रमज़ान हमदर्दी और मदद का महीना है।
- ज़कात और सदक़ा देना
- गरीबों का ख़याल रखना
- इफ़्तार करवाना
हज़रत मुहम्मद ﷺ सबसे ज़्यादा सख़ी थे और रमज़ान में और ज़्यादा सख़ावत फ़रमाते थे।
रमज़ानुल मुबारक सिर्फ़ रोज़ा रखने का नाम नहीं, बल्कि यह महीना हमदर्दी, सख़ावत और ईसार का महीना है। यह वह वक़्त है जब इंसान खुद भूख और प्यास बर्दाश्त कर के गरीबों और मोहताजों के दर्द को महसूस करता है।
🌙 रमज़ान और सख़ावत
हज़रत मुहम्मद ﷺ सबसे ज़्यादा सख़ी थे, लेकिन रमज़ान में आप ﷺ की सख़ावत और भी बढ़ जाती थी। आप ﷺ ज़रूरत मंदों की मदद फ़रमाते, मिस्कीनों को खाना खिलाते और खैरात में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे।
यह हमें सिखाता है कि:
सिर्फ़ इबादत ही काफ़ी नहीं
बल्कि अल्लाह की मख़लूक़ की ख़िदमत भी ज़रूरी है
💰 ज़कात और सदक़ा की अहमियत
रमज़ान में लोग अपनी ज़कात अदा करते हैं क्योंकि:
इस महीने में नेकियों का अज्र कई गुना बढ़ जाता है
एक नफ़्ल का सवाब फ़र्ज़ के बराबर और फ़र्ज़ का सवाब सत्तर गुना तक बढ़ा दिया जाता है
सदक़ा देने से:
माल कम नहीं होता बल्कि बढ़ता है
गुनाह माफ़ होते हैं
मुसीबतें दूर होती हैं
🤲 इफ़्तार करवाने की फ़ज़ीलत
जो शख़्स किसी रोज़ा दार को इफ़्तार करवाता है, उसे भी रोज़ा दार के बराबर सवाब मिलता है, बग़ैर इस के सवाब में कमी के।
आज हमें चाहिए कि:
किसी गरीब के घर राशन पहुंचाएं
किसी यतीम की कफ़ालत करें
किसी ज़रूरत मंद की मदद करें
!!!और याद रखें
रमज़ान हमें सिखाता है कि
हम अपने आस पास के लोगों का ख़याल रखें
अपने दिल को नर्म बनाएं
नफ़रतों को ख़त्म करें
अगर हम ने रमज़ान में सिर्फ़ खुद को संवारा और दूसरों का ख़याल न रखा, तो हम ने रमज़ान का असल मक़सद हासिल नहीं किया।
अल्लाह तआला हमें रमज़ान की बरकतों से फ़ायदा उठाने, दिल खोल कर सदक़ा देने और अपनी ज़िंदगी को नेकियों से भरने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन
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अज़ क़लम मौलाना सोहैब अहमद 🌟