*ज़मीर की मौत और मसलहतों का सजदा*
*क़िस्त सोम*
ए वो लोगो! जो अपने नामों के साथ मुसलमान का लाहेका लगाते हों, जो फख्र से खुद को खैर-ए-उम्मत कहते हों, ज़रा अपनी गैरत के मज़ार पर फातेहा तो पढ़ लो, ग़ज़ा की गलियों में ग्यारह हज़ार मासूमों के खून से होली खेली जा रही है, माओं की चादरें तार-तार हो रही हैं, और तुम? तुम अपनी ऐश-ओ-इशरत के महलों में दुबक कर बैठे मसलहत की तस्बीह पढ़ रहे हो, तुम्हारा ईमान अब दिलों में नहीं, सिर्फ ज़बानों के चटखारों और सोशल मीडिया की बेजान पोस्टों में कैद हो चुका है।
*तुम्हारे ज़मीर से चंद सवालात*
आज अर्ज़-ए-मुक़द्दस का हर शहीद तुम से पूछ रहा है, क्या यही ईमान है? कि तुम्हारा भाई कट रहा हो और तुम दुश्मन के ब्रांड्स और मसनुआत से अपनी जेबें भर रहे हो? क्या यही गैरत-ए-ईमानी है? कि तुम्हारी सरहदों पर पहरा देने वाली फ़ौजें सिर्फ अपने ही मुल्क के निहत्थे अवाम के लिए शेर हैं, लेकिन सयहूनी दरिंदों के सामने अमन की फाख्ता बनी बैठी हैं? क्या यही मुसलमान होने का मतलब है? कि तुम ज़ालिम को रोकने के बजाए मज़लूम को सब्र की तलकीन करो? क्या यही अल्लाह की बारगाह में पेशानी झुकाने का मतलब है? कि मस्जिदों में सजदे तो हों, मगर उन सजदों में वो तड़प न हो जो बातिल के ऐवानों में लर्ज़ा तारी कर दे?
*मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ का झूठा दावा*
तुम बड़े दावे से कहते हो कि हमें रसूल अल्लाह ﷺ से मोहब्बत है, क्या यही है मोहब्बत-ए-रसूल का मतलब? कि जिस नबी ﷺ ने फरमाया था कि मुसलमान एक जिस्म की मानिंद हैं, आज उस जिस्म का एक-एक उज़्व काटा जा रहा है और बाकी आज़ा ख्वाब-ए-खरगोश के मज़े ले रहे हैं? क्या यही है सहाबा किराम की सिखाई हुई मोहब्बत जिन्होंने कुफ्र के सामने सर झुकाने के बजाए गर्दन कटवाना बेहतर समझा, और तुमने दुनियावी जाह-ओ-जलाल की खातिर अपनी रूह तक बेच डाली?
कल जब तारीख लिखी जाएगी, तो तुम मुहम्मद बिन कासिम को क्या मुंह दिखाओगे? जिसने एक बेटी की पुकार पर सिंध के रेगज़ारों को फतह कर लिया था। तुम उमर बिन अब्दुल अजीज के सामने क्या उज़्र पेश करोगे? जिसके दौर में भेड़िए और बकरियां एक घाट पर पानी पीते थे, और आज तुम्हारे दौर में भेड़िए मासूम बच्चों का गोश्त खा रहे हैं।
और सब से बढ़ कर, तुम अबु बक्र, उमर, उस्मान और अली (रिज़वान अल्लाह ताला अलैहिम अजमईन) की बारगाह में क्या कहोगे? सिद्दीक-ए-अकबर रज़ी अल्लाह अन्हु की सदाकत, फारूक-ए-आजम रज़ी अल्लाह अन्हु की हैबत, उस्मान-ए-गनी रज़ी अल्लाह अन्हु की हया और हैदर-ए-करार रज़ी अल्लाह अन्हु की शुजाअत का दावा करने वालो! क्या तुम्हारी रगों में वही लहू दौड़ रहा है या अब वहां सिर्फ मसलहत का पानी भर चुका है? तुम्हारी खामोशी बुज़दिली नहीं, बल्कि गद्दारी है। तुम उन ग्यारह हज़ार फलस्तीनियों के कातिल नहीं, बल्कि उनकी नस्ल कुशी के खामोश शरीक-ए-जुर्म हो, याद रखो! अगर आज तुमने अपनी गैरत-ए-ईमानी का सबूत न दिया, तो कल रोज़-ए-क़यामत तुम्हारी ये नमाज़ें, तुम्हारे ये रोज़े और तुम्हारी ये पेशानियों के निशान तुम्हारे खिलाफ गवाही देंगे कि जब हक पुकार रहा था, तो तुम बुज़दिलों की तरह मसलहतों की चादर ओढ़ कर सो रहे थे।

                *✍️मुतअल्लिम अल-जामिया अल-अशरफिया✍️*