एक मुसलमान की दोस्ती गैर मुस्लिम के साथ किस हद तक होनी चाहिए 



            सबक आमोज़ वाक़िया

उमर फ़ारूक़ क़ासमी होली के लिए हमारे स्कूल में छुट्टी होने वाली थी, स्कूल के एक गैर मुस्लिम उस्ताद होली के मुक़द्दमे के तौर पर गुलाबी रंग से भरी हुई एक थैली लेकर आए हुए थे, जाने के वक़्त सिवाए मेरे एक दूसरे की पेशानियों पर गुलाल भी भरे, उस वक़्त मुस्लिम असातज़ा में तन्हा सिर्फ मैं था, उन साहिब ने कहा ... कहिए फ़ारूक़ साहिब ! अगर आप को गुलाबी रंग में रंग दिया जाए तो कैसा रहेगा, मैं ने जवाब में कहा ये आप का त्यौहार है ... आप मनाएँ ... मुझे क्यों शरीक करते हैं, मैं ने वाज़ेह तौर पर कहा के ये आप की मज़हबी शनाख़्त है और हमें इस्लाम के अलावा किसी भी मज़हबी शनाख़्त से मनअ किया गया है, इस लिए ये रंग मैं किसी भी हाल में नहीं लगा सकता, उन्होंने दोस्ती और मुहब्बत का हवाले देते हुए कहा के दोस्ती की बक़ा की ख़ातिर ऐसा कर लेने में कोई हर्ज नहीं, मैं ने ये समझाने की कोशिश की मेरे मज़हब ने दोस्ती और दुश्मनी दोनों का दायरा मुतय्यन किया है, हम दोस्ती में भी शरीयत के दायरे को नहीं फलांग सकते और दुश्मनी में भी नहीं फलांगने की कोशिश करते , जहाँ तक इंसानियत का मामला होगा वहाँ तक हम आप के साथ साथ होंगे और जहाँ आप का मज़हबी तशख़्ख़ुस और तहज़ीबी पहचान का दायरा होगा, जिस की लकीरें इस्लामी तशख़्ख़ुस के ख़िलाफ़ होंगी वहाँ हम आप से अलग हो जाएँ गे आप को इस शर्त के साथ दोस्ती रखना है, रखें, वरना नहीं लेकिन उन साहिब ने बार बार प्रेम और मुहब्बत का हवाला देते हुए कहा ये रंग रलियाँ मुहब्बत और प्रेम की अलामत हैं हम रंग लगा कर इज़हार-ए-मुहब्बत तो करेंगे अब आप का मामला है के मुहब्बत का जवाब नफ़रत से दें या मुहब्बत से , मैं ने कहा के हमारे मुआशरे में मुहब्बत करने वाले एक दूसरे के साथ एक प्लेट में खाना भी खाते हैं, हम लोग जमात में जाते हैं तो एक प्लेट में चावल दाल और सब्ज़ियाँ रख कर तनावल फरमाते हैं , हम मुसलमान अपनी बेगमात के साथ एक प्लेट में खाना खाते हैं, कभी वो मेरे मुँह में निवाला रखती है कभी मैं, चलिए आप को मुहब्बत का इतना ही भूत सवार है तो हम मुहब्बत निभाने के लिए आप का रंग लगाने पर ग़ौर करते हैं लेकिन पहले आप को भी मेरी मुहब्बत निभाने के लिए एक प्लेट में एक साथ खाना होगा और जो चीज़ मैं खाऊँ गा या खिलाऊँ उसे आप को भी लेना होगा चाहे वो कुछ भी हो, आप का मज़हब उसे मुक़द्दस मानता हो, या ग़ैर मुक़द्दस, हलाल मानता हो या हराम, उसे लायक एहतराम मानता हो या लायक तोहिन, अगर मुहब्बत की ये शर्त आप को मंज़ूर है तो मुहब्बत निभाने के लिए मैं भी सोच कर देखूँ गा। मैं ने मसलहतन गाय के गोश्त का नाम नहीं लिया लेकिन वो मेरे जवाब का मतलब समझ चुके थे उन्होंने नज़र अंदाज़ करते हुए कहा चाहे आप के झूठे से हमें बीमारी लग जाए,? मैं ने कहा ये तो तकमील-ए-मुहब्बत है के मुहब्बत में आशिक़ बीमार तो क्या? मरने के लिए भी तैयार हो जाता है इस के बाद उन का जुमला था आप बहुत कट्टर पंथ मालूम होते हैं मैं ने कहा कट्टर पंथ मैं हूँ या आप? आप मुहब्बत निभाने के लिए एक प्लेट में खाने के तैयार नहीं मैं आप की मुहब्बत में मज़हबी तशख़्ख़ुस छोड़ ने के तैयार हो जाऊँ? ...... वाह मेरे यार बा वफ़ा ۔۔