा न सिर्फ़ दीन के माहिर बनें बल्कि ज़माने के तक़ाज़ों से भी हम आहंग रहें। हज़ारों तुलबा इस जामिया में ज़ेर-ए-तालीम हैं और इसकी मुतअद्दिद शाख़ें मुल्क के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में इल्म की शमा रोशन किए हुए हैं।
बड़े फ़ख़्र, आजिज़ी और कल्बी मसर्रत के साथ अर्ज़ करता हूँ कि अगस्त 2015 में मेरा दाख़िला इस अज़ीम जामिया में हुआ। इस वक़्त मेरी इल्मी हालत निहायत इब्तिदाई थी—क़ुरान-ए-मजीद की तिलावत और उर्दू ज़बान से कुछ हद तक वाक़फ़ियत थी, मगर अंग्रेज़ी ज़बान और उसके अदब से तक़रीबन नावाक़िफ़ था। ताहम मेरे दिल में एक सच्ची तड़प, एक पुख़्ता अज़्म और एक बे मिसाल जज़्बा मौजूद था कि मुझे कुछ सीखना है, कुछ बनना है और अपनी ज़िंदगी को बामक़सद बनाना है। यही जज़्बा मुझे इस इल्मी आशियाने तक ले आया। अल्हम्दुलिल्लाह, पहले ही साल में उर्दू, अरबी और अंग्रेज़ी अदब की बुनियादी तालीम हासिल की, और साथ ही साथ यहां की मक़ामी ज़बान मलयाळम सीखने का भी मौक़ा मिला, जो मेरे लिए निहायत मुफ़ीद और यादगार तजरबा साबित हुआ।
इब्तिदाई पाँच साल मेरी ज़िंदगी का क़ीमती तरीन सरमाया हैं। ये वो दौर था जिसने मेरी इल्मी बुनियादों को मज़बूत किया, मेरे फ़िक्र-ओ-नज़र को जिला बख़्शी और मुझे ज़बान-ओ-बयान की महारत से आरास्ता किया। इन बरसों में मैंने उर्दू, अरबी और अंग्रेज़ी जैसी अहम ज़बानों में माक़ूल महारत हासिल की। इसके साथ साथ साइंस, जुग़राफ़िया, सोशल साइंस, पोलिटिकल साइंस, रियाज़ी, इकोनॉमिक्स और इंग्लिश लिटरेचर जैसे अस्री उलूम ने मेरे ज़ेहन को वुसअत दी और दुनिया को समझने का शऊर अता किया। दूसरी तरफ़ दीनी उलूम—फ़िक़्ह, हदीस, क़ुरान, अक़ीदा, तसव्वुफ़ और मंतिक़—ने मेरे अंदर दीनी बसीरत, फ़िक्री इस्तेहकाम और एतिकादी पुख़्तगी पैदा की।
इसके बाद दो साला सीनियर सेकेंडरी मरहला आया, जो इल्मी पुख़्तगी और संजीदगी का दौर था। इस मरहले में हदीस और फ़िक़्ह की इब्तिदाई मोतबर कुतुब, जैसे मुख़्तसर अल-क़ुदुरी और शरह अल-विकाया, का मुताला किया गया, नीज़ अक़ाइद की बुनियादी किताबों से वाक़फ़ियत हासिल की। इस मरहले ने मेरे इल्मी ज़ौक़ को मज़ीद निखारा और मेरे अंदर तहक़ीक़ व मुताला का शौक़ पैदा किया।
फिर तीन साला डिग्री लेवल की ज़िंदगी आई, जो मेरे तालीमी सफ़र का एक निहायत अहम और यादगार मरहला है। इस दौरान में मैंने हदीस की जलील अल-क़द्र कुतुब जैसे सुनन इब्न माजा, सुनन नसाई, सुनन अबी दाऊद और मुवत्ता इमाम मालिक का मुताला किया। फ़िक़्ह में हिदाया शरीफ़ (मुसन्निफ़: इमाम मरग़ीनानी) पढ़ने का शर्फ़ हासिल हुआ। अक़ीदा में शरह अल-अक़ाइद, और मंतिक़ में मरक़ात, शरह तहज़ीब और मुनाज़रा रशीदिया जैसी अहम कुतुब से इस्तिफ़ादा किया। इसी दौरान आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खानؒ की अज़ीम तसानीफ़—फ़तावा रज़विया और अहकाम-ए-शरीअत—और दीगर अकाबिरिन-ए-अहल-ए-सुन्नत की कुतुब का मुताला किया, जिसने मेरे इल्मी उफ़ुक़ को वुसअत और गहराई अता की।
इसी बाबरकत तालीमी सफ़र के दौरान मुझे जिन मोअज़्ज़ज़, मुकर्रम, मुशफ़िक़ और माया नाज़ असातिज़ा-ए-किराम से इल्म हासिल करने का शर्फ़ नसीब हुआ, उनके अस्मा-ए-गिरामी का ज़िक्र मेरे लिए बाइस-ए-फ़ख़्र व सआदत है। बिलखुसूस डॉक्टर मुफ़्ती मुस्तक़ीम अहमद अशरफ़ी फ़ैज़ी शाज़ली, मुफ़्ती अफ़रोज़ अहमद अमजदी, मुफ़्ती ग़ुलाम हुसैन मिस्बाही, मुफ़्ती मंज़र रज़ा मंज़र मिस्बाही, अब्बास हुदवी, ज़ुबैर हुदवी, इफ़्तिख़ार हुदवी, ओवैस हुदवी, अनीस हुदवी, रबीअ हुदवी, इरशाद हुसैन हुदवी, इब्राहीम हुदवी, नेमतुल्लाह हुदवी, अली हसन हुदवी, आशिक़ हुदवी, सालिम हुदवी, जज़ील हुदवी, अब्दुल शकूर हुदवी, शफ़ीक़ हुदवी, वी टी रफ़ीक़ हुदवी, सी एच शरीफ़ हुदवी, और डॉक्टर हाशिम नदवी—इन तमाम हज़रात की इल्मी रहनुमाई, शफ़क़त और दुआओं ने मेरी शख़्सियत की तामीर में बुनियादी किरदार अदा किया। अल्लाह तआला इन सब को बेहतरीन जज़ा-ए-ख़ैर अता फ़रमाए।
ग्रेजुएशन के बाद जब मैं पोस्ट ग्रेजुएशन के मरहले में दाख़िल हुआ तो इल्म की वुसअत और गहराई दोनों में ग़ैर मामूली इज़ाफ़ा हुआ। बुख़ारी शरीफ़ और मुस्लिम शरीफ़ जैसे अज़ीम ज़ख़ीरा-ए-हदीस का दरस हासिल किया। तफ़सीर के मैदान में सिरात अल-जिनान, ख़ज़ाइन अल-इरफ़ान, रूह अल-बयान, तफ़सीर बैज़ावी और दीगर कुतुब का मुताला किया। फ़िक़्ह में बदाए अल-सनाए, अल-अश्बाह व अल-नज़ाइर, रद अल-मुहतार और फ़तावा आलमगीरी जैसी मोतबर किताबों से इस्तिफ़ादा किया। इसके साथ साथ आईन-ए-हिंद (Constitution of India) और दीगर अस्री मौज़ूआत का मुताला भी किया, जिससे एक मुतवाज़न, बाख़बर और वसीउल नज़र शख़्सियत की तश्कील मुमकिन हुई।
अगर मैं अपनी इस पूरी ज़िंदगी का खुलासा एक जुमले में बयान करूँ तो ये कहना हरगिज़ मुबालग़ा न होगा कि ये मदरसा मेरे लिए महज़ एक तालीमी इदारा नहीं बल्कि एक मुकम्मल हयात है—एक ऐसी हयात जिसने मुझे जीने का शऊर दिया, मक़सद-ए-हयात से रोशनास कराया और दुनिया व आख़िरत दोनों में कामयाबी की राहें दिखाईं।
बिला शुबह दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी एक रोशन, दरख़्शाँ और ताबिंदा सितारे की मानिंद है, जिसकी रौशनी से हज़ारों नहीं बल्कि लाखों तुलबा फ़ैज़ियाब हो रहे हैं, और इंशा अल्लाह ये फ़ैज़ क़यामत तक जारी व सारी रहेगा।
अल्लाह तआला इस अज़ीम इदारे को हमेशा क़ायम व दाइम रखे, इसके असातिज़ा व तुलबा को इख़्लास, इस्तिक़ामत और ख़िदमत-ए-दीन की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए, और हमें भी इसी क़ाफ़िले का एक मुख़लिस ख़ादिम बनाए। आमीन।
तहरीर: मुहम्मद फ़िदा अल-मुस्तफ़ा क़ादरी
राब्ता नंबर: 9037099731
पी जी रिसर्च स्कॉलर: दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी केरल
ज़ेर-ए-नज़र मज़मून में, इंशा अल्लाह तआला, दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी (केरल) में गुज़रने वाली ग्यारह साला तालीमी व तरबियती ज़िंदगी को क़दरे तफ़सील, खुलूस-ए-नियत और एहसास-ए-तशक्कुर के साथ क़लम बंद करने की सआदत हासिल की जा रही है। ये महज़ एक ज़ाती दास्तान नहीं बल्कि एक ऐसे इदारे की झलक है जो अपने दामन में हज़ारों ख़्वाबों की ताबीर समेटे हुए है। उम्मीद-ए-वासिक़ है कि कारीईन इस तहरीर को मुहब्बत व तवज्जोह से पढ़ेंगे और इससे इल्मी व फ़िक्री इस्तिफ़ादा हासिल करेंगे।
ये एक मुसल्लमा हक़ीक़त है कि मदरिस-ए-इस्लामिया ने इब्तिदा ही से इंसान साज़ी, किरदार साज़ी और फ़िक्र साज़ी में बुनियादी और फ़ैसला कुन किरदार अदा किया है। इन इदारों में तालीम देने वाले असातिज़ा-ए-किराम महज़ मुअल्लिम नहीं होते बल्कि वो मुरब्बी, मुसलिह, रहबर और मोहसिन होते हैं, जो अपने शागिर्दों को न सिर्फ़ इल्म की रौशनी अता करते हैं बल्कि उनके दिलों को अख़लाक़, अदब और तक़वा की दौलत से भी मालामाल करते हैं। उनकी शबाना रोज़ मेहनतें, बे लौस काविशें और मुख़लिसना जुहद ही वो सरचश्मा है जिससे तुलबा की शख़्सियत निखरती और संवरती है। यही तुलबा आगे चल कर अपने अपने मैदान में इमाम, ख़तीब, मुफ़क्किर, मुहद्दिस, मुसन्निफ़, सियासत दान, साइंस दान, प्रोफ़ेसर, वकील और जज बनते हैं और मुआशरे की रहनुमाई का फ़रीज़ा अंजाम देते हैं। हक़ीक़तन ये सब मदरिस-ए-इस्लामिया ही का फ़ैज़ान है, और ये फ़ैज़ान इंशा अल्लाह रहती दुनिया तक जारी रहेगा।
अगर दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी की बात की जाए तो ये मसलक-ए-अहल-ए-सुन्नत व जमात का एक अज़ीमुश्शान इल्मी मरकज़, एक दरख़्शाँ मीनार-ए-नूर और एक मोतबर व मोतमद इदारा है, जो सलफ़-ए-सालिहीन के नक़्श-ए-क़दम पर चलते हुए और इमाम-ए-अहल-ए-सुन्नत, आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान फ़ाज़िल-ए-बरेल्वी रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात की रौशनी में अपनी इल्मी व दीनी ख़िदमात अंजाम दे रहा है। इस इदारे की एक नुमायां खुसूसियत ये है कि यहां दीनी उलूम के साथ साथ अस्री उलूम को भी निहायत मुतवाज़न अंदाज़ में निसाब का हिस्सा बनाया गया है, ताकि तुलबा न सिर्फ़ दीन के माहिर बनें बल्कि ज़माने के तक़ाज़ों से भी हम आहंग रहें। हज़ारों तुलबा इस जामिया में ज़ेर-ए-तालीम हैं और इसकी मुतअद्दिद शाख़ें मुल्क के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में इल्म की शमा रोशन किए हुए हैं।
बड़े फ़ख़्र, आजिज़ी और कल्बी मसर्रत के साथ अर्ज़ करता हूँ कि अगस्त 2015 में मेरा दाख़िला इस अज़ीम जामिया में हुआ। इस वक़्त मेरी इल्मी हालत निहायत इब्तिदाई थी—क़ुरान-ए-मजीद की तिलावत और उर्दू ज़बान से कुछ हद तक वाक़फ़ियत थी, मगर अंग्रेज़ी ज़बान और उसके अदब से तक़रीबन नावाक़िफ़ था। ताहम मेरे दिल में एक सच्ची तड़प, एक पुख़्ता अज़्म और एक बे मिसाल जज़्बा मौजूद था कि मुझे कुछ सीखना है, कुछ बनना है और अपनी ज़िंदगी को बामक़सद बनाना है। यही जज़्बा मुझे इस इल्मी आशियाने तक ले आया। अल्हम्दुलिल्लाह, पहले ही साल में उर्दू, अरबी और अंग्रेज़ी अदब की बुनियादी तालीम हासिल की, और साथ ही साथ यहां की मक़ामी ज़बान मलयाळम सीखने का भी मौक़ा मिला, जो मेरे लिए निहायत मुफ़ीद और यादगार तजरबा साबित हुआ।
इब्तिदाई पाँच साल मेरी ज़िंदगी का क़ीमती तरीन सरमाया हैं। ये वो दौर था जिसने मेरी इल्मी बुनियादों को मज़बूत किया, मेरे फ़िक्र-ओ-नज़र को जिला बख़्शी और मुझे ज़बान-ओ-बयान की महारत से आरास्ता किया। इन बरसों में मैंने उर्दू, अरबी और अंग्रेज़ी जैसी अहम ज़बानों में माक़ूल महारत हासिल की। इसके साथ साथ साइंस, जुग़राफ़िया, सोशल साइंस, पोलिटिकल साइंस, रियाज़ी, इकोनॉमिक्स और इंग्लिश लिटरेचर जैसे अस्री उलूम ने मेरे ज़ेहन को वुसअत दी और दुनिया को समझने का शऊर अता किया। दूसरी तरफ़ दीनी उलूम—फ़िक़्ह, हदीस, क़ुरान, अक़ीदा, तसव्वुफ़ और मंतिक़—ने मेरे अंदर दीनी बसीरत, फ़िक्री इस्तेहकाम और एतिकादी पुख़्तगी पैदा की।
इसके बाद दो साला सीनियर सेकेंडरी मरहला आया, जो इल्मी पुख़्तगी और संजीदगी का दौर था। इस मरहले में हदीस और फ़िक़्ह की इब्तिदाई मोतबर कुतुब, जैसे मुख़्तसर अल-क़ुदुरी और शरह अल-विकाया, का मुताला किया गया, नीज़ अक़ाइद की बुनियादी किताबों से वाक़फ़ियत हासिल की। इस मरहले ने मेरे इल्मी ज़ौक़ को मज़ीद निखारा और मेरे अंदर तहक़ीक़ व मुताला का शौक़ पैदा किया।
फिर तीन साला डिग्री लेवल की ज़िंदगी आई, जो मेरे तालीमी सफ़र का एक निहायत अहम और यादगार मरहला है। इस दौरान में मैंने हदीस की जलील अल-क़द्र कुतुब जैसे सुनन इब्न माजा, सुनन नसाई, सुनन अबी दाऊद और मुवत्ता इमाम मालिक का मुताला किया। फ़िक़्ह में हिदाया शरीफ़ (मुसन्निफ़: इमाम मरग़ीनानी) पढ़ने का शर्फ़ हासिल हुआ। अक़ीदा में शरह अल-अक़ाइद, और मंतिक़ में मरक़ात, शरह तहज़ीब और मुनाज़रा रशीदिया जैसी अहम कुतुब से इस्तिफ़ादा किया। इसी दौरान आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खानؒ की अज़ीम तसानीफ़—फ़तावा रज़विया और अहकाम-ए-शरीअत—और दीगर अकाबिरिन-ए-अहल-ए-सुन्नत की कुतुब का मुताला किया, जिसने मेरे इल्मी उफ़ुक़ को वुसअत और गहराई अता की।
इसी बाबरकत तालीमी सफ़र के दौरान मुझे जिन मोअज़्ज़ज़, मुकर्रम, मुशफ़िक़ और माया नाज़ असातिज़ा-ए-किराम से इल्म हासिल करने का शर्फ़ नसीब हुआ, उनके अस्मा-ए-गिरामी का ज़िक्र मेरे लिए बाइस-ए-फ़ख़्र व सआदत है। बिलखुसूस डॉक्टर मुफ़्ती मुस्तक़ीम अहमद अशरफ़ी फ़ैज़ी शाज़ली, मुफ़्ती अफ़रोज़ अहमद अमजदी, मुफ़्ती ग़ुलाम हुसैन मिस्बाही, मुफ़्ती मंज़र रज़ा मंज़र मिस्बाही, अब्बास हुदवी, ज़ुबैर हुदवी, इफ़्तिख़ार हुदवी, ओवैस हुदवी, अनीस हुदवी, रबीअ हुदवी, इरशाद हुसैन हुदवी, इब्राहीम हुदवी, नेमतुल्लाह हुदवी, अली हसन हुदवी, आशिक़ हुदवी, सालिम हुदवी, जज़ील हुदवी, अब्दुल शकूर हुदवी, शफ़ीक़ हुदवी, वी टी रफ़ीक़ हुदवी, सी एच शरीफ़ हुदवी, और डॉक्टर हाशिम नदवी—इन तमाम हज़रात की इल्मी रहनुमाई, शफ़क़त और दुआओं ने मेरी शख़्सियत की तामीर में बुनियादी किरदार अदा किया। अल्लाह तआला इन सब को बेहतरीन जज़ा-ए-ख़ैर अता फ़रमाए।
ग्रेजुएशन के बाद जब मैं पोस्ट ग्रेजुएशन के मरहले में दाख़िल हुआ तो इल्म की वुसअत और गहराई दोनों में ग़ैर मामूली इज़ाफ़ा हुआ। बुख़ारी शरीफ़ और मुस्लिम शरीफ़ जैसे अज़ीम ज़ख़ीरा-ए-हदीस का दरस हासिल किया। तफ़सीर के मैदान में सिरात अल-जिनान, ख़ज़ाइन अल-इरफ़ान, रूह अल-बयान, तफ़सीर बैज़ावी और दीगर कुतुब का मुताला किया। फ़िक़्ह में बदाए अल-सनाए, अल-अश्बाह व अल-नज़ाइर, रद अल-मुहतार और फ़तावा आलमगीरी जैसी मोतबर किताबों से इस्तिफ़ादा किया। इसके साथ साथ आईन-ए-हिंद (Constitution of India) और दीगर अस्री मौज़ूआत का मुताला भी किया, जिससे एक मुतवाज़न, बाख़बर और वसीउल नज़र शख़्सियत की तश्कील मुमकिन हुई।
अगर मैं अपनी इस पूरी ज़िंदगी का खुलासा एक जुमले में बयान करूँ तो ये कहना हरगिज़ मुबालग़ा न होगा कि ये मदरसा मेरे लिए महज़ एक तालीमी इदारा नहीं बल्कि एक मुकम्मल हयात है—एक ऐसी हयात जिसने मुझे जीने का शऊर दिया, मक़सद-ए-हयात से रोशनास कराया और दुनिया व आख़िरत दोनों में कामयाबी की राहें दिखाईं।
बिला शुबह दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी एक रोशन, दरख़्शाँ और ताबिंदा सितारे की मानिंद है, जिसकी रौशनी से हज़ारों नहीं बल्कि लाखों तुलबा फ़ैज़ियाब हो रहे हैं, और इंशा अल्लाह ये फ़ैज़ क़यामत तक जारी व सारी रहेगा।
अल्लाह तआला इस अज़ीम इदारे को हमेशा क़ायम व दाइम रखे, इसके असातिज़ा व तुलबा को इख़्लास, इस्तिक़ामत और ख़िदमत-ए-दीन की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए, और हमें भी इसी क़ाफ़िले का एक मुख़लिस ख़ादिम बनाए। आमीन।
तहरीर: मुहम्मद फ़िदा अल-मुस्तफ़ा क़ादरी
राब्ता नंबर: 9037099731
पी जी रिसर्च स्कॉलर: दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी केरल