قارئین حضرات آج ایک درد مند کا درد سنیں جس نے حالات کی ترش روئی کے باوجودخود کو غلط کہتے ہوئے حالات کا ساتھ دیا
ناجائز قانونوں کوجاٸز قانون کہہ کر خود کو مجرم ثابت کرتا رہا
باالخلاصہ وہ مملکت بادشاہت،سلطنت کےاصولوں میں خود کوڈھالنا چاہتا تھا
اور خود کو باغی بنانے سےعار کھاتا رہا
باالآخر ایک دن اس سے صبر کا دامن چھوٹا اورحقیقت سے آشنا ہو گیا
تب اسےبغاوت پرمجبور ہوناپڑا
تفصیل ،وظاحت
بھائیو اور بہنو ! حقیقت یہ ہیکہ انسان فطرتاً ایک پُرامن اور اصول پسند مخلوق ہے۔ وہ چاہتا ہے کہ اسے اس کے بنیادی حقوق ملیں،اسے عزت دی جائے، اور وہ اپنی زندگی اپنے اصولوں کے مطابق گزار سکے۔
لیکن جب ایک انسان کو مسلسل دبایا جائے،
اس کی آواز کو روکا جائے، اور اس کے جائز حقوق سلب کر لیے جائیں،
تو پھر وہ خاموش نہیں رہتا۔ یہی وہ حالات ہوتے ہیں جو ایک عام انسان کو باغی بنا دیتے ہیں۔ میں بھی انہی حالات کا شکار ہوا،
اور یوں مجھے باغی بنایا گیا۔
سب سے پہلے، مہنگائی نے میری زندگی کو اجیرن بنا دیا۔ روزمرہ کی ضروریات پوری کرنا مشکل ہو گیا۔ روٹی، کپڑا اور مکان جیسے بنیادی حقوق بھی خواب بن گئے۔ جب ایک انسان اپنے بچوں کی بھوک نہ مٹا سکے، تو اس کے اندر بے بسی اور غصہ جنم لیتا ہے۔ مہنگائی کی اس آگ نے میرے صبر کو جلا دیا، اور میں مجبور ہو گیا کہ اس ناانصافی کے خلاف آواز اٹھاؤں۔
دوسری طرف، مجھے اسلامی شریعت کے احکامات پر عمل کرنے کی مکمل آزادی بھی نہ دی گئی۔ ایک مسلمان ہونے کے ناطے میری خواہش تھی کہ میں اپنی زندگی کو دین کے اصولوں کے مطابق گزاروں، لیکن مجھے مختلف رکاوٹوں کا سامنا کرنا پڑا۔ جب انسان کو اپنے مذہب پر عمل کرنے سے روکا جائے،
مسلمان
بھائیوں اور بہنوں کے حقوق کو پامال کیا جائے
اور مظلوموں کے حق میں آوازاٹھانے کو جرم قرار دیاجاۓ
تو یہ اس کے ایمان اور شناخت پر حملہ ہوتا ہے
۔ یہی وہ لمحہ تھا جب میرے اندر بغاوت کی چنگاری مزید بھڑک اٹھی۔
مزید یہ کہ، مجھے میرے بنیادی حقوق سے محروم رکھا گیا۔ انصاف، آزادیٔ رائے، اور برابری جیسے حقوق صرف کتابوں تک محدود ہو گئے۔ میں نے جب بھی اپنے حق کے لیے آواز اٹھائی، مجھے دبانے کی کوشش کی گئی۔ میرے خیالات کو اہمیت نہ دی گئی، اور میری خواہشات کو نظر انداز کیا گیا۔ ایک انسان کے لیے اس سے بڑی اذیت کیا ہو سکتی ہے کہ اس کی پہچان اور اس کے حقوق کو تسلیم ہی نہ کیا جائے۔
آخرکار، مجھے وہ کرنے کی اجازت بھی نہ دی گئی جو میں چاہتا تھا۔ میری خواہشات، میرے خواب، اور میری محنت سب کو بے معنی بنا دیا گیا۔ مجھے ایک ایسے راستے پر چلنے پر مجبور کیا گیا جو میرا اپنا نہیں تھا۔ جب انسان کو اپنی مرضی کے مطابق جینے کا حق نہ ملے، تو وہ یا تو ٹوٹ جاتا ہے یا پھر بغاوت کرتا ہے۔
میں نے ٹوٹنے کے بجائے بغاوت کا راستہ چنا۔ لیکن یہ بغاوت میری خواہش نہیں تھی، بلکہ یہ ان حالات کا نتیجہ تھی جو مجھ پر مسلط کیے گئے۔ اگر مجھے میرا حق دیا جاتا، اگر مجھے انصاف ملتا، اگر مجھے اپنے دین اور اپنی خواہشات کے مطابق جینے دیا جاتا، تو شاید آج میں باغی نہ ہوتا۔
یوں کہا جا سکتا ہے کہ میں نے بغاوت نہیں کی، بلکہ مجھے باغی بنایا گیا۔
عروہ جی
ناجائز قانونوں کوجاٸز قانون کہہ کر خود کو مجرم ثابت کرتا رہا
باالخلاصہ وہ مملکت بادشاہت،سلطنت کےاصولوں میں خود کوڈھالنا چاہتا تھا
اور خود کو باغی بنانے سےعار کھاتا رہا
باالآخر ایک دن اس سے صبر کا دامن چھوٹا اورحقیقت سے آشنا ہو گیا
تب اسےبغاوت پرمجبور ہوناپڑا
تفصیل ،وظاحت
بھائیو اور بہنو ! حقیقت یہ ہیکہ انسان فطرتاً ایک پُرامن اور اصول پسند مخلوق ہے۔ وہ چاہتا ہے کہ اسے اس کے بنیادی حقوق ملیں،اسے عزت دی جائے، اور وہ اپنی زندگی اپنے اصولوں کے مطابق گزار سکے۔
لیکن جب ایک انسان کو مسلسل دبایا جائے،
اس کی آواز کو روکا جائے، اور اس کے جائز حقوق سلب کر لیے جائیں،
تو پھر وہ خاموش نہیں رہتا۔ یہی وہ حالات ہوتے ہیں جو ایک عام انسان کو باغی بنا دیتے ہیں۔ میں بھی انہی حالات کا شکار ہوا،
اور یوں مجھے باغی بنایا گیا۔
سب سے پہلے، مہنگائی نے میری زندگی کو اجیرن بنا دیا۔ روزمرہ کی ضروریات پوری کرنا مشکل ہو گیا۔ روٹی، کپڑا اور مکان جیسے بنیادی حقوق بھی خواب بن گئے۔ جب ایک انسان اپنے بچوں کی بھوک نہ مٹا سکے، تو اس کے اندر بے بسی اور غصہ جنم لیتا ہے۔ مہنگائی کی اس آگ نے میرے صبر کو جلا دیا، اور میں مجبور ہو گیا کہ اس ناانصافی کے خلاف آواز اٹھاؤں۔
دوسری طرف، مجھے اسلامی شریعت کے احکامات پر عمل کرنے کی مکمل آزادی بھی نہ دی گئی۔ ایک مسلمان ہونے کے ناطے میری خواہش تھی کہ میں اپنی زندگی کو دین کے اصولوں کے مطابق گزاروں، لیکن مجھے مختلف رکاوٹوں کا سامنا کرنا پڑا۔ جب انسان کو اپنے مذہب پر عمل کرنے سے روکا جائے،
مسلمان
بھائیوں اور بہنوں کے حقوق کو پامال کیا جائے
اور مظلوموں کے حق میں آوازاٹھانے کو جرم قرار دیاجاۓ
تو یہ اس کے ایمان اور شناخت پر حملہ ہوتا ہے
۔ یہی وہ لمحہ تھا جب میرے اندر بغاوت کی چنگاری مزید بھڑک اٹھی۔
مزید یہ کہ، مجھے میرے بنیادی حقوق سے محروم رکھا گیا۔ انصاف، آزادیٔ رائے، اور برابری جیسے حقوق صرف کتابوں تک محدود ہو گئے۔ میں نے جب بھی اپنے حق کے لیے آواز اٹھائی، مجھے دبانے کی کوشش کی گئی۔ میرے خیالات کو اہمیت نہ دی گئی، اور میری خواہشات کو نظر انداز کیا گیا۔ ایک انسان کے لیے اس سے بڑی اذیت کیا ہو سکتی ہے کہ اس کی پہچان اور اس کے حقوق کو تسلیم ہی نہ کیا جائے۔
آخرکار، مجھے وہ کرنے کی اجازت بھی نہ دی گئی جو میں چاہتا تھا۔ میری خواہشات، میرے خواب، اور میری محنت سب کو بے معنی بنا دیا گیا۔ مجھے ایک ایسے راستے پر چلنے پر مجبور کیا گیا جو میرا اپنا نہیں تھا۔ جب انسان کو اپنی مرضی کے مطابق جینے کا حق نہ ملے، تو وہ یا تو ٹوٹ جاتا ہے یا پھر بغاوت کرتا ہے۔
میں نے ٹوٹنے کے بجائے بغاوت کا راستہ چنا۔ لیکن یہ بغاوت میری خواہش نہیں تھی، بلکہ یہ ان حالات کا نتیجہ تھی جو مجھ پر مسلط کیے گئے۔ اگر مجھے میرا حق دیا جاتا، اگر مجھے انصاف ملتا، اگر مجھے اپنے دین اور اپنی خواہشات کے مطابق جینے دیا جاتا، تو شاید آج میں باغی نہ ہوتا۔
یوں کہا جا سکتا ہے کہ میں نے بغاوت نہیں کی، بلکہ مجھے باغی بنایا گیا۔
عروہ جی
पाठकगण आज एक दर्द मंद का दर्द सुनें जिसने हालात की तृश रूई के बावजूद खुद को गलत कहते हुए हालात का साथ दिया
नाजाएज कानूनों को जाएज कानून कह कर खुद को मुजरिम साबित करता रहा
बाअलखलासा वह मुमलकत बादशाहत, सल्तनत के उसूलों में खुद को ढालना चाहता था
और खुद को बागी बनाने से आर खाता रहा
बाअलआखिर एक दिन उससे सब्र का दामन छोटा और हकीकत से आशना हो गया
तब उसे बगावत पर मजबूर होना पड़ा
तफसील, वजाहत
भाइयों और बहनों ! हकीकत यह है कि इंसान फितरतन एक पुर अमन और उसूल पसंद मखलूक है। वह चाहता है कि उसे उसके बुनियादी हक मिलें, उसे इज्जत दी जाए, और वह अपनी जिंदगी अपने उसूलों के मुताबिक गुजारे।
लेकिन जब एक इंसान को मुसलसल दबाया जाए,
उसकी आवाज को रोका जाए, और उसके जायज हकूक सलब कर लिए जाएं,
तो फिर वह खामोश नहीं रहता। यही वह हालात होते हैं जो एक आम इंसान को बागी बना देते हैं। मैं भी इन्हीं हालात का शिकार हुआ,
और यूं मुझे बागी बनाया गया।
सबसे पहले, महंगाई ने मेरी जिंदगी को अजीरन बना दिया। रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया। रोटी, कपड़ा और मकान जैसे बुनियादी हक भी ख्वाब बन गए। जब एक इंसान अपने बच्चों की भूख न मिटा सके, तो उसके अंदर बेबसी और गुस्सा जन्म लेता है। महंगाई की इस आग ने मेरे सब्र को जला दिया, और मैं मजबूर हो गया कि इस नाइंसाफी के खिलाफ आवाज उठाऊं।
दूसरी तरफ, मुझे इस्लामी शरीयत के अहकामात पर अमल करने की मुकम्मल आजादी भी ना दी गई। एक मुसलमान होने के नाते मेरी ख्वाहिश थी कि मैं अपनी जिंदगी को दीन के उसूलों के मुताबिक गुजारूं, लेकिन मुझे मुख्तलिफ रुकावटों का सामना करना पड़ा। जब इंसान को अपने मजहब पर अमल करने से रोका जाए,
मुसलमान
भाइयों और बहनों के हुकूक को पामाल किया जाए
और मजलूमों के हक में आवाज उठाने को जुर्म करार दिया जाए
तो यह उसके ईमान और शनाख्त पर हमला होता है
। यही वह लम्हा था जब मेरे अंदर बगावत की चिंगारी मजीद भड़क उठी।
मजीद यह कि, मुझे मेरे बुनियादी हुकूक से महरूम रखा गया। इंसाफ, आजादी ए राय, और बराबरी जैसे हक सिर्फ किताबों तक महदूद हो गए। मैंने जब भी अपने हक के लिए आवाज उठाई, मुझे दबाने की कोशिश की गई। मेरे ख्यालात को अहमियत ना दी गई, और मेरी ख्वाहिशात को नजर अंदाज किया गया। एक इंसान के लिए इससे बड़ी अजियत क्या हो सकती है कि उसकी पहचान और उसके हुकूक को तस्लीम ही ना किया जाए।
आखिरकार, मुझे वह करने की इजाजत भी ना दी गई जो मैं चाहता था। मेरी ख्वाहिशात, मेरे ख्वाब, और मेरी मेहनत सब को बे मानी बना दिया गया। मुझे एक ऐसे रास्ते पर चलने पर मजबूर किया गया जो मेरा अपना नहीं था। जब इंसान को अपनी मर्जी के मुताबिक जीने का हक ना मिले, तो वह या तो टूट जाता है या फिर बगावत करता है।
मैंने टूटने के बजाए बगावत का रास्ता चुना। लेकिन यह बगावत मेरी ख्वाहिश नहीं थी, बल्कि यह उन हालात का नतीजा थी जो मुझ पर मुसल्लत किए गए। अगर मुझे मेरा हक दिया जाता, अगर मुझे इंसाफ मिलता, अगर मुझे अपने दीन और अपनी ख्वाहिशात के मुताबिक जीने दिया जाता, तो शायद आज मैं बागी ना होता।
यूं कहा जा सकता है कि मैंने बगावत नहीं की, बल्कि मुझे बागी बनाया गया।
उरूवा जी
नाजाएज कानूनों को जाएज कानून कह कर खुद को मुजरिम साबित करता रहा
बाअलखलासा वह मुमलकत बादशाहत, सल्तनत के उसूलों में खुद को ढालना चाहता था
और खुद को बागी बनाने से आर खाता रहा
बाअलआखिर एक दिन उससे सब्र का दामन छोटा और हकीकत से आशना हो गया
तब उसे बगावत पर मजबूर होना पड़ा
तफसील, वजाहत
भाइयों और बहनों ! हकीकत यह है कि इंसान फितरतन एक पुर अमन और उसूल पसंद मखलूक है। वह चाहता है कि उसे उसके बुनियादी हक मिलें, उसे इज्जत दी जाए, और वह अपनी जिंदगी अपने उसूलों के मुताबिक गुजारे।
लेकिन जब एक इंसान को मुसलसल दबाया जाए,
उसकी आवाज को रोका जाए, और उसके जायज हकूक सलब कर लिए जाएं,
तो फिर वह खामोश नहीं रहता। यही वह हालात होते हैं जो एक आम इंसान को बागी बना देते हैं। मैं भी इन्हीं हालात का शिकार हुआ,
और यूं मुझे बागी बनाया गया।
सबसे पहले, महंगाई ने मेरी जिंदगी को अजीरन बना दिया। रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया। रोटी, कपड़ा और मकान जैसे बुनियादी हक भी ख्वाब बन गए। जब एक इंसान अपने बच्चों की भूख न मिटा सके, तो उसके अंदर बेबसी और गुस्सा जन्म लेता है। महंगाई की इस आग ने मेरे सब्र को जला दिया, और मैं मजबूर हो गया कि इस नाइंसाफी के खिलाफ आवाज उठाऊं।
दूसरी तरफ, मुझे इस्लामी शरीयत के अहकामात पर अमल करने की मुकम्मल आजादी भी ना दी गई। एक मुसलमान होने के नाते मेरी ख्वाहिश थी कि मैं अपनी जिंदगी को दीन के उसूलों के मुताबिक गुजारूं, लेकिन मुझे मुख्तलिफ रुकावटों का सामना करना पड़ा। जब इंसान को अपने मजहब पर अमल करने से रोका जाए,
मुसलमान
भाइयों और बहनों के हुकूक को पामाल किया जाए
और मजलूमों के हक में आवाज उठाने को जुर्म करार दिया जाए
तो यह उसके ईमान और शनाख्त पर हमला होता है
। यही वह लम्हा था जब मेरे अंदर बगावत की चिंगारी मजीद भड़क उठी।
मजीद यह कि, मुझे मेरे बुनियादी हुकूक से महरूम रखा गया। इंसाफ, आजादी ए राय, और बराबरी जैसे हक सिर्फ किताबों तक महदूद हो गए। मैंने जब भी अपने हक के लिए आवाज उठाई, मुझे दबाने की कोशिश की गई। मेरे ख्यालात को अहमियत ना दी गई, और मेरी ख्वाहिशात को नजर अंदाज किया गया। एक इंसान के लिए इससे बड़ी अजियत क्या हो सकती है कि उसकी पहचान और उसके हुकूक को तस्लीम ही ना किया जाए।
आखिरकार, मुझे वह करने की इजाजत भी ना दी गई जो मैं चाहता था। मेरी ख्वाहिशात, मेरे ख्वाब, और मेरी मेहनत सब को बे मानी बना दिया गया। मुझे एक ऐसे रास्ते पर चलने पर मजबूर किया गया जो मेरा अपना नहीं था। जब इंसान को अपनी मर्जी के मुताबिक जीने का हक ना मिले, तो वह या तो टूट जाता है या फिर बगावत करता है।
मैंने टूटने के बजाए बगावत का रास्ता चुना। लेकिन यह बगावत मेरी ख्वाहिश नहीं थी, बल्कि यह उन हालात का नतीजा थी जो मुझ पर मुसल्लत किए गए। अगर मुझे मेरा हक दिया जाता, अगर मुझे इंसाफ मिलता, अगर मुझे अपने दीन और अपनी ख्वाहिशात के मुताबिक जीने दिया जाता, तो शायद आज मैं बागी ना होता।
यूं कहा जा सकता है कि मैंने बगावत नहीं की, बल्कि मुझे बागी बनाया गया।
उरूवा जी