कहीं हम बख्शे बगैर न रह जाएं…
आज रमज़ान का आख़िरी रोज़ा है…
दिल एक अजीब सी घबराहट में है…
कि न जाने यह मौका
दोबारा नसीब होगा भी या नहीं।
हमने इस रमज़ान में क्या क्या?
कितना रोए?
कितनी सच्ची तौबा की?
कितनी बार दिल से कहा
“या अल्लाह! हमें माफ़ कर दे…”
या फिर
हमने दिन गुज़ार दिए,
रातें गुज़ार दी
और खुद को यह कह कर मुतमइन कर लिया
कि अभी वक़्त बाक़ी है।
मगर अब…
वक़्त ख़त्म होने को है।
चंद घंटे बाक़ी है
और रब को मनाने के लिए एक लब कुशाई काफ़ी है
और सबसे बड़ा ख़ौफ़ यह नहीं
कि रमज़ान जा रहा है…
बल्कि यह है कि
कहीं हम मग़फ़िरत हुए बग़ैर न रह जाएं।
वह लोग कितने ख़ुश नसीब होंगे
जिन के गुनाह माफ़ हो चुके होंगे…
और हम…?
क्या हम भी उन में शामिल हैं
या अभी तक ग़फ़लत में खड़े हैं?
अभी भी वक़्त है
अभी साँस बाक़ी है…
अपने रब के सामने झुक जाएं,
दिल से तौबा करें,
रो कर मांग लें…
कि अगर आज भी न मांगा
तो शायद फिर मौका न मिले।
यह आख़िरी मौका हो सकता है…
कहीं हम बख्शे बगैर न रह जाएं…
या अल्लाह तआला
हमारे तमाम सगीरा कबीरा गुनाहों को माफ़ फ़रमा दीजिए
आप सब से खुसूसी दुआओं की दरख़्वास्त
🤲🏻🤲🏻🤲🏻🤲🏻
आयशा ❤