दिल की फ़ेहरिस्त पे तवज्जोह..
ज़िन्दगी को दुश्मन मत बनाओ
ज़िन्दगी मुश्किल नहीं थी। हमने इसे मुश्किल बनाया है।
हमने मामूली बातों को अना का मसला बना दिया, छोटी ग़लतियों को किरदार का फ़ैसला, और वक़्ती ना-इंसाफ़ी को जाती जंग।
किसी ने बात काट दी — हमने दिल में दुश्मन पाल ली।
किसी ने आगे बढ़ कर कामयाबी ले ली — हमने उसे ग़ुरूर का नाम दे दिया।
किसी ने हमारी तवक़्क़ो पूरी न की — हमने उसे अपनी ज़िन्दगी से ख़ारिज कर दिया।
तुम ख़ुद सोचो, क्या वाक़ई हर बात का जवाब देना ज़रूरी है?
क्या हर चोट का बदला लेना फ़र्ज़ है?
या ये सिर्फ़ तुम्हारी अना है जो तुम्हें लड़वा रही है?
हम इबादत भी करते हैं, मगर दिल में फ़ेहरिस्त बनी होती है:
उसने ये किया था, मौक़ा मिला तो छोड़ूँगी नहीं।”
ये इबादत नहीं, ये ख़ुद को धोखा देना है।
अगर वाक़ई “ईंट का जवाब पत्थर” ही क़ानून होता, तो फिर यौम-ए-हिसाब की ज़रूरत ही क्या थी?
हर फ़ैसला यहीं हो जाता, हर क़िस्सा यहीं ख़त्म हो जाता।
मगर अल्लाह ने एक दिन रखा है — ताकि तुम हर मामला अपने हाथ में लेने के बजाए कुछ चीज़ें उस के हवाले करो।
सब्र बदले का इंतज़ार नहीं है।
सब्र ये नहीं कि तुम ख़ामोश रहो मगर अंदर बदला पकाओ।
सब्र ये है कि तुम छोड़ दो। वाक़ई छोड़ दो।
दिल से बोझ उतार दो।
कहो: “
या अल्लाह, मैंने मामला तेरे हवाले किया।”
तुम अपनी ज़िन्दगी का आधा सुकून सिर्फ़ इस लिए खो देते हो क्योंकि तुम हर बात को जाती बना लेते हो।
हर छोटा मसला अगर तुम बढ़ाओगे तो वो तुम्हें ही खा जाएगा।
ज़िन्दगी ख़ूबसूरत है, मगर शर्त एक है:
हर जंग लड़ना ज़रूरी नहीं।
हर बात साबित करना ज़रूरी नहीं।
हर इंसान को जवाब देना ज़रूरी नहीं।
कुछ चीज़ें अल्लाह पर छोड़ दो।
कुछ बातें भूल जाओ।
अपने दिमाग़ से ये मुसलसल शोर निकाल दो।
वरना तुम दुनिया से नहीं हारोगे —
तुम अपनी ही नफ़रतों से हार जाओगे।
आयशा ❤