हम आज डिजिटल मीडिया की दुनिया में रहते हैं, जहाँ महज लम्हों में लोगों के ज़ेहन तक पहुँचने के लिए ख्यालात का पुल बांधा जाता है। अल्फ़ाज़ हवा से तेज़ सफ़र करते हैं। जिस लम्हे आप अपने फ़ोन या कंप्यूटर पर बटन दबाते हैं, आपके अल्फ़ाज़ पूरी दुनिया में फैल जाते हैं। साइबेरिया में कोई शख्स देख सकता है कि आपने क्या भेजा है यह जाने बगैर कि आप कौन हैं। अल्फ़ाज़ अब कोई लम्हा ब लम्हा बोली और फिर भूल जाने वाली चीज़ें नहीं हैं। वह एक देरपा असर बन गए हैं, जो शऊर में जुड़े हुए हैं, जज़्बात को मुतास्सिर करते हैं, और तर्ज़-ए-अमल को तशकील देते हैं।
इस्लाम ने कलिमात को बुलंद व बाला दर्जा दिया है। एक मेहरबान लफ्ज़ सदक़ा समझा जाता है, जबकि एक सख्त लफ्ज़ इख्तिलाफ़ को भड़का सकता है और संगीन नताइज के साथ नुकसान पहुंचा सकता है। दरहक़ीक़त, एक लफ्ज़ एक तनाज़े को भड़का सकता है जिसके असरात तवील अर्से तक बरकरार रहेंगे। सोशल मीडिया के फैलाव के साथ, एक शख्स की ज़िम्मेदारी उसके लिखने और शाए करने के लिए कई गुना बढ़ गई है। एक लफ्ज़ किसी की रहनुमाई का सबब हो सकता है या उसके भटकने, दिलों को जोड़ने या उनको अलग करने का बहाना हो सकता है।
यह अफ़सोसनाक है कि कुछ लोग अपने ख्यालात और आरा को बगैर गहरे गौर व फ़िक्र के शाए करते हैं। ख़बरें बगैर तस्दीक के फैलती हैं, और राय बगैर इल्म के फैलती रहती है, यहां तक कि सच और झूठ की आमेज़िश हो जाती है, और हक़ की आवाज़ अल्फ़ाज़ के शोर में गुम हो जाती है। लिहाज़ा इंसान को चाहिए कि उनके कलाम को शाए करने से पहले सच्चाई, दियानत, इंसाफ़ और दियानत के तराज़ू पर तोले और अपने क़लम को इस्लाह व तामीर का आला बनाए न कि इंतशार व फ़साद का आला।
अल्फ़ाज़ एक अमानत हैं जो उनके मालिकों पर रखी जाती है। खुश नसीब हैं वह लोग जो अपनी ज़बान व क़लम को नेकी, इस्लाह और हिदायत का रास्ता बनाते हैं न कि गुमराही और फ़ितना व फ़साद का।