*अफ़सोस कि फ़िरऔन को इंग्लिश की न सूझी*

हमें मिटाने के लिए कैसी कैसी साज़िशें होती हैं और किस किस तरह से हमारी बरबादी के मंसूबे बनाए जाते हैं और कौन कौन इन मंसूबों को बरूए कार लाने के लिए सरगर्म है, हमें पता चल जाए तो मालूम नहीं हम क्या कर गुज़रें, किस किस का गिरेबान हमारे हाथों में हो और किस किस की रंगीन अबा हमारे हाथों तार तार हो जाए, लेकिन हक़ीक़त ये है कि हर साज़िश से बुलंद एक तदबीर-ए-इलाही भी होती है, इंसान चाहे जितनी भी चालें चल ले, मगर रब की हिकमत सब पर ग़ालिब रहती है, दुश्मनों की परछाइयाँ कितनी ही तवील क्यों न हों, रौशनी का एक सच्चा ज़र्रा उन्हें मिटा देने के लिए काफ़ी होता है, जो लोग हमारे ख़िलाफ़ मंसूबे बनाते हैं, उन्हें शायद ये मालूम नहीं कि हम भरोसा कुव्वत-ए-बाज़ू पर नहीं, उस ज़ात पर रखते हैं जो एक *कुन* कह दे तो सारी तदबीरें हवा हो जाती हैं।
हिंदुस्तान में ज़हानतों को कुचलने का, हमारी नस्लों को बंजर कर देने का और हमारे बच्चों को तबाह व बर्बाद करने का जो खेल खेला जा रहा है पूरी रूए अर्ज़ पर और पूरी तारीख़ इंसानी में इस की मिसाल नहीं मिलती, ज़रा ग़ौर करें, लोगों से पूछें दुनिया में इधर उधर आने जाने वालों से मालूम करें, दुनिया भर में अपने दोस्तों से राब्ता करें और पूछें, मैं मुल्कों का नाम लेता हूँ और फिर आप पता करें।
1।इंग्लैंड 2। रूस 3।चीन 4। कनाडा 5। स्पेन 6। हॉलैंड 7। फ़्रांस 8। जर्मनी 9। अमरीका 10। बुल्गारिया
11। लक्ज़मबर्ग 12। डेनमार्क
13। नॉर्वे 14। इटली 15। माल्टा
16। कोरिया 17। वियतनाम 18। जापान
इन मुल्कों में रहने वालों से पूछें कि जब आप का बच्चा 4 या 5 साल का होता है और आप उसे स्कूल भेजने का फ़ैसला करते हैं तो वो कितनी ज़बानों में तालीम हासिल करना शुरू करता है? क्या ऐसा ही होता है कि एक तो अपनी ज़बान और एक किसी आलमी ताक़त की ज़बान, ताकि वो तरक़्क़ी कर सके, आगे बढ़ सके, अगर आप को जवाब न मिले या पत्थर पड़ें तो उन्हें बताएँ कि दुनिया में एक ऐसा मुल्क है जहाँ ये तमाशा पिछले 76 साल से हो रहा है, और साथ ये भी बताएँ, मैं बात दोहरा भी दूँ और वाज़ेह भी कर दूँ कि हिंदुस्तानियों का आई क्यू(IQ) भी ख़तरनाक हद तक गिर चुका है और उन्हें सामने की बात समझाने के लिए भी बहुत मग़ज़ मारी करनी पड़ती है, हिंदुस्तान दुनिया का वाहिद मुल्क है जहाँ पर एक 4, 5 साल के बच्चे को दो ज़बानों में तालीम देने का आग़ाज़ किया जाता है और ये अमल पूरी दुनिया के किसी भी तरक़्क़ी याफ़्ता या माक़ूल मुल्क में नहीं होता, इस से क्या होता है, अगर आप को नहीं पता तो मैं बताता हूँ।
एक ज़बान दाएँ से बाएँ लिखी जाती है और दूसरी ज़बान बाएँ से दाएँ लिखी जाती है, दोनों ज़बानों का रस्म उल ख़त एक दूसरे से बिल्कुल मुख़्तलिफ़ है और दोनों में किसी क़िस्म का कोई रब्त या ताल्लुक़ नहीं, बच्चा घर में एक ज़बान सीखता है इस को बोलता है और जूंही वो स्कूल में पहुँचता है एक दूसरी ज़बान में तालीम हासिल करना शुरू कर देता है, जिस से अमली तौर पर इल्म हासिल करने को वो एक मुश्किल और पेचीदा अमल समझना शुरू कर देता है,
अल्फ़ाज़ हुरूफ़ पर मुश्तमिल होते हैं, और हर हर्फ़ की एक शक्ल होती है, शुरू के सालों में जब बच्चे को पढ़ाया जाता है तो वो हर लफ़्ज़ की एक शक्ल ज़ेहन में बनाता है, जब दो ज़बानों में इस को तालीम दी जाती है तो इस के ज़ेहन में ये शक्ल गड्ड मड्ड होना शुरू हो जाती है नतीजतन वो लिखने पढ़ने में मुश्किलात का शिकार हो जाता है क्या आप ने कभी अपने बच्चों को उलझते, स्टपटाते और बेज़ारी से किताबों को इधर उधर फेंकते देखा है, अगर ऐसा हुआ है तो इस का सबब यही दोग़ला निज़ाम तालीम है।
फिर ये भी है कि एक बच्चा एक ज़बान में जब इल्म हासिल करता है तो इस का ज़ेहन यकसू होता है, अब इस का ज़ेहन इंतिशार का शिकार हो जाता है और वो दोहरे बोझ तले दब जाता है, नतीजा वही होता है जो कि है कि पच्चीस करोड़ मुसलमान और इस में एक भी आलमी मेयार का साइंस दान, इंजीनियर, माहिर माशियात, डॉक्टर, स्कॉलर, या माहिर तालीम नहीं बन सका, ये हमारे हुक्मरानों के अंदर का ख़ौफ़ है कि इन से इन का राज सिंहासन छिन न जाए, वो तबक़ाती तक़सीम और एक तबक़े की दूसरे तबक़े पर बाला दस्ती को रखने की जद्द ओ जहद में मसरूफ़ हैं, जब वो कहते हैं कि हम स्कूल इस लिए क़ायम कर रहे हैं कि ग़रीब का बच्चा भी उसी मेयार की तालीम हासिल करे जो कि एक अमीर का बच्चा हासिल कर रहा है तो इन के ज़ेहन में ग़रीबों को तालीम से महरूम करने और इन को कुचल देने के सिवा कोई मक़सद नहीं होता, सीधी सी बात है अगर वो वाक़ई ग़रीबों के बच्चों और अमीरों के बच्चों को एक जैसी तालीम देना चाहते हैं तो पूरे मुल्क में यकसाँ निज़ाम तालीम राइज़ करें, पूरे मुल्क में एक ज़बान में तालीम दी जाए जो नार्मल हो, अगर चीन और रूस जैसे बड़ी आबादी और वसीअ रकबे वाले मुल्क अपने हाँ एक ज़बान नाफ़िज़ कर के तरक़्क़ी की सीढ़ियाँ चढ़ सकते हैं तो हिंदुस्तान पर ऐसा क्या अज़ाब है कि इस में एक ज़बान नाफ़िज़ नहीं हो सकती और इस के साथ साथ एक ग़ैर मुल्की ज़बान को मुसल्लत किया जा रहा है।
मैं समझता हूँ कि जो फ़िरऔन ने बनी इसराइल के साथ किया था वही हिंदुस्तानी क़ौम के साथ किया जा रहा है, वो भी बनी इसराइल के बच्चों को क़त्ल करवा रहा था यहाँ भी यही हो रहा है सिर्फ़ तरीका जुदा है मगर मक़सद और हदफ़ एक ही है, मैं किसी दूसरी तहरीर में ये भी बताऊँगा कि हिंदुस्तान में लड़कों को किस तरह क़त्ल किया जा रहा है, मगर आज की तहरीर में, मैं इसी बात पर इक्तिफ़ा करूँगा कि हिंदुस्तान में बच्चों की ज़हानतों को किस तरह कुचला जा रहा है इन को किस तरह ज़ेहनी इंतिशार का शिकार किया जा रहा है और किस तरह इन के जौहर को बर्बाद किया जा रहा है।
हिंदुस्तान दुनिया का वाहिद मुल्क है जहाँ ज़बान को इल्म का दर्जा दे कर बच्चों को हमेशा के लिए इस की गुत्थियों को सुलझाने पर लगा दिया जाता है वो 14 साल तक इस ज़बान की गुत्थियाँ सुलझाने के चक्कर में लगे रहते हैं गिरते हैं, फ़ेल होते हैं उठते हैं फिर गिरते हैं, फ़ेल होते हैं और आख़िर कार तालीम को ख़ैरबाद कह जाते हैं, इल्म क्या है, साइंस और टेक्नालोजी क्या है, मइशत और मुआशरत क्या है इस तक तो इन को पहुँचने ही नहीं दिया जाता, आइए मिल कर इस जाल को इस फंदे को तोड़ने की कोशिश करें वरना मातम करना और पीटना तो हमें आता ही है, आओ पिछले 76 सालों का मातम करें, जो नस्लें बे फ़ैज़ मर गईं उन का मातम करें और जिस ग़ुलामी और बेचारगी की तरफ़ हमें धकेला जा रहा है इस का मातम करें, अपनी आने वाली नस्लों का मातम करें, अपनी बरबादी और तबाही का मातम करें।
यूँ क़त्ल से बच्चों के वो बदनाम न होता
अफ़सोस कि फ़िरऔन को इंग्लिश की न सूझी।

                   *✍️मुतअल्लिम अल जामिया अल अशरफिया✍️*