तकमील-ए-क़ुरान की सआदत और अहले मोहल्ला की मुहब्बतें
✍🏻*ख़ामा बकफ़ मोहम्मद आदिल अररियावी*
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रमज़ानुल मुबारक रहमतों बरकतों और मग़फ़िरतों का मुक़द्दस महीना है इस बा-बरकत महीने में अल्लाह रब्बुल इज्ज़त अपने बंदों को इबादत क़ुरान करीम से ताल्लुक़ और नेकियों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने के बेशुमार मौक़े अता फरमाता है खुश नसीब हैं वो लोग जिन्हें इस महीने में क़ुरान करीम की खिदमत और तरावीह में उसकी तिलावत की सआदत नसीब होती है।
अल्लाह रब्बुल इज्ज़त का बे-पयां फज़ल ओ करम है कि गुज़िश्ता शब मुझे आठवीं मर्तबा नमाज़ तरावीह में क़ुरान करीम की तकमील की सआदत हासिल हुई ये मेरे लिए इंतहाई अज़ीम एज़ाज़ और क़ाबिल-ए-शुक्र नेमत है अलहमदु लिल्लाह जब से अल्लाह ताला ने हिफ्ज़-ए-क़ुरान की दौलत से नवाज़ा है तब से हर साल रमज़ानुल मुबारक में तरावीह के ज़रिए क़ुरान करीम सुनाने का शर्फ़ हासिल होता रहा है और इस साल भी इसी सआदत से बहरामंद हुआ तकमील-ए-क़ुरान के बाद मामूल के मुताबिक़ तक़रीबन आधा घंटा नाचीज़ ने मुख्तलिफ़ अहम दीनी मौज़ूआत पर गुफ़्तगू की जिन में फ़ज़ीलत-ए-क़ुरान शब-ए-क़द्र की अज़मत ओ बरकत और वालिदैन की खिदमत ओ इताअत की अहमियत जैसे उनवानात शामिल थे इस के बाद मस्जिद के मोअज्ज़ज़ इमाम साहब हाफ़िज़ रियाज़ुद्दीन साहब ने निहायत मुख्तसर मगर जामे और मुअस्सिर नसीहत फरमाई उन की पुर-असर गुफ़्तगू के बाद उन्ही के हाथों इज्तिमाई दुआ हुई और यूं ये बा-बरकत मजलिस अपने इख्तिताम को पहुंची। ये भी अल्लाह रब्बुल इज्ज़त का खास करम है कि पूरे रमज़ानुल मुबारक में अलहमदु लिल्लाह एक भी तरावीह क़ज़ा नहीं हुई ये अल्लाह रब्बुल इज्ज़त की खुसूसी तौफ़ीक़ और मेहरबानी है जिस पर जितना भी शुक्र अदा किया जाए कम है।
जहां मुझे तरावीह पढ़ाने के लिए क़याम का मौक़ा मिला वहां के लोग हक़ीक़तन निहायत नेक दिल खुश अख़लाक़ मुहब्बत करने वाले और मुखलिस हैं वो हमेशा खैरियत दरयाफ्त करते खंदा पेशानी से मिलते और बे-हद इज्ज़त ओ मुहब्बत से पेश आते थे हम ने वहां एक माह क़याम किया लेकिन हमें हरगिज़ अजनबियत का एहसास नहीं हुआ अगरचे माहौल हमारे लिए नया था मगर वहां के लोगों की मुहब्बत खुलूस और अपनाइयत ने हमें ऐसा एहसास दिलाया जैसे हम अपने ही लोगों के दरमियान हों वहां का माहौल भी निहायत खूबसूरत था सब लोगों का मुस्कुराते चेहरों के साथ मिलना आपस में बैठ कर दीन ओ दुनिया की बातें करना एक दूसरे के साथ वक़्त गुज़ारना ये सब लम्हात दिल में एक खास जगह बना गए हैं।
आज जब वापसी का वक़्त आया तो दिल वाक़ई बहुत उदास था सब हजरात से मुहब्बत भरे अंदाज़ में मुलाक़ात हुई और कई अहबाब तो हमें रुख़सत करने के लिए बस स्टेशन तक भी तशरीफ़ लाए सच कहूं तो जहां ऐसा पाकीज़ा माहौल और ऐसे मुखलिस ओ मुहब्बत करने वाले लोग मिल जाएं वहां से वापस आना इंसान के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है दिल तो चाहता है कि वहीं रहा जाए मगर ज़िंदगी की अपनी मजबूरियों और ज़िम्मेदारियों के बाइस वापस लौटना भी ज़रूरी होता है क्योंकि इंसान हमेशा एक जगह क़याम नहीं कर सकता आखिर में दिल की गहराईयों से दुआ गो हूं कि अल्लाह रब्बुल इज्ज़त इन तमाम मुहिब्बीन मुखलिस अहबाब और अहले मोहल्ला को हमेशा शाद ओ आबाद रखे उन्हें सेहत ओ सलामती अता फरमाए उन के घरों में हमेशा खुशियां बरकतें और राहतें नाज़िल फरमाए और दुनिया ओ आखिरत में कामयाबी ओ कामरानी अता फरमाए आमीन सुम्मा आमीन या रब्बल आलमीन।