मदरसे हमेशा से दीन के क़िले, इख़्लास के मराकिज़ और अख़लाक़ के मज़हर समझे जाते रहे हैं। यहां सिर्फ़ क़ुरान व हदीस की तालीम नहीं दी जाती बल्कि किरदार साज़ी, तवाज़ो, मेहमान नवाज़ी और हुस्न-ए-सुलूक भी सिखाया जाता है। यही वो औसाफ़ थे जिन्होंने मदरसों को अवाम के दिलों में ज़िंदा रखा। मगर जब इन्हीं मराकिज़ में अख़लाक़ी ज़वाल सर उठाए, तो ये महज़ एक कमी नहीं बल्कि एक ख़तरनाक इनहिराफ़ बन जाता है—ऐसा इनहिराफ़ जो ख़ामोशी से दिलों को तोड़ता और दीन के रास्ते को कमज़ोर करता है।
हमने वो ज़माना भी देखा है जब मदरसा सिर्फ़ इल्म का मरकज़ नहीं बल्कि मुहब्बत का गुलिस्तान होता था। तुल्बा के सरपरस्त जब आते, तो मुंतज़िमीन उनका इस्तिक़बाल ऐसे करते जैसे कोई अज़ीज़ मेहमान आया हो। चेहरों पर मुस्कुराहट, लहजों में नरमी, और अंदाज़ में अपनाइयत—ये सब कुछ एक ऐसा माहौल पैदा करता था कि आने वाला शख़्स ख़ुद को इस निज़ाम का हिस्सा महसूस करता था। वो वापस जाता तो उसके दिल में मदरसे की मुहब्बत और ज़बान पर उसकी तारीफ़ होती, और यही तारीफ़ दीन की तरवीज का ख़ामोश ज़रिया बनती।
लेकिन आज…
अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि बहुत से नए और बा'ज़ पुराने मदरसों में एक अजीब क़िस्म की बेहिसी और बदअख़लाक़ी ने जगह बना ली है।
अब अगर आप किसी मदरसे का रुख़ करें—चाहे आप एक आलिम हों या एक आम मुसलमान—तो अक्सर जगहों पर आपको ऐसा महसूस होगा जैसे आप किसी अजनबी दरवाज़े पर खड़े हैं जहां न कोई मुस्कुराहट आपका इस्तिक़बाल करती है, न कोई दिल से “अस्सलामु अलैकुम” कहता है। आप दूर दराज़ से थके हारे पहुंचें, मगर न कोई आपकी थकन का एहसास करेंगे , न एक गिलास पानी पूछेंगे —
चाय तो अब गोया ख़्वाब व ख़याल की बात रह गई है; न ज़ाती जेब से तौफ़ीक़ होती है, न ही मदरसे के आम चंदे से एक प्याली नसीब होती है— ये बेहिसी इस हद को पहुंच चुकी है कि मेहमान नवाज़ी महज़ किताबों का बाब बन कर रह गई है, अमल का हिस्सा नहीं बात सिर्फ़ मेहमान नवाज़ी की कमी तक महदूद नहीं, बल्कि लहजों की सख़्ती, अंदाज़ की बेरुख़ी और गुफ़्तगू की तल्ख़ी दिल को चीर देती है। ऐसा महसूस होता है जैसे आप किसी इल्मी इदारे में नहीं बल्कि किसी सर्द दफ़्तर में दाख़िल हो गए हों जहां इंसान नहीं, सिर्फ़ रस्मी चेहरे बैठे हैं।
और फिर यही मंज़र यकसर बदल जाता है…जब कोई साहिब-ए-हैसियत, कोई “मोटा चंदा” देने वाला दरवाज़े पर आता है! तब वही चेहरे खुल उठते हैं, वही ज़बानें नरम हो जाती हैं, वही लोग ख़ंदा पेशानी, आजिज़ी और ख़ुशामद का ऐसा मुज़ाहिरा करते हैं कि इंसान हैरान रह जाए। गोया मेयार-ए-इज़्ज़त अब इल्म, तक़वा और इख़्लास नहीं बल्कि जेब की गहराई बन चुकी है! ये दोहरा मेयार सिर्फ़ एक अख़लाक़ी कमज़ोरी नहीं बल्कि एक ऐसा नासूर है जो मदरसों की रूह को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है। ये वो ज़ख़्म है जो नज़र नहीं आता मगर असर बहुत गहरा छोड़ता है।
अगर कोई शख़्स हक़ीक़त जानना चाहे तो किसी मदरसे में अजनबी बन कर चला जाए—न तार्रुफ़ कराए, न माली हैसियत ज़ाहिर करे—फिर देखे कि उसके साथ कैसा सुलूक होता है। यही वो कसौटी है जहां बहुत से दावे दम तोड़ देते हैं। ये बदअख़लाक़ी अब इनफ़िरादी मसअला नहीं रही, बल्कि एक उमूमी रवैया बनती जा रही है। और अगर इस का तदारुक़ न किया गया, तो वो दिन दूर नहीं जब अवाम के दिलों में मदरसों की वो इज़्ज़त, वो अक़ीदत, वो मुहब्बत बाक़ी न रहे जो कभी उन का सरमाया थी।
ताहम, उम्मीद की किरण अभी बाक़ी है। आज भी कुछ मदरसे ऐसे हैं जहां अस्लाफ़ की ख़ुशबू महसूस होती है, जहां मुंतज़िमीन हर आने वाले को इज़्ज़त देते हैं, जहां एक मुस्कुराहट सदक़ा समझी जाती है, और जहां एक गिलास पानी भी मुहब्बत के साथ पेश किया जाता है। यही वो इदारे हैं जो हक़ीक़त में दीन की ख़िदमत कर रहे हैं और लोगों के दिलों को अपनी तरफ़ खींच रहे हैं।
वक़्त का तक़ाज़ा है कि हम रुक कर सोचें, अपने रवैयों का जायज़ा लें, और ये फ़ैसला करें कि हम मदरसों को किस सिम्त ले जा रहे हैं। क्या हम उन्हें महज़ चंदा जमा करने के मराकिज़ बनाएंगे?
या उन्हें वाक़ई अख़लाक़, मुहब्बत और इख़्लास का गहवारा बनाएंगे?
याद रखें! मदरसे की अज़्मत उसकी इमारत, उसके फ़ंड या उसके नज़्म में नहीं…बल्कि उसके दरवाज़े पर मिलने वाली इज़्ज़त, उसके अंदर महसूस होने वाली मुहब्बत, और उसके मुंतज़िमीन के अख़लाक़ में पोशीदा होती है।
अगर अख़लाक़ ज़िंदा हैं… तो मदरसा ज़िंदा है। और अगर अख़लाक़ मर गए… तो सिर्फ़ इमारत बाक़ी रह जाती है।
अशआर:
दर पे आए जो ख़ाली हाथ, तो ख़ाली सा मिला
अहल-ए-ज़र आए तो हर चेहरा खुला सा मिला
इल्म के साथ अगर ख़ुल्क़ न हो ज़िंदा कहीं
ऐसा मदरसा फिर सिर्फ़ इमारत सा मिला
बक़लम महमूदुलबारी
mahmoodulbari342@gmail.com