दिए हुए अपने
क़र्ज़ को वापस निकलवाने के बेरहम और अमली तरीके।
दिया गया क़र्ज़ वापस लेना आज के दौर में "शेर के मुंह से निवाला छीनने" के मुतरादिफ़ है।
शरीफ़ाना तरीके से मांगेंगे तो आपको टाल दिया जाएगा।
अगर आप अपनी रक़म वापस चाहते हैं तो आपको लिहाज़, शर्म और मरुव्वत को भी तलाक़ देनी होगी और हर तरह के ताल्लुक़ात को भी दाओ पर लगाना होगा।
. शर्म का जनाज़ा निकाल दें
क़र्ज़ मांगते हुए शरमाएं मत। पैसे आपके हैं, उसके नहीं। अगर आप शरमाएंगे कि "अच्छा नहीं लगता", तो वो कभी वापस नहीं करेगा। दिन में तीन बार कॉल करें, मैसेज करें और तक़ाज़ा करें। इतना तंग करें कि वो आप से जान छुड़ाने के लिए पैसे फेंक कर मारे।
. मजमे में मांगें ।
उसे तब टारगेट करें जब वो अपने दोस्तों, कलीग्स या ससुराल वालों के साथ बैठा हो। भरी महफ़िल में ऊंची आवाज़ में कहें, "यार वो मेरे पैसे कब वापस कर रहे हो?" उसकी जाली इज़्ज़त ख़ाक में मिल जाएगी और वो अपनी "नाक" बचाने के लिए फ़ौरन इंतिज़ाम करेगा।
. घर के बड़ों को शामिल करें
अगर वो फ़ोन नहीं उठा रहा, तो सीधा उसके घर जाएं और उसके वालिद या बड़े भाई के सामने बैठ जाएं। "अंकल, आपके बेटे ने पैसे लिए थे, अब फ़ोन नहीं उठा रहा" "अब्बा जी" का डर आज भी सबसे बड़ा हथियार है।
. दफ़्तर में धरना।
उसके दफ़्तर या दुकान पर जा कर कस्टमर्स के सामने बैठ जाएं। वहां से हिलें मत। जब वो कहे "बाद में आना", तो कहें "मैं फ़ारिग़ हूं, पैसे ले कर ही जाऊंगा।" जब उसका बिज़नेस या नौकरी खतरे में पड़ेगी, तो वो अदायगी करेगा।
क़िस्तों पर राज़ी हो जाएं।
अगर वो कहे "पूरी रक़म नहीं है", तो ज़िद न करें। उसकी जेब में जो है (चाहे 500 रुपये हों) वो निकलवा लें। उसूल ये है: "कुछ न होने से कुछ होना बेहतर है।" जब आप क़िस्तें लेना शुरू करते हैं, तो नफ़सियाती तौर पर उस पर क़र्ज़ का बोझ बना रहता है।
. "" दोस्त का इस्तेमाल
अपने किसी ऐसे दोस्त को साथ ले कर जाएं जो शक्ल से बदमाश लगता हो या जिस का लहजा सख़्त हो। आप ख़ामोश रहें, दोस्त को बात करने दें। कभी कभी तीसरे बंदे का ख़ौफ़ वो काम कर जाता है जो आपकी दोस्ती नहीं कर सकती।
अय्याशी पर टोकें
अगर वो होटल में खाना खा रहा है या नए कपड़े पहन रहा है, तो फ़ौरन टोकें, “पिज़्ज़ा खाने के पैसे हैं, मेरा उधार वापस करने के नहीं?" उसे हर ख़ुशी के मौक़े पर ये एहसास दिलाएं कि वो आपके पैसों पर अय्याशी कर रहा है। उसका सुकून बर्बाद कर दें।
. तनख़्वाह वाले दिन छापा
आपको पता होना चाहिए कि उसकी तनख़्वाह या कमेटी किस तारीख़ को निकलती है। ठीक उसी दिन सुबह सवेरे उसके सर पर पहुंच जाएं। इससे पहले कि वो पैसे ख़र्च करे या किसी और को दे, आप अपना हिस्सा वसूल कर लें।
. मज़हबी कार्ड खेलें
उसे बताएं कि "हदीस में है कि मक़रूज़ की नमाज़ जनाज़ा नहीं होती और शहीद का भी क़र्ज़ माफ़ नहीं है। अगर मैं मर गया या तुम मर गए तो आख़िरत में क्या बनेगा?" हमारे मुआशरे में लोग क़ानून से नहीं डरते, लेकिन क़ब्र के अज़ाब से डर जाते हैं।
. सोशल मीडिया की धमकी
उसे व्हाट्सऐप पर मैसेज करें: "अगर कल तक पैसे न मिले, तो मैं तुम्हारी तस्वीर के साथ फेसबुक पर पोस्ट लगाने लगा हूं कि ये फ़्राडिया है।" अक्सर सिर्फ ये धमकी ही काफ़ी होती है क्योंकि आज कल डिजिटल बदनामी का डर बहुत ज़्यादा है।
नामुनासिब वक़्त पर कॉल्स
उसे रात के 2 बजे या सुबह 6 बजे कॉल्स करें। जब वो फ़ैमिली के साथ हो, तब कॉल करें। उसकी नींद और सुकून हराम कर दें। नफ़सियाती दबाव इतना बढ़ा दें कि वो पैसे दे कर आपको ब्लॉक करना अपनी कामयाबी समझे।
. पुलिस/थाने का ज़िक्र
चाहे आपके पास कोई तहरीरी सुबूत न भी हो, एतमाद से कहें: "मैं कल थाने दरख़्वास्त देने जा रहा हूं पुलिस और कचहरी के नाम से आम आदमी की टांगें कांप जाती हैं। उसे इस ख़ौफ़ में मुब्तिला करें कि मामला हाथ से निकल रहा है
लोगों में बेग़ैरती की इंतिहा है
हमारे ही पैसे हम ही फ़क़ीर कब दोगे कब दोगे
और वो तारीख़ देते रहते हैं कि फ़लां तारीख़ में आना
आइशा ❤