एक दफ़ा का ज़िक्र है कि एक बादशाह सलामत शदीद 'डिप्रेशन' का शिकार हो गए। वजह यह नहीं थी कि शाही ख़ज़ाना ख़ाली था, बल्कि दुख इस बात का था कि र'आया इतनी साबिर ओ शाकिर और ढीठ वाक़े हुई थी कि दरबार में कोई शिकायत ले कर आता ही नहीं था। बादशाह को अपना इक़्तेदार बोरिंग लगने लगा कि भई, अगर अवाम रोए पीटेगी नहीं तो हम तसल्लियाँ दे कर अपना सियासी क़द कैसे बढ़ाएँगे? उस ने फ़ौरन अपने मुशीरों की हंगामी मीटिंग बुलाई और हुक्म दिया, "कोई ऐसा जुगाड़ लगाओ कि अवाम की चीख़ें निकलें और वो रोते पीटते दरबार का रुख़ करें!"
वज़ीरों ने अपना रिवायती 'ब्यूरोक्रेटिक' दिमाग़ लड़ाया और मशवरा दिया, "हुज़ूर! शहर के इकलौते पुल पर, जहाँ से सब का रोज़मर्रा का गुज़र होता है, वहाँ 100 रुपये फ़ी बंदा 'गुज़रगाह टैक्स' लगा दें।" बादशाह ने ख़ुशी ख़ुशी मंज़ूरी दे दी। कई दिन गुज़र गए, अवाम चुप चाप 100 रुपये निकाल कर पुल पार करती रही, दरबार में बदस्तूर सन्नाटा छाया रहा।
बादशाह को ग़ुस्सा आया, बोला, "टैक्स सीधा 200 रुपये कर दो!" फिर भी अवाम के माथे पर शिकन तक न आई।
अब बादशाह की अना को चोट लगी, उस ने नया शाही फ़रमान जारी किया: "अब 200 रुपये वसूली के साथ, हर गुज़रने वाले को एक अदद 'लिटर' (जूता) भी बतोर रसीद मारा जाए!"
लेकिन कमाल की बात यह है कि अवाम ने इस 'रिलीफ़ पैकेज' को भी बख़ुशी क़ुबूल कर लिया। न कोई हड़ताल, न कोई धरना।
आख़िरकार बादशाह का पारा हाई हो गया। उस ने ग़ज़ब नाक हो कर हतमी ऑर्डिनेंस जारी किया, "अब 200 रुपये भी पूरे लो, और पुल से गुज़रने वाले हर शख़्स की 'तशरीफ़' पर दो, दो जूते पूरी क़ुव्वत से मारे जाएँ, फिर उसे आगे जाने दिया जाए!"
यह नुस्ख़ा आख़िर कार काम कर गया। कुछ दिन बाद शहरियों का एक हुजूम रोता धोता दरबार में पेश हुआ। बादशाह की बाछें खुल गईं, सीना चौड़ा कर के वज़ीर से कहा, "पूछो इस मज़लूम शहरी से, क्या ज़ुल्म हुआ है इस पर?"
एक मोअज़्ज़ज़ शहरी ने निहायत अदब से हाथ जोड़ कर अर्ज़ किया, "बादशाह सलामत! बाक़ी सब तो फ़र्स्ट क्लास है, आप का टैक्स भी सर आँखों पर और यह जो दो जूते मारने वाली पॉलिसी है, यह भी सेहत के लिए लाजवाब है। शिकायत बस इतनी है कि आप ने जूते मारने के लिए पुल पर सिर्फ़ एक ही सरकारी मुलाज़िम रखा हुआ है, जिस की वजह से रश बहुत लग जाता है। मेहरबानी फ़रमा कर जूते मारने वाले अमले की तादाद बढ़ा दें ताकि तेज़ी से छतरौल हो सके और हमारा क़ीमती वक़्त ज़ाया न हो!"
सबक़ और मौजूदा हालात:
यह लतीफ़ा नहीं, दरअस्ल हमारी प्यारी पाकिस्तानी अवाम की वो शानदार नफ़सियाती तस्वीर है जिस में अब सिर्फ़ 'छतरों' की कमी रह गई है। हमें महँगाई, टैक्सों और ज़िल्लत से कोई ख़ास मसला नहीं, बस हमें इस ज़िल्लत की क़तार में ज़्यादा देर खड़ा न किया जाए। हमारी बस यही इल्तिजा है कि हमें जल्दी से छतर मारें ताकि हम अपने काम पर जा सकें! और सच्ची बात तो यह है कि अब तो शायद छतरों की बरसात भी इस क़ौम के सोए हुए वजूद को झिंझोड़ने के लिए नाकाफ़ी है।
मनक़ूल