*रमजानुल मुबारक के अहकाम*
*रोज़े की हालत में गुस्ल और अस्बाब-ए-गुस्ल के बाज़ अहकाम*
(रोज़े में वुज़ू या गुस्ल के दौरान कुल्ली करते वक़्त *गरगरा* न करें कि इसकी वजह से हलक़ में पानी पहुँचने का डर और रोज़ा टूट जाने का गुमान ग़ालिब है)
(1) अगर मर्द और औरत पर सहरी का वक़्त ख़त्म होने से पहले गुस्ल वाजिब हो चुका था और वो उस वक़्त गुस्ल नहीं कर पाए तो बाद में किसी भी वक़्त गुस्ल करना जायज़ है, रोज़ा शुरू हो जाने के बाद गुस्ल करने से रोज़ा ख़राब नहीं होगा
(2) अगर किसी को सहरी का वक़्त ख़त्म होने से पहले गुस्ल की हाजत हो गई थी तो बेहतर ये है कि वो जितना जल्दी हो सके गुस्ल कर के वक़्त के अंदर नमाज़-ए-फ़ज्र पढ़ने की फ़िक्र करे ताकि फ़ज्र की नमाज़ क़ज़ा न हो
3)। अगर कोई औरत रमज़ान की रात सहरी के वक़्त से कुछ पहले अपनी आदत के मुताबिक़ हैज़ से पाक हो चुकी थी, और उसे पाकी का मुकम्मल यक़ीन भी हो गया था और इतना वक़्त भी मिला कि वो गुस्ल कर के इशा की नमाज़ भी पढ़ सके लेकिन वो गुस्ल किए बग़ैर ही सहरी करके रोज़ा रख लेती है तो उस का रोज़ा दुरुस्त हो जाएगा अलबत्ता अगर वक़्त में गुंजाइश हो तो गुस्ल कर के सहरी करना बेहतर है, नीज़ उस रात की इशा नमाज़ अदा करना भी उस पर लाज़िम होगा
4)। अगर किसी औरत पर सुबह सादिक़ के बाद गुस्ल वाजिब हुआ यानी वो हैज़ या निफ़ास से पाक हुई तो उस दिन का रोज़ा नहीं होगा बाद में उस दिन के रोज़े की क़ज़ा करना ज़रूरी होगा, अलबत्ता गुस्ल करने में ला परवाही न करे बल्कि जितना जल्दी हो सके गुस्ल कर के फ़ज्र की नमाज़ अदा करने की फ़िक्र करे।
(5) रोज़ा शुरू हो जाने के बाद दिन में किसी भी वक़्त नींद की हालत में गुस्ल की हाजत हो जाए तो गुस्ल करके रोज़ा को मुकम्मल करें, इसकी वजह से रोज़ा पर कुछ भी असर नहीं पड़ेगा
(6) रोज़े की हालत में जुमा का सुन्नत गुस्ल करना भी जायज़ है
(7) सख़्त गर्मी या इतनी सख़्त प्यास लग रही थी कि रोज़ा को बाक़ी रखना मुश्किल मालूम हो रहा था इसी वजह सी कुछ सुकून हासिल करने के लिए गुस्ल कर लिया तो गुंजाइश है इस से रोज़ा ख़राब नहीं होगा
8)। अगर औरत को रोज़े की हालत में हैज़ (पीरियड्स) शुरू हो जाए तो उस दिन का रोज़ा टूट जाएगा, रमज़ान के बाद किसी भी वक़्त उस दिन के साथ हैज़ के तमाम दिनों के रोज़ों की क़ज़ा करना ज़रूरी है
9))। अगर कोई रोज़े की हालत में अपने हाथों के ज़रिया (Sperm) ख़ारिज कर ले तो उस पर गुस्ल लाज़िम हो जाएगा, अपनी इस बुरी हरकत से तौबा करते हुए जितना जल्दी हो सके गुस्ल कर के वक़्त पर नमाज़ें पढ़ने की फ़िक्र करे अलबत्ता उस दिन का रोज़ा टूट जाएगा, बाद में उस दिन के रोज़े की क़ज़ा करना ज़रूरी है
10)) रोज़े की हालत में हमबिस्तरी करने से सिर्फ़ गुस्ल कर लेना काफ़ी नहीं होगा बल्कि रोज़ा टूट जाएगा और सारी ज़िंदगी में किसी भी वक़्त 61 रोज़े रखने होंगे एक रोज़ा क़ज़ा के तौर पर, और 60 रोज़े एक साथ कफ़्फ़ारे के तौर ।
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عَنْ أَبِي قَتَادَةَ ، قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ : " لَيْسَ فِي النَّوْمِ تَفْرِيطٌ إِنَّمَا التَّفْرِيطُ فِي الْيَقَظَةِ أَنْ تُؤَخِّرَ صَلَاةً حَتَّى يَدْخُلَ وَقْتُ أُخْرَى (ابو داؤد)
وعن أُمّ سَلَمَةَ رضي الله عنهما: أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ «يُدْرِكُهُ الفَجْرُ وَهُوَ جُنُبٌ مِنْ أَهْلِهِ، ثُمَّ يَغْتَسِلُ، وَيَصُومُ (مسلم)
عن عائشة رضي الله عنها أنها قالت: إن رجلاً قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم وهو واقف على الباب، وأنا أسمع، يا رسول الله: إني أصبح جنباً، وأنا أريد الصيام؟ فقال صلى الله عليه وسلم : وأنا أصبح جنباً، وأنا أريد الصيام، فأغتسل وأصوم فقال له الرجل: يا رسول الله: إنك لست مثلنا! قد غفر الله لك ما تقدم من ذنبك وما تأخر، فغضب رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال: والله إني لأرجو أن أكون أخشاكم لله، وأعلمكم بما أتقي (موطأ مالك)
عن لَقِيط بن صَبِرةَ رَضِيَ اللهُ عنه قال: قلتُ: يا رسولَ الله، أخبِرني عن الوُضوءِ، قال: أسبِغِ الوُضوءَ، وخلِّلْ بينَ الأصابِعِ، وبالِغْ في الاستنشاقِ إلَّا أنْ تكونَ صائمًا (ابو داؤد، ترمذي)
عن بعض أصحابِ رَسولِ الله صلَّى اللهُ عليه وسلَّم أنَّه قال: لقد رأيتُ رَسولَ الله صلَّى اللهُ عليه وسلَّم بِالْعَرْجِ يصُبُّ الماءَ على رأسِه وهو صائِمٌ، مِن العَطَشِ، أو مِنَ الحَرِّ. (ابو داؤد)
عن أبي سَعيدٍ الخدريِّ رَضِيَ اللهُ عنه، قال: أَشهدُ على رسولِ اللهِ صلَّى اللهُ عليه وسلَّم أنَّه قال: الغُسلُ يومَ الجُمُعةِ واجبٌ على كلِّ محتلمٍ، وأنْ يَستنَّ، وأن يمسَّ طِيبًا إنْ وَجَد (بخاري)
عن أبي سَعيدٍ الخدريِّ رَضِيَ اللهُ عنه، قال: أَشهدُ على رسولِ اللهِ صلَّى اللهُ عليه وسلَّم أنَّه قال: الغُسلُ يومَ الجُمُعةِ واجبٌ على كلِّ محتلمٍ، وأنْ يَستنَّ، وأن يمسَّ طِيبًا إنْ وَجَد (بخاري)
فی الھندیۃ: والترتيب في المضمضة والاستنشاق سنة عندنا. كذا في الخلاصة. والمبالغة فيهما سنة أيضا. كذا في الكافي وشرح الطحاوي إلا أن يكون صائما. كذا في التتارخانية، وهي في المضمضة بالغرغرة. كذا في الكافي،وفي الاستنشاق أن يضع الماء على منخريه ويجذبه حتى يصعد إلى ما اشتد من أنفه. كذا في المحيط.ٍ(الفتاوى الهندية :1/ 202)
وإن تمضمض أو استنشق فدخل الماء جوفه إن كان ذاكرا لصومه فسد صومه ،وعليه القضاء، وإن لم يكن ذاكرا لا يفسد صومه ،كذا في الخلاصة، وعليه الاعتماد.(الفتاوى الهندية :1/ 8)
"و" يسن "المبالغة في المضمضة" وهي إيصال الماء لرأس الحلق "و" المبالغة في "الاستنشاق" وهي إيصاله إلى ما فوق المارن "لغير الصائم" والصائم لا يبالغ فيها خشية إفساد الصوم لقوله عليه الصلاة والسلام: "بالغ في المضمضة والاستنشاق إلا أن تكون صائما "
*قوله:* ( والمبالغة ) فيهما هي سنة في الطهارتين على المعتمد ،وقيل: سنة في الوضوء ،واجبة في الغسل إلا أن يكون صائما .نقله القهستاني عن المنية…..
*قوله:* (وهي إيصال الماء لرأس الحلق الخ ) هو ما في الخلاصة. وقال الإمام خواهر زاده: هو في المضمضة الغرغرة، وهي تردد الماء في الحلق ،وفي الاستنشاق أن يجذب الماء بنفسه إلى ما اشتد من أنفه اه.قال في البحر:وهو الأولى. والاستنثار مطلوب والإجماع على عدم وجوبه ،والمستحب أن يستثر بيده اليسرى ،ويكره بغير يد؛ لأنه يشبه فعل الدابة. وقيل :لا يكره. ذكره البدر العيني. والأولى أن يدخل اصبعه في فمه وأنفه. قهستاني.
*قوله:*( والصائم لا يبالغ ) أي: ولو صام نفل. قوله: ( خشية إفساد الصوم ) ,فهو مكروه ،كذوق شيء ومضغه.(حاشية الطحطاوي على مراقي الفلاح)
ومنها المبالغة في المضمضة والاستنشاق إلا في حال الصوم فيرفق لما روي أن النبي قال للقيط بن صبرة بالغ في المضمضة والاستنشاق إلا أن تكون صائما فأرفق ولأن المبالغة فيهما من باب التكميل في التطهير فكانت مسنونة إلا في حال الصوم لما فيها من تعريض الصوم للفساد. (بدائع الصنائع: (21/1، ط: دار الکتاب العربی)
*الفرع الثاني: تأخيرُ الحائِضِ الاغتسالَ إلى طلوعِ الفَجرِ* يُباحُ للحائِضِ إذا طهُرَتْ أن تؤخِّرَ الاغتسالَ مِنَ الحيضِ إلى طلوعِ الفَجرِ، وذلك باتِّفاقِ المَذاهِبِ الفِقهيَّةِ الأربَعةِ:الحنفيَّة،والمالكيَّة،والشَّافعيَّة،والحَنابِلة؛ وذلك قياسًا على الجُنُبِ إذا أخَّرَ اغتسالَه إلى طُلوعِ الفَجرِ
*المطلب الثاني: المضمضةُ والاستنشاقُ* يُباحُ للصَّائِمِ المضمضةُ والاستنشاقُ مِن غَيرِ مُبالغةٍ.
*الأدِلَّة:* أوَّلًا: من الإجماع : نقل الإجماعَ على ذلك: ابنُ تيميَّة، ثانيًا: وذلك لأنَّ الفَمَ في حُكمِ الظَّاهر، لا يَبطُلُ الصَّومُ بالواصِلِ إليه، كالأنفِ والعَينِ
*المطلب الثالث: اغتسالُ الصَّائِم وتبَرُّدُه بالماءِ* : لا بأسَ أن يغتَسِلَ الصَّائِمُ، أو يصُبَّ الماءَ على رأسِه مِن الحَرِّ أو العَطشِ، وهذا باتِّفاقِ المَذاهِبِ الفِقهيَّةِ الأربَعةِ: الحَنَفيَّة، والمالكيَّة، والشَّافِعيَّة، والحَنابِلة (الموسوعة الفقهية)
"ولو طهرت ليلاً صامت الغد إن كانت أيام حيضها عشرةً، وإن كانت دونها فإن أدركت من الليل مقدار الغسل وزيادة ساعة لطيفة تصوم وإن طلع الفجر مع فراغها من الغسل لاتصوم؛ لأنّ مدة الاغتسال من جملة الحيض فيمن كانت أيامها دون العشرة، كذا في محيط السرخسي (الفتاوى الهندية (1/ 207)
يُسنُّ الغُسلُ يومَ الجُمُعةِ، وهذا باتِّفاقِ المذاهبِ الفقهيَّة الأربعة: الحَنَفيَّة، والمالِكيَّة، والشافعيَّة، والحَنابِلَة، وبه قال جماهيرُ العلماء، وحُكي الإجماعُ على ذلك (الموسوعة الفقهية)
قال ابنُ عبد البر: قد أجمع المسلمون قديمًا وحديثًا على أنَّ غُسل الجمعة ليس بفرضٍ واجب، وفي ذلك ما يَكفي ويُغني عن الإكثار... إلَّا أنَّ العلماء مع إجماعهم على أنَّ غُسل الجمعة ليس بفرض واجب، اختلفوا فيه؛ هل هو سُنَّة مسنونة للأمَّة؟ أم هو استحبابٌ وفضل؟ أو كان لعلَّة فارتفعتْ...؟ (التمهيد لما في الموطأ).
وقال ابنُ رشد: ( ذهب الجمهورُ إلى أنه سُنَّة، وذهَب أهلُ الظاهر إلى أنَّه فرضٌ، ولا خلافَ- فيما أعلم- أنَّه ليس شرطًا في صحَّة الصلاة (بداية المجتهد) (1/164).
(أَوْ وَطِئَ امْرَأَةً مَيِّتَةً) أَوْ صَغِيرَةً لَا تُشْتَهَى نَهْرٌ (أَوْ بَهِيمَةً أَوْ فَخِذًا أَوْ بَطْنًا أَوْ قَبَّلَ) وَلَوْ قُبْلَةً فَاحِشَةً بِأَنْ يُدَغْدِغُ أَوْ يَمُصُّ شَفَتَيْهَا (أَوْ لَمَسَ) وَلَوْ بِحَائِلٍ لَا يَمْنَعُ الْحَرَارَةَ أَوْ اسْتَنْمَا بِكَفِّهِ أَوْ بِمُبَاشَرَةٍ فَاحِشَةٍ وَلَوْ بَيْنَ الْمَرْأَتَيْنِ (فَأَنْزَلَ) قَيْدٌ لِلْكُلِّ حَتَّى لَوْ لَمْ يُنْزِلْ لَمْ يُفْطِرْ كَمَا مَرَّ.........(قَضَى) فِي الصُّوَرِ كُلِّهَا (فَقَطْ) (رد المحتار)
(وإن جامع) المكلف آدميا مشتهى (في رمضان أداء) لما مر (أو جامع) أو توارت الحشفة (في أحد السبيلين) أنزل أو لا......(قضى) في الصور كلها (وكفر). (الدر المختار مع الرد)
واللہ اعلم بالصواب
خادم : مفتی محمد مبین قاسمی عفی عنہ
*रमज़ानुल मुबारक के अहकाम*
*रोज़े की हालत में गुस्ल और अस्बाब-ए-गुस्ल के बाज़ अहकाम*
(रोज़े में वुज़ू या गुस्ल के दौरान कुल्ली करते वक़्त *गरगरा* न करें कि इसकी वजह से हलक़ में पानी पहुँचने का डर और रोज़़ा टूट जाने का गुमान ग़ालिब है)
(1) अगर मर्द और औरत पर सहरी का वक़्त ख़त्म होने से पहले गुस्ल वाजिब हो चुका था और वो उस वक़्त गुस्ल नहीं कर पाए तो बाद में किसी भी वक़्त गुस्ल करना जायज़ है, रोज़़ा शुरू हो जाने के बाद गुस्ल करने से रोज़़ा ख़राब नहीं होगा
(2) अगर किसी को सहरी का वक़्त ख़त्म होने से पहले गुस्ल की हाजत हो गई थी तो बेहतर ये है कि वो जितना जल्दी हो सके गुस्ल कर के वक़्त के अंदर नमाज़-ए-फ़ज्र पढ़ने की फ़िक्र करे ताकि फ़ज्र की नमाज़ क़ज़ा न हो
3)। अगर कोई औरत रमज़ान की रात सहरी के वक़्त से कुछ पहले अपनी आदत के मुताबिक हैज़ से पाक हो चुकी थी, और उसे पाकी का मुकम्मल यक़ीन भी हो गया था और इतना वक़्त भी मिला कि वो गुस्ल कर के इशा की नमाज़ भी पढ़ सके लेकिन वो गुस्ल किए बग़ैर ही सहरी करके रोज़़ा रख लेती है तो उस का रोज़़ा दुरुस्त हो जाएगा अलबत्ता अगर वक़्त में गुंजाइश हो तो गुस्ल कर के सहरी करना बेहतर है, नीज़ उस रात की इशा नमाज़ अदा करना भी उस पर लाज़िम होगा
4)। अगर किसी औरत पर सुबह सादिक़ के बाद गुस्ल वाजिब हुआ यानी वो हैज़ या निफ़ास से पाक हुई तो उस दिन का रोज़़ा नहीं होगा बाद में उस दिन के रोज़े की क़ज़ा करना ज़रूरी होगा, अलबत्ता गुस्ल करने में ला परवाही न करे बल्कि जितना जल्दी हो सके गुस्ल कर के फ़ज्र की नमाज़ अदा करने की फ़िक्र करे।
(5) रोज़़ा शुरू हो जाने के बाद दिन में किसी भी वक़्त नींद की हालत में गुस्ल की हाजत हो जाए तो गुस्ल करके रोज़े को मुकम्मल करें, इसकी वजह से रोज़े पर कुछ भी असर नहीं पड़ेगा
(6) रोज़े की हालत में जुमा का सुन्नत गुस्ल करना भी जायज़ है
(7) सख़्त गर्मी या इतनी सख़्त प्यास लग रही थी कि रोज़े को बाक़ी रखना मुश्किल मालूम हो रहा था इसी वजह सी कुछ सुकून हासिल करने के लिए गुस्ल कर लिया तो गुंजाइश है इस से रोज़़ा ख़राब नहीं होगा
8)। अगर औरत को रोज़े की हालत में हैज़ (पीरियड्स) शुरू हो जाए तो उस दिन का रोज़़ा टूट जाएगा, रमज़ान के बाद किसी भी वक़्त उस दिन के साथ हैज़ के तमाम दिनों के रोज़ों की क़ज़ा करना ज़रूरी है
9))। अगर कोई रोज़े की हालत में अपने हाथों के ज़रिया (Sperm) ख़ारिज कर ले तो उस पर गुस्ल लाज़िम हो जाएगा, अपनी इस बुरी हरकत से तौबा करते हुए जितना जल्दी हो सके गुस्ल कर के वक़्त पर नमाज़ें पढ़ने की फ़िक्र करे अलबत्ता उस दिन का रोज़़ा टूट जाएगा, बाद में उस दिन के रोज़े की क़ज़ा करना ज़रूरी है
10)) रोज़े की हालत में हमबिस्तरी करने से सिर्फ़ गुस्ल कर लेना काफ़ी नहीं होगा बल्कि रोज़़ा टूट जाएगा और सारी ज़िंदगी में किसी भी वक़्त 61 रोज़े रखने होंगे एक रोज़़ा क़ज़ा के तौर पर, और 60 रोज़े एक साथ कफ़्फ़ारे के तौर ।
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عَنْ أَبِي قَتَادَةَ ، قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ : " لَيْسَ فِي النَّوْمِ تَفْرِيطٌ إِنَّمَا التَّفْرِيطُ فِي الْيَقَظَةِ أَنْ تُؤَخِّرَ صَلَاةً حَتَّى يَدْخُلَ وَقْتُ أُخْرَى (ابو داؤد)
وعن أُمّ سَلَمَةَ رضي الله عنهما: أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ «يُدْرِكُهُ الفَجْرُ وَهُوَ جُنُبٌ مِنْ أَهْلِهِ، ثُمَّ يَغْتَسِلُ، وَيَصُومُ (مسلم)
عن عائشة رضي الله عنها أنها قالت: إن رجلاً قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم وهو واقف على الباب، وأنا أسمع، يا رسول الله: إني أصبح جنباً، وأنا أريد الصيام؟ فقال صلى الله عليه وسلم : وأنا أصبح جنباً، وأنا أريد الصيام، فأغتسل وأصوم فقال له الرجل: يا رسول الله: إنك لست مثلنا! قد غفر الله لك ما تقدم من ذنبك وما تأخر، فغضب رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال: والله إني لأرجو أن أكون أخشاكم لله، وأعلمكم بما أتقي (موطأ مالك)
عن لَقِيط بن صَبِرةَ رَضِيَ اللهُ عنه قال: قلتُ: يا رسولَ الله، أخبِرني عن الوُضوءِ، قال: أسبِغِ الوُضوءَ، وخلِّلْ بينَ الأصابِعِ، وبالِغْ في الاستنشاقِ إلَّا أنْ تكونَ صائمًا (ابو داؤد، ترمذي)
عن بعض أصحابِ رَسولِ الله صلَّى اللهُ عليه وسلَّم أنَّه قال: لقد رأيتُ رَسولَ الله صلَّى اللهُ عليه وسلَّم بِالْعَرْجِ يصُبُّ الماءَ على رأسِه وهو صائِمٌ، مِن العَطَشِ، أو مِنَ الحَرِّ. (ابو داؤد)
عن أبي سَعيدٍ الخدريِّ رَضِيَ اللهُ عنه، قال: أَشهدُ على رسولِ اللهِ صلَّى اللهُ عليه وسلَّم أنَّه قال: الغُسلُ يومَ الجُمُعةِ واجبٌ على كلِّ محتلمٍ، وأنْ يَستنَّ، وأن يمسَّ طِيبًا إنْ وَجَد (بخاري)
عن أبي سَعيدٍ الخدريِّ رَضِيَ اللهُ عنه، قال: أَشهدُ على رسولِ اللهِ صلَّى اللهُ عليه وسلَّم أنَّه قال: الغُسلُ يومَ الجُمُعةِ واجبٌ على كلِّ محتلمٍ، وأنْ يَستنَّ، وأن يمسَّ طِيبًا إنْ وَجَد (بخاري)
فی الھندیۃ: والترتيب في المضمضة والاستنشاق سنة عندنا. كذا في الخلاصة. والمبالغة فيهما سنة أيضا. كذا في الكافي وشرح الطحاوي إلا أن يكون صائما. كذا في التتارخانية، وهي في المضمضة بالغرغرة. كذا في الكافي،وفي الاستنشاق أن يضع الماء على منخريه ويجذبه حتى يصعد إلى ما اشتد من أنفه. كذا في المحيط.ٍ(الفتاوى الهندية :1/ 202)
وإن تمضمض أو استنشق فدخل الماء جوفه إن كان ذاكرا لصومه فسد صومه ،وعليه القضاء، وإن لم يكن ذاكرا لا يفسد صومه ،كذا في الخلاصة، وعليه الاعتماد.(الفتاوى الهندية :1/ 8)
"و" يسن "المبالغة في المضمضة" وهي إيصال الماء لرأس الحلق "و" المبالغة في "الاستنشاق" وهي إيصاله إلى ما فوق المارن "لغير الصائم" والصائم لا يبالغ فيها خشية إفساد الصوم لقوله عليه الصلاة والسلام: "بالغ في المضمضة والاستنشاق إلا أن تكون صائما "
*قوله:* ( والمبالغة ) فيهما هي سنة في الطهارتين على المعتمد ،وقيل: سنة في الوضوء ،واجبة في الغسل إلا أن يكون صائما .نقله القهستاني عن المنية…..
*قوله:* (وهي إيصال الماء لرأس الحلق الخ ) هو ما في الخلاصة. وقال الإمام خواهر زاده: هو في المضمضة الغرغرة، وهي تردد الماء في الحلق ،وفي الاستنشاق أن يجذب الماء بنفسه إلى ما اشتد من أنفه اه.قال في البحر:وهو الأولى. والاستنثار مطلوب والإجماع على عدم وجوبه ،والمستحب أن يستثر بيده اليسرى ،ويكره بغير يد؛ لأنه يشبه فعل الدابة. وقيل :لا يكره. ذكره البدر العيني. والأولى أن يدخل اصبعه في فمه وأنفه. قهستاني.
*قوله:*( والصائم لا يبالغ ) أي: ولو صام نفل. قوله: ( خشية إفساد الصوم ) ,فهو مكروه ،كذوق شيء ومضغه.(حاشية الطحطاوي على مراقي الفلاح)
ومنها المبالغة في المضمضة والاستنشاق إلا في حال الصوم فيرفق لما روي أن النبي قال للقيط بن صبرة بالغ في المضمضة والاستنشاق إلا أن تكون صائما فأرفق ولأن المبالغة فيهما من باب التكميل في التطهير فكانت مسنونة إلا في حال الصوم لما فيها من تعريض الصوم للفساد. (بدائع الصنائع: (21/1، ط: دار الکتاب العربی)
*الفرع الثاني: تأخيرُ الحائِضِ الاغتسالَ إلى طلوعِ الفَجرِ* يُباحُ للحائِضِ إذا طهُرَتْ أن تؤخِّرَ الاغتسالَ مِنَ الحيضِ إلى طلوعِ الفَجرِ، وذلك باتِّفاقِ المَذاهِبِ الفِقهيَّةِ الأربَعةِ:الحنفيَّة،والمالكيَّة،والشَّافعيَّة،والحَنابِلة؛ وذلك قياسًا على الجُنُبِ إذا أخَّرَ اغتسالَه إلى طُلوعِ الفَجرِ
*المطلب الثاني: المضمضةُ والاستنشاقُ* يُباحُ للصَّائِمِ المضمضةُ والاستنشاقُ مِن غَيرِ مُبالغةٍ.
*الأدِلَّة:* أوَّلًا: من الإجماع : نقل الإجماعَ على ذلك: ابنُ تيميَّة، ثانيًا: وذلك لأنَّ الفَمَ في حُكمِ الظَّاهر، لا يَبطُلُ الصَّومُ بالواصِلِ إليه، كالأنفِ والعَينِ
*المطلب الثالث: اغتسالُ الصَّائِم وتبَرُّدُه بالماءِ* : لا بأسَ أن يغتَسِلَ الصَّائِمُ، أو يصُبَّ الماءَ على رأسِه مِن الحَرِّ أو العَطشِ، وهذا باتِّفاقِ المَذاهِبِ الفِقهيَّةِ الأربَعةِ: الحَنَفيَّة، والمالكيَّة، والشَّافِعيَّة، والحَنابِلة (الموسوعة الفقهية)
"ولو طهرت ليلاً صامت الغد إن كانت أيام حيضها عشرةً، وإن كانت دونها فإن أدركت من الليل مقدار الغسل وزيادة ساعة لطيفة تصوم وإن طلع الفجر مع فراغها من الغسل لاتصوم؛ لأنّ مدة الاغتسال من جملة الحيض فيمن كانت أيامها دون العشرة، كذا في محيط السرخسي (الفتاوى الهندية (1/ 207)
يُسنُّ الغُسلُ يومَ الجُمُعةِ، وهذا باتِّفاقِ المذاهبِ الفقهيَّة الأربعة: الحَنَفيَّة، والمالِكيَّة، والشافعيَّة، والحَنابِلَة، وبه قال جماهيرُ العلماء، وحُكي الإجماعُ على ذلك (الموسوعة الفقهية)
قال ابنُ عبد البر: قد أجمع المسلمون قديمًا وحديثًا على أنَّ غُسل الجمعة ليس بفرضٍ واجب، وفي ذلك ما يَكفي ويُغني عن الإكثار... إلَّا أنَّ العلماء مع إجماعهم على أنَّ غُسل الجمعة ليس بفرض واجب، اختلفوا فيه؛ هل هو سُنَّة مسنونة للأمَّة؟ أم هو استحبابٌ وفضل؟ أو كان لعلَّة فارتفعتْ...؟ (التمهيد لما في الموطأ).
وقال ابنُ رشد: ( ذهب الجمهورُ إلى أنه سُنَّة، وذهَب أهلُ الظاهر إلى أنَّه فرضٌ، ولا خلافَ- فيما أعلم- أنَّه ليس شرطًا في صحَّة الصلاة (بداية المجتهد) (1/164).
(أَوْ وَطِئَ امْرَأَةً مَيِّتَةً) أَوْ صَغِيرَةً لَا تُشْتَهَى نَهْرٌ (أَوْ بَهِيمَةً أَوْ فَخِذًا أَوْ بَطْنًا أَوْ قَبَّلَ) وَلَوْ قُبْلَةً فَاحِشَةً بِأَنْ يُدَغْدِغُ أَوْ يَمُصُّ شَفَتَيْهَا (أَوْ لَمَسَ) وَلَوْ بِحَائِلٍ لَا يَمْنَعُ الْحَرَارَةَ أَوْ اسْتَنْمَا بِكَفِّهِ أَوْ بِمُبَاشَرَةٍ فَاحِشَةٍ وَلَوْ بَيْنَ الْمَرْأَتَيْنِ (فَأَنْزَلَ) قَيْدٌ لِلْكُلِّ حَتَّى لَوْ لَمْ يُنْزِلْ لَمْ يُفْطِرْ كَمَا مَرَّ.........(قَضَى) فِي الصُّوَرِ كُلِّهَا (فَقَطْ) (رد المحتار)
(وإن جامع) المكلف آدميا مشتهى (في رمضان أداء) لما مر (أو جامع) أو توارت الحشفة (في أحد السبيلين) أنزل أو لا......(قضى) في الصور كلها (وكفر). (الدر المختار مع الرد)
واللہ اعلم بالصواب
खادم : मुफ़्ती मुहम्मद मुबीन क़ासमी अफ़ी अन्हु