संक्षिप्त है लेकिन गहराई बहुत है
हराम ताल्लुक़ की
एक खामोश हकीकत
हराम ताल्लुक़ शोर नहीं मचाता,
यह आहिस्ता-आहिस्ता इंसान को अंदर से खोखला कर देता है।
नमाज़ बोझ लगने लगती है,
दिल ज़िक्र से भागता है,
घर वालों के साथ दिल नहीं लगता
दोस्त भी अच्छे नहीं लगते
और ज़मीर हर रात सवाल करता है।
यह ताल्लुक़ वादे तो बहुत करता है
मगर अंजाम में सिर्फ़ खौफ़,
बेचैनी और पछतावा देता है
सोचें:
जो ताल्लुक़ छुपाना पड़े,
क्या वह वाकई खुशी दे सकता है?
अल्लाह ने जो रोका है
वह महरूमी के लिए नहीं
बल्कि हिफाज़त के लिए है
आयशा ❤