🖋️बिन्ते अबुल खैर आज़मीؔ

रमज़ानुल मुबारक का मुक़द्दस महीना इंसान की रूहानी तरबियत, अख़लाक़ी ततहीर और बातिनी इस्लाह का अज़ीम ज़रिया है। इस माह-ए-मुबारक में अल्लाह तआला अपने बंदों को इबादत, तौबा, सब्र और शुक्र के नूर से मुनव्वर होने का ख़ास मौक़ा अता फ़रमाता है। रोज़ा दरअसल सिर्फ़ भूख और प्यास बर्दाश्त करने का नाम नहीं बल्कि यह एक जामे इबादत है जो इंसान को सब्र, बर्दाश्त, ज़ब्त-ए-नफ़्स और आला अख़लाक़ की तालीम देती है।

रोज़ा इस्लाम के बुनियादी अरकान में से एक रुक्न है जिसकी फ़र्ज़ियत का ज़िक्र मुक़द्दस किताब अल-क़ुरान अल-करीम में इस तरह आया है कि रोज़ा इंसान को तक़वा की रविश पर गामज़न करता है। रोज़ा रखने वाला शख़्स अल्लाह की रज़ा की ख़ातिर अपनी ख़्वाहिशात को महदूद कर लेता है और नफ़्स की सरकशी पर क़ाबू पाना सीखता है। हक़ीक़त यह है कि रोज़ा इंसान के अंदर सब्र की वह कुव्वत पैदा करता है जो ज़िंदगी की मुश्किलात में उसे साबित क़दम रखती है।

सब्र इंसानी ज़िंदगी का सबसे हसीन और ताक़तवर वस्फ़ है। सब्र का मतलब सिर्फ़ तकलीफ़ बर्दाश्त करना नहीं बल्कि अल्लाह तआला की रज़ा पर राज़ी रहते हुए हालात का सामना करना है। रोज़ा इंसान को यही सबक देता है कि जब वह हलाल खाने पीने को भी एक मुक़र्ररा वक़्त तक छोड़ सकता है तो फिर वह हराम और नापसंदीदा आमाल से क्यों नहीं बच सकता। इस तरह रोज़ा नफ़्स की इस्लाह का बेहतरीन मदरसा साबित होता है।

रमज़ान का माहौल इंसान के दिल को नरम और रूह को बेदार करता है। जब रोज़ादार भूख और प्यास की शिद्दत महसूस करता है तो उसे ग़रीब और मोहताज इंसानों की तकलीफ़ का एहसास होता है। इस एहसास-ए-हमदर्दी से मुआशरे में मोहब्बत, उख़ुवत और भाई चारे की फ़ज़ा पैदा होती है। रोज़ा दरअसल इंसान को यह तालीम देता है कि वह सिर्फ़ अपने लिए नहीं बल्कि पूरी इंसानियत के लिए जीना सीखे।

सब्र की तालीम रोज़े का एक अज़ीम पैग़ाम है। ज़िंदगी में मुश्किलात, बीमारी, ग़ुर्बत और आज़माइशें इंसान का इम्तिहान होती हैं। रोज़ादार जब अल्लाह की ख़ातिर सब्र का रास्ता इख़्तियार करता है तो अल्लाह तआला उसके दरजात बुलंद फ़रमा देता है। सब्र करने वालों के लिए क़ुरान मजीद में बशारत दी गई है कि अल्लाह तआला सब्र करने वालों के साथ है। सब्र इंसान को ज़ेहनी सुकून और क़ल्बी इत्मीनान अता करता है और उसके दिल को नूर-ए-ईमान से रोशन करता है।

रोज़ा इंसान को अख़लाक़ी बुलंदी भी अता करता है। रोज़ादार को ग़ीबत, झूठ, लड़ाई झगड़े और बदज़बानी से बचने की ख़ास ताकीद की गई है। अगर कोई शख़्स रोज़ा रख कर भी अख़लाक़ी बुराइयों में मुब्तिला रहे तो उसका रोज़ा रूहानी एतबार से मुकम्मल नहीं होता। रोज़ा इंसान की ज़बान, निगाह और दिल सब को पाकीज़गी की तरफ़ ले जाता है।
रोज़ा इंसान के अंदर शुक्र गुज़ारी का जज़्बा भी पैदा करता है। 
जब इंसान कुछ देर के लिए अपनी पसंदीदा चीज़ों से दूर रहता है तो उसे अल्लाह तआला की नेमतों की क़द्र मालूम होती है। पानी का एक घूँट और रोटी का एक लुक़्मा भी उसे अल्लाह की अज़ीम नेमत महसूस होने लगता है। यही एहसास इंसान को नाशुक्रि से बचाता है और शुक्र के रास्ते पर गामज़न करता है।

सब्र और रोज़ा दोनों एक दूसरे के लाज़िम व मलज़ूम हैं। रोज़ा सब्र की अमली तरबियत है और सब्र ईमान की मज़बूती का ज़रिया है। जो इंसान रोज़े की हालत में अपने नफ़्स पर क़ाबू रखता है वह ज़िंदगी के दीगर मामलात में भी ज़ब्त-ए-नफ़्स की दौलत हासिल कर लेता है। यही वजह है कि रमज़ानुल मुबारक को रूहानी इस्लाह का मौसम-ए-बहार कहा जाता है।

रोज़ा इंसान को अल्लाह तआला की क़ुर्बत अता करता है क्योंकि रोज़ा ख़ास तौर पर अल्लाह के लिए होता है और इसका अज्र भी अल्लाह ख़ुद अता फ़रमाता है। रोज़ादार जब सहर व इफ़्तार के दरमियान अल्लाह को याद करता है तो उसका दिल नूर-ए-ईमान से रोशन हो जाता है। सब्र की यही कैफ़ियत इंसान को रूहानी बुलंदियों तक पहुँचा देती है।

 रोज़ा सिर्फ़ एक इबादत नहीं बल्कि ज़िंदगी गुज़ारने का एक मुकम्मल ज़ाब्ता है। रोज़ा इंसान को सब्र, बर्दाश्त, अख़लाक़, हमदर्दी और तक़वा की आला तालीम देता है। जो शख़्स रमज़ान के पैग़ाम को समझ ले वह अपनी दुनिया और आख़िरत दोनों को सँवार सकता है। अल्लाह तआला हमें रोज़े की हक़ीक़ी रूह समझने, सब्र की दौलत हासिल करने और रमज़ानुल मुबारक की बरकतों से फ़ैज़याब होने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।