`सलवात व सलाम हो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर…`

`ज़िन्दगी मुबारक जिसे ”सीरत तैयबा“ कहा जाता है…`
`अव्वल ता आखिर आज़माइशों में बसर हुई… इन आज़माइशों में से हर आज़माइश इतनी भारी है कि अगर हम में से किसी पर आए तो वो टूट फूट जाए… मगर हज़रत आक़ा मदनी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इन आज़माइशों को सहते रहे और आगे बढ़ते रहे…और अल्लाह तआला के पसंदीदा दीन इस्लाम को ज़मीन पर जमाते गए… जब ये दीन जम गया…और नाक़ाबिले शिकस्त हो गया तो हज़रत आक़ा मदनी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम…अपने महबूबे हक़ीक़ी के पास तशरीफ़ ले गए…क्योंकि दुनिया बहुत अदना जगह है …ये हज़रात अंबिया, सहाबा, मुक़र्रबीन और औलिया के रहने की जगह नहीं है…ये हज़रात तो यहां एक ख़ास ज़िम्मेदारी के लिए भेजे जाते हैं…जैसे ही उनकी ”ज़िम्मेदारी“ पूरी होती है तो उन्हें यहां की पुरमशक़्क़त ज़िन्दगी से…आज़ादी दे कर अल्लाह तआला के क़ुर्ब में…बुला लिया जाता है…जहां सुकून है, आराम है, राहत है और बहुत वुसअत है…`
`ज़मीन तो बहुत छोटी और बहुत तंग जगह है…जी हां! आखिरत के मुक़ाबले में बहुत छोटी…`

`_सादी हिफ्ज़हुल्लाह तआला के क़लम से_`