*सामूहिक प्रार्थना*
या अल्लाह, या रहमान, या रहीम, हमने जो कुछ पढ़ा, उसमें जो शब्दों, अर्थों, जानबूझकर, अनजाने में जो गलतियाँ हुईं हों, उन्हें माफ़ फ़रमा, सही-सही को अपनी बारगाह में क़बूल फ़रमा, तू जो अपनी शान-ए-इलाहियत के ज़रिए सवाब अता करे, वह सबसे पहले हमारी जानिब से नबी आख़िर-उज़-ज़मा ﷺ की बारगाह में पेश करते हैं, शर्फ-ए-क़बूलियत अता फ़रमा।
हुज़ूर ﷺ के तवस्सल से एक लाख चौबीस हज़ार या दो लाख चौबीस हज़ार कम व बेश अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम की बारगाह में पेश करते हैं, शर्फ-ए-क़बूलियत अता फ़रमा, हुज़ूर ﷺ के तवस्सल सहाबा, सहाबियात, ताबेईन व ताबेआत, तब-ए-ताबेईन व तब-ए-ताबीआत, ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन, आइम्मा-ए-मुजतहिदीन की बारगाह में पेश करते हैं, शर्फ-ए-क़बूलियत अता फ़रमा,
हुज़ूर ﷺ के तवस्सल से औलिया, असफ़िया, अतक़िया, उलमा की बारगाह में पेश करते हैं, शर्फ-ए-क़बूलियत अता फ़रमा,
हुज़ूर ﷺ के तवस्सल से सालेहीन व सालेहात की अरवाह को इसका सवाब पेश करते हैं, शर्फ-ए-क़बूलियत अता फ़रमा,
या अल्लाह, जो मुसलमान भाई परेशान हाल हैं, उनकी परेशानी को दूर फ़रमा,
जो बीमार हैं, उन्हें शिफा-ए-कामिला, आजिला, दाइमा, मुस्तमर्रह अता फ़रमा,
जो मक़रूज़ हों, उन्हें क़र्ज़ से सुबुकदोशी अता फ़रमा,
जो बेरोज़गार हों, उन्हें बेहतर से बेहतर रिज़्क़ अता फ़रमा,
रिज़्क़-ए-हलाल खाने, कमाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा,
हमारी खेती बाड़ियों में बरकत अता फ़रमा,
हमारी फ़सलों में बरकत अता फ़रमा,
या अल्लाह, जहाँ भी मुसलमान भाई परेशान हाल हैं, उनके हाल-ए-ज़ार पर रहम फ़रमा,
बालखुसूस तू फ़िलिस्तीन और सूडान के मुसलमानों पर रहम फ़रमा और ज़ालिमीन को नीस्त व नाबूद फ़रमा, या अल्लाह, तू मुसलमानों को खोया हुआ वक़ार दोबारा अता फ़रमा, हमारे हाल-ए-ज़ार पर रहम फ़रमा, हमारी नस्लों में बरकतें अता फ़रमा, या अल्लाह, जो क़ैद में हों, उनकी रिहाई के लिए बेहतर से बेहतर सबब मुहैया फ़रमा, जो बेऔलाद हों, उन्हें बेहतर से बेहतर औलाद अता फ़रमा, या अल्लाह, हम गुनाहगार हैं, सियाहकार हैं, बदकिरदार हैं, तू हमारे हाल-ए-ज़ार पर रहम फ़रमा, हमारी इज़्ज़त व आबरू की हिफ़ाज़त फ़रमा,
हमारी मसाजिद, मदारिस, ख़ानकाहों की हिफ़ाज़त फ़रमा, हमारी वक़्फ़ की ज़मीनों की हिफ़ाज़त फ़रमा, हमारे उलमा-ए-किराम, आइम्मा-ए-किराम की हिफ़ाज़त फ़रमा, या अल्लाह, पर्दा-ए-ग़ैबी से हमारी मदद फ़रमा,
हमें नमाज़ पढ़ने का ज़ौक़ व शौक़ पैदा फ़रमा, सजदों की लज़्ज़तें अता फ़रमा, हम को अपने वालिदैन का फ़रमाबरदार बना, वालिदैन को उम्र-ए-दराज़ अता फ़रमा, बड़ों की इज़्ज़त और छोटों पर शफ़क़त करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा,
या अल्लाह.......... सिद्दीक़-ए-अकबर की सदाक़त का सदक़ा अता फ़रमा
फ़ारूक़-ए-आज़म की अदालत का सदक़ा अता फ़रमा,
उस्मान-ए-ग़नी की सख़ावत का सदक़ा अता फ़रमा,
हज़रत अली की शुजाअत का सदक़ा अता फ़रमा,
इमाम-ए-आज़म की इमामत का सदक़ा अता फ़रमा
ग़ौस-ए-आज़म की करामात का सदक़ा अता फ़रमा।
हमारे बाज़ुओं में ताक़त व क़ुव्वत अता फ़रमा,
या अल्लाह, जो माँग लिया, वह अता फ़रमा, और जो माँगने से रह गया है और हमारे हक़ में बेहतर वह भी अता फ़रमा दे,
हमें इबादत व रियाज़त का शौक़ पैदा फ़रमा, इस्लाम के दुश्मनों को नीस्त व नाबूद फ़रमा।
हमारी तमाम दुआओं को हुज़ूर के तवस्सल से क़बूल फ़रमा और सब कुछ अता फ़रमा जो हमारे लिए बेहतर है, ईमान पर ख़ातमा फ़रमा।
*आमीـــــــــــــــــन यــــा रब्ब الــــــــعـــــــالــــــمـــــیــن بجاہ النبی الکریم ﷺ*
*✍️मुतअल्लिम अल-जामिअतुल अशरफ़िया✍️*