देवबंद की बाबरकत फिजाओं में एक यादगार दिन। निगार शात बुक स्टोर देवबंद


खमा बकफ मोहम्मद आदिल अररियावी

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आज कुब्ल अज़ ज़ुहर मुझे निगार शात बुक स्टोर देवबंद में हाज़िरी का शरफ हासिल हुआ जिसमें दरसी व गैर दरसी हर तरह की बेशुमार किताबें दस्तयाब हैं इस हाज़िरी का मकसद हज़रत मौलाना मुफ्ती अब्दुल रहमान कासमी साहब से मुलाकात था जो कि मुफ्ती साहब से मुलाकात की ख्वाहिश मुझे काफी अरसे से थी। मगर मसरूफियत के बाइस यह सआदत हासिल करना मुश्किल हो रहा था। अल्हम्दुलिल्लाह आज अल्लाह रब्बुल इज्जत ने यह मौका अता फरमाया और मुलाकात मुमकिन हो सकी।
मुफ्ती साहब के साथ खासी देर तक निहायत खुशगवार माहौल में गुफ्तगू का सिलसिला जारी रहा। जिसमें इल्मी बातों के साथ-साथ हल्की फुल्की खुश तबी भी शामिल रही यह नशिस्त निहायत मुफीद और यादगार रही।
दौरान-ए-गुफ्तगू हज़रत मुफ्ती साहब ने निहायत शफकत के साथ मेरी ज़ेर-ए-तस्नीफ किताब फितना-ए-इरतिदाद के बारे में दरयाफ्त फरमाया कि मोहम्मद आदिल अररियावी साहब आपकी यह किताब कब तक मंज़र-ए-आम पर आ रही है? मैंने मुअद्दबाना अर्ज किया कि इंशा अल्लाह अल अजीज बहुत जल्द यह किताब शाए हो जाएगी बस कुछ जरूरी काम बाकी हैं जिनकी तकमील के बाद इसे मंज़र-ए-आम पर पेश कर दिया जाए।
बाद अज़ां हमने यह मुनासिब समझा कि खाली हाथ वापस लौटना अच्छा नहीं लिहाजा किसी किताब का इंतखाब किया जाए। इसी दौरान मेरी नज़र *इस बाजार में पर पड़ी* जो कि शोरिश कश्मीरी साहब की तस्नीफ है। जैसे ही मैंने इस किताब को हाथ में लिया इसका उसलूब और मौजू निहायत दिलकश महसूस हुआ। बिला शुबह यह एक बेहतरीन और लाजवाब तस्नीफ है। चुनांचे मैंने इसे खरीद लिया। वैसे भी मेरा यह मामूल रहा है कि जब भी किसी कुतुब खाने में जाऊं तो खाली हाथ वापस नहीं आता बल्कि कोई ना कोई किताब जरूर खरीदता हूं। इसी खुशी और इतमिनान के साथ हम वापस लौटे।
आखिर में मैं अल्लाह रब्बुल इज्जत से दुआ गो हूं कि वह हज़रत मुफ्ती साहब के कारोबार में खैर व बरकत अता फरमाए और दिन रात तरक्कियात से नवाजे हमेशा शादोआबाद खुश व खुर्रम रखें आमीन सुम्मा आमीन या रब्बुल आलमीन।