मेराज मुस्तफा इस्लाम के इतिहास का एक महान और रूहानी वाकिया है, जो नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की अज़मत व जलालत को उजागर करता है। इस वाकिये में उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए गहरे रूहानी और अखलाकी अस्बाक पोशीदा हैं। यह ऐसा वाकिया है जो कुरान व हदीस से साबित है।

سُبْحٰنَ الَّذِیْۤ اَسْرٰى بِعَبْدِهٖ لَیْلًا مِّنَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ اِلَى الْمَسْجِدِ الْاَقْصَا الَّذِیْ بٰرَكْنَا حَوْلَهٗ لِنُرِیَهٗ مِنْ اٰیٰتِنَاؕ-اِنَّهٗ هُوَ السَّمِیْعُ الْبَصِیْرُ

(सूरह अल-इसरा 1)


तर्जुमा-ए-कंजुल ईमान:

पाकी है उसे जो रातों रात अपने बंदे को ले गया मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक्सा तक जिसके गिरदा गिर्द हमने बरकत रखी कि हम उसे अपनी अज़ीम निशानियाँ दिखाएँ बेशक वह सुनता देखता है।


तफसीर सिरातुल जिनान:

*मेराज शरीफ से मुताल्लिक तीन बातें :*

यहाँ मेराज शरीफ से मुताल्लिक तीन बातें काबिले जिक्र हैं :


1:- नबूवत के बारहवें साल रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मेराज से नवाज़े गए, अलबत्ता महीने के बारे में इख्तिलाफ है मगर ज्यादा मशहूर यह है कि सत्ताइसवीं रजब को मेराज हुई।


2:- मक्का-ए-मुकर्रमा से हुज़ूर पुरनूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का बैतुल मुक़द्दस तक रात के छोटे से हिस्सा में तशरीफ ले जाना नस-ए-कुरानी से साबित है, इसका मुनकिर काफिर है और आसमानों की सैर और मनाजिल-ए-कुर्ब में पहुंचना अहादीस-ए-सहीहा मुतमदा मशहूरा से साबित है जो हद-ए-तवातुर के करीब पहुंच गई हैं, इसका मुनकिर गुमराह है।


3:- मेराज शरीफ बहालत-ए-बेदारी जिस्म व रूह दोनों के साथ वाके हुई, यही जम्हूर अहले इस्लाम का अकीदा है और असहाब-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कसीर जमातें और हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जलीलुल कद्र सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम इसी के मुतकिद हैं, आयात व अहादीस से भी यही समझ आता है और जहाँ तक बेचारे फलसफियों का ताल्लुक है जो इल्लत व मअलूल के चक्कर में फंस कर अजीब व गरीब शुकूक व शुबहात का शिकार हैं तो उनके फासिद औहाम महज बातिल हैं, कुदरत-ए-इलाही के मुतकिद के सामने वह तमाम शुबहात महज बे हकीकत हैं।

(तफसीरात अहमदिया, बनी इसराइल, तहत अल-आयत: १, स५०५, रूह अल-बयान, अल-इसरा, तहत अल-आयत: १, ५ / १०४, खज़ाइन अल-इरफान, बनी इसराइल, तहत अल-आयत:१,स५२५, मुल्तकतन)


*सफर-ए-मेराज का खुलासा:*

मेराज शरीफ के बारे में सैकड़ों अहादीस हैं जिनका एक मुख्तसर खुलासा यहां पेश किया जाता है। चुनांचे मेराज की रात हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम बारगाह-ए-रिसालत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम में हाजिर हुए, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मेराज की खुश खबरी सुनाई और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मुकद्दस सीना खोल कर उसे आब-ए-ज़मज़म से धोया, फिर उसे हिकमत व ईमान से भर दिया। इसके बाद ताजदार-ए-रिसालत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बारगाह में बुराक़ पेश की और इंतहाई इकराम और एहतराम के साथ इस पर सवार करके मस्जिद-ए-अक्सा की तरफ ले गए। बैतुल मुक़द्दस में रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नबियों की इमामत फरमाई। फिर वहां से आसमानों की सैर की तरफ मुतवज्जेह हुए। हज़रत जिब्रील अमीन अलैहिस्सलाम ने बारी बारी तमाम आसमानों के दरवाजे खुलवाए, पहले आसमान पर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम, दूसरे आसमान पर हज़रत यहया और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम, तीसरे आसमान पर हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम, चौथे आसमान पर हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम, पांचवें आसमान पर हज़रत हारून अलैहिस्सलाम, छठे आसमान पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और सातवें आसमान पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम हुज़ूर अकदस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ियारत व मुलाकात से मुशर्रफ हुए, उन्होंने हुज़ूर अनवर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इज्जत व तकरीम की और तशरीफ आवरी की मुबारक बादें दीं, हत्ता कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक आसमान से दूसरे आसमान की तरफ सैर फरमाते और वहां के अजायबात देखते हुए तमाम मुकर्रबीन की आखिरी मंजिल सिदरतुल मुंतहा तक पहुंचे। इस जगह से आगे बढ़ने की चूँ कि किसी मुकर्रब फरिश्ते को भी मजाल नहीं है इसलिए हज़रत जिब्रील अमीन अलैहिस्सलाम आगे साथ जाने से माज़रत करके वहीं रह गए, फिर मकाम-ए-कुर्ब-ए-खास में हुज़ूर पुर नूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तरक्कियां फरमाईं और इस कुर्ब-ए-आला में पहुंचे कि जिसके तसव्वुर तक मखलूक के अफकार व ख्यालात भी परवाज़ से आजिज़ हैं। वहां रसूल-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर खास रहमत व करम हुआ और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इनामते इलाहिया और मखसूस नेमतों से सरफराज़ फरमाए गए, ज़मीन व आसमान की बादशाहत और उनसे अफजल व बरतर उलूम पाए। उम्मत के लिए नमाज़ें फर्ज़ हुईं, नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बाज़ गुनाहगारों की शफाअत फरमाई, जन्नत व दोज़ख की सैर की और फिर दुनिया में अपनी जगह वापस तशरीफ ले आए। जब सरवर-ए-आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस वाकिये की खबरें दीं तो कुफ्फार ने इस पर बहुत वावेला किया और हुज़ूर-ए-अकदस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बैतुल मुक़द्दस की इमारत का हाल और मुल्क-ए-शाम जाने वाले काफिलों की कैफियतें दरयाफ्त करने लग गए