मादर-ए-इल्मी दारुल उलूम देवबंद में सालाना इम्तिहान की तैयारी के पेशे नज़र जैसे ही अंजुमन के तहत होने वाले हफ़्तावार प्रोग्रामों का सिलसिला मौकूफ़ होता है, फ़ौरन ही मज़मून निगारी का सिलसिला भी मुनक़ते हो जाता है, और फिर इस कारवाँ को आगे बढ़ाने के लिए काफ़ी हिम्मत और पुख़्ता अज़्म-ओ-इरादा दरकार होता है; लेकिन इस इरादे को अमली जामा पहनाते पहनाते तालीमी अय्याम दोबारा शुरू हो ही जाते हैं, इस तरह तक़रीबन दो माह का तवील अरसा बिना क़लम उठाए गुज़र जाता है, इतनी लंबी मुद्दत के बाद क़लम को जुंबिश देना और मुंतशिर ख़यालात को यकजा कर के औराक़ के हवाले करना कोई आसान काम नहीं होता।
मेरा भी हाल यही है कि मज़मून निगारी का जो शौक़ आगाज़-ए-तालीम से ही समाया था, वो शौक़ तो सलामत रहा; लेकिन टूटे फूटे अंदाज़ में लिखने का जो सिलसिला जारी था, वो सालाना इम्तिहान के क़रीब बिल्कुल ख़त्म हो गया, अय्याम-ए-तातील में जो कुछ लिखने पढ़ने का इरादा ले कर घर आया था, अव्वलन तो दिल दोज़ और अचानक पेश आमदा हादसात ने इस इरादे पर पानी फेर दिया, और फिर तरावीह और फ़स्ल की कटाई की उलझन ने रही सही कसर भी पूरी कर दी।
अब बहुत दिनों के बाद खुदावंद-ए-कुद्दूस की जानिब से क़लम उठाने की तौफ़ीक़ हुई, तो कुछ लिख नहीं पा रहा हूँ, अल्फ़ाज़ साथ नहीं दे रहे हैं, ज़ेहन मुंजमिद सा हो गया है, कसल मंदी और सुस्ती सर पर सवार है और क़लम उठाना किसी वाबाल-ए-जान से कम नहीं लग रहा है। ऐसे में वजह-ए-तख़लीक़-ए-कायनात जनाब मोहम्मद रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान आली शान”أحَبُّ الأعمالِ إلى اللهِ أدومُها وإن قَلَّ “
(معرفة السنن والآثار ٥١٩٧) की हक़ीक़त व मअनवियत और ज़्यादा वाज़ेह हो जाती है, कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस अमल को अल्लाह के नज़दीक सब से ज़्यादा महबूब और पसंदीदा क्यों क़रार दिया, जिस पर दवाम और हमेशागी इख़्तियार की गई हो? इस लिए कि जब दरमियान में सुस्ती व काहिली और ग़फ़लत हाइल हो जाए, तो अज़ सरे नौ किसी काम के लिए कमर कसना जू-ए-शीर लाने के मुतरादिफ़ है। इस लिए चाहे कोई भी काम हो, क़त-ए-नज़र इस के कि वो छोटा है या बड़ा, इस को मुसलसल करते रहना चाहिए, चाहे रुकावटों के पहाड़ ही राह में क्यों हाइल न हो जाएं। तमाम रुकावटों, तमाम मवाने और जुमला हवादसात का सामना कर के इस काम को पाबंदी और दवाम के साथ करते रहना चाहिए, तब ही जा कर कश्ती कश्ती साहिल-ए-समंदर पर पहुंच सकती है, और हम कामयाबी से हम किनार हो सकते हैं।
✍️: मोहम्मद शाहिद गुड्डावी