*सीरत से अत्तर निकालने की नाज़ुक़त आफ़रीनी*
बकलम: मुआज हैदर
१९/ रमज़ान १४४७ हिजरी
ऐसे माहौल में नशोनुमा हुई जहाँ हुज़ूर-ए-अकरम ﷺ की सीरत और सहाबा -रज़ी अल्लाहु अन्हुम- के हालात का खूब चर्चा रहा है, "किताबुर रक़ाईक़" की बेस्तर रिवायतें घर में रहते हुए गुज़र गई थीं, "सीरत" के इजमाली इल्म की रौशनी में बोलने की मशक़ थी, नतीजा अख़्ज़ करने का ज़ौक़ भी बन गया था, "सीरतुल मुस्तफ़ा ﷺ" की वरक़ गर्दानी के नतीजे में पैदा होने वाली फ़िक्र को बिल्कुल आज़ादाना अंदाज़ में बोलता था, "पंजुम" के ज़माने में एक कॉपी ले ली थी, इलाक़ाई ज़रूरतों को उनवान बना कर आयात, रिवायत और सीरत के वाक़ियात को दर्ज करता था, तशरीह व ततबीक़ में अक़ली घोड़ी दौड़ाता।
*हज़रत उस्ताद मुफ़्ती नज़ीर अहमद क़ासमी -दामत बरकातहुम-* के ईमा पर जब *"हज़रत मुआज बिन जबल -रज़ी अल्लाहु अन्हु-"* की ज़िंदगी को देखना शुरू किया तो उनकी खिदमात को अमली नमूना बना कर पेश करने का ग़लबा हुआ, उनके मुताल्लिक़ तमाम चीज़ें यकजा कीं, हमारी याददाश्त के मुताबिक़ पचहत्तर से ज़ायद किताबें नज़र से गुज़रीं, इसी दौरान हज़रत -रज़ी अल्लाहु अन्हु- के बारे में यह बात मालूम हुई कि *"सहाबा -रज़ी अल्लाहु अन्हुम- आप -रज़ी अल्लाहु अन्हु- को हज़रत इब्राहीम -अलैहिस्सलाम- से तशबीह देते थे"* उनसे फ़ारिग़ होने के बाद *"हज़रत सय्यदना इब्राहीम -अलैहिस्सलाम-"* के हालात को भी इसी ऐनक से देखना शुरू किया।
हफ़्तम के साल *"मुहद्दिस-ए-अस्र हज़रत मुफ़्ती अब्दुल्लाह मारूफ़ी -दामत बरकातहुम-* से पढ़ने का मौक़ा मिला, आप के इफ़ादात से ज़ेहन बदला, सीरत के वाक़ियात से आज़ादाना इस्तदलाल की आदत पर नज़र-ए-सानी की ज़रूरत महसूस होने लगी, क्यूँ कि किसी भी पर जब तक "पूरी शरीयत" निगाह के सामने न हो तो हतमी बात नहीं कही जा सकती, बारहा दरस में यह बात सुनी कि *"दलाइल के बाब में फ़र्क़-ए-मरातिब का ख़याल करना बेहद ज़रूरी है; इसलिए कि "गर फ़र्क़-ए-मरातिब न कुनी ज़िंदीक़ी"*।
इस वक़्त एहसास हुआ कि यह कोई आसान काम नहीं है, इसके लिए आबला पाई करनी पड़ती है, नुसूस की इस्तनादी हैसियत से वाक़िफ़ होना पड़ता है, दरायती पहलू पर ग़ौर करना होता है, क़ाबिल-ए-अमल होने की निशानदेही करनी होती है, नुसूस के वसीअ ज़ख़ीरे पर अमीक़ नज़र रखनी पड़ती है, शरीयत के मिज़ाज व मज़़ाक़ की आगाही के बग़ैर यह काम नामुमकिन है, मुराद की तईंन एक मुस्तक़िल अमल है, क़राइन की रिआयत हर एक के बस की बात नहीं, मक़सद-ए-शारेअ तक रसाई तो बहुत ही कम लोगों की हो पाती है, इल्लत की दरयाफ़्त और दर पेश मसाइल में उसके इन्तिबाक़ के लिए गहरी बसीरत मतलूब है, ग़ैर मामूली इल्म दरकार है, तब जाकर "आयात, रिवायत और सीरत से अत्तर बेज़ियाँ" की जा सकती हैं।
मिश्कात शरीफ़ पढ़ने के ज़माने में जब पुराना ज़ौक़ बेदार होता था तो रिवायतों पर आज़ादाना तर्जुमा बांधता था फिर हज़रत -दामत बरकातहुम- को सुनाता था, एक मर्तबा दरयाफ़्त किया कि *"इस बाब में हम कौन सी किताब से मदद लें?"* तो फ़रमाया: *"अल्लामा ऐनी -रहमतुल्लाह- को देखो, उन्होंने "उमदतुल क़ारी" में इस का एहतिमाम किया है।"*
*सीरत से अत्तर निकालने की नाज़ुक़त आफ़रीनी*
बकलम: मुआज हैदर
१९/ रमज़ान १४४७ हिजरी
ऐसे माहौल में नशोनुमा हुई जहाँ हुज़ूर-ए-अकरम ﷺ की सीरत और सहाबा -रज़ी अल्लाहु अन्हुम- के हालात का खूब चर्चा रहा है, "किताबुर रक़ाईक़" की बेस्तर रिवायतें घर में रहते हुए गुज़र गई थीं, "सीरत" के इजमाली इल्म की रौशनी में बोलने की मशक़ थी, नतीजा अख़्ज़ करने का ज़ौक़ भी बन गया था, "सीरतुल मुस्तफ़ा ﷺ" की वरक़ गर्दानी के नतीजे में पैदा होने वाली फ़िक्र को बिल्कुल आज़ादाना अंदाज़ में बोलता था, "पंजुम" के ज़माने में एक कॉपी ले ली थी, इलाक़ाई ज़रूरतों को उनवान बना कर आयात, रिवायत और सीरत के वाक़ियात को दर्ज करता था, तशरीह व ततबीक़ में अक़ली घोड़ी दौड़ाता।
*हज़रत उस्ताद मुफ़्ती नज़ीर अहमद क़ासमी -दामत बरकातहुम-* के ईमा पर जब *"हज़रत मुआज बिन जबल -रज़ी अल्लाहु अन्हु-"* की ज़िंदगी को देखना शुरू किया तो उनकी खिदमात को अमली नमूना बना कर पेश करने का ग़लबा हुआ, उनके मुताल्लिक़ तमाम चीज़ें यकजा कीं, हमारी याददाश्त के मुताबिक़ पचहत्तर से ज़ायद किताबें नज़र से गुज़रीं, इसी दौरान हज़रत -रज़ी अल्लाहु अन्हु- के बारे में यह बात मालूम हुई कि *"सहाबा -रज़ी अल्लाहु अन्हुम- आप -रज़ी अल्लाहु अन्हु- को हज़रत इब्राहीम -अलैहिस्सलाम- से तशबीह देते थे"* उनसे फ़ारिग़ होने के बाद *"हज़रत सय्यदना इब्राहीम -अलैहिस्सलाम-"* के हालात को भी इसी ऐनक से देखना शुरू किया।
हफ़्तम के साल *"मुहद्दिस-ए-अस्र हज़रत मुफ़्ती अब्दुल्लाह मारूफ़ी -दामत बरकातहुम-* से पढ़ने का मौक़ा मिला, आप के इफ़ादात से ज़ेहन बदला, सीरत के वाक़ियात से आज़ादाना इस्तदलाल की आदत पर नज़र-ए-सानी की ज़रूरत महसूस होने लगी, क्यूँ कि किसी भी पर जब तक "पूरी शरीयत" निगाह के सामने न हो तो हतमी बात नहीं कही जा सकती, बारहा दरस में यह बात सुनी कि *"दलाइल के बाब में फ़र्क़-ए-मरातिब का ख़याल करना बेहद ज़रूरी है; इसलिए कि "गर फ़र्क़-ए-मरातिब न कुनी ज़िंदीक़ी"*।
इस वक़्त एहसास हुआ कि यह कोई आसान काम नहीं है, इसके लिए आबला पाई करनी पड़ती है, नुसूस की इस्तनादी हैसियत से वाक़िफ़ होना पड़ता है, दरायती पहलू पर ग़ौर करना होता है, क़ाबिल-ए-अमल होने की निशानदेही करनी होती है, नुसूस के वसीअ ज़ख़ीरे पर अमीक़ नज़र रखनी पड़ती है, शरीयत के मिज़ाज व मज़़ाक़ की आगाही के बग़ैर यह काम नामुमकिन है, मुराद की तईंन एक मुस्तक़िल अमल है, क़राइन की रिआयत हर एक के बस की बात नहीं, मक़सद-ए-शारेअ तक रसाई तो बहुत ही कम लोगों की हो पाती है, इल्लत की दरयाफ़्त और दर पेश मसाइल में उसके इन्तिबाक़ के लिए गहरी बसीरत मतलूब है, ग़ैर मामूली इल्म दरकार है, तब जाकर "आयात, रिवायत और सीरत से अत्तर बेज़ियाँ" की जा सकती हैं।
मिश्कात शरीफ़ पढ़ने के ज़माने में जब पुराना ज़ौक़ बेदार होता था तो रिवायतों पर आज़ादाना तर्जुमा बांधता था फिर हज़रत -दामत बरकातहुम- को सुनाता था, एक मर्तबा दरयाफ़्त किया कि *"इस बाब में हम कौन सी किताब से मदद लें?"* तो फ़रमाया: *"अल्लामा ऐनी -रहमतुल्लाह- को देखो, उन्होंने "उमदतुल क़ारी" में इस का एहतिमाम किया है।"*