*सवाल करने के नियम और शिष्टाचार* 

1) *नीयत की दुरुस्ती* 
सबसे पहला अदब यह है कि सवाल हक की तलाश और इस्लाह की नीयत से हो, न कि:
बहस जीतने के लिए,
सामने वाले का इम्तिहान लेने के लिए,
या एतराज़ या नुक्स निकालने के लिए न हो।
 कुरान में है:
> فَاسْأَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ إِن كُنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
(अहले इल्म से सवाल करो अगर तुम नहीं जानते)

*2) सवाल वाज़ेह और मुख्तसर हो*
गैर ज़रूरी तफ़सीलात से परहेज़ करना, 
असल मसला वाज़ेह बयान करना, अगर फिक़्ही सवाल हो तो मुताल्लिक़ा हालतें ज़रूर बताएं।
यही तर्ज़ फुक़हा की कुतुब में भी है, जैसे:
अल-हिदाया
बदाइउस्सनाए
जहां मसला की सूरत पहले वाज़ेह की जाती है, फिर हुक्म ज़िक्र होता है।

*3) अदबे खिताब*
अहले इल्म से सवाल करते वक़्त:
नरम लहजा इख्तियार किया जाए,
अलक़ाबात-ए-एहतराम इस्तेमाल हों,
लहजा इस्तेफसारी हो, तनक़ीदी नहीं।
 सहाबा किरामؓ का अंदाज़ यही था कि अर्ज़ करते:
"या रसूल अल्लाह ﷺ! अगर ऐसा हो तो क्या हुक्म है?"

*4) एतराज़ और इस्तेफसार में फर्क*
इल्मी दुनिया में:
इस्तेफसार (समझने के लिए पूछना) मतलूब है।
तअन्नुत (ज़िद और उलझाने के लिए सवाल) मज़मूम है।
 हदीस में आया:
> إنما أهلك من كان قبلكم كثرة مسائلهم واختلافهم على أنبيائهم
(ज़्यादा उलझाने वाले सवालात ने पिछली उम्मतों को हलाक किया)

*5) सवाल वक़्त और मौका देख कर हो*
درس के बीच में गैर मुताल्लिक़ सवाल न किया जाए।
ज़ाती मसला हो तो अलैहदा पूछा जाए।
मजमा में ऐसी बात न पूछी जाए जिस से किसी की पर्दा दरी हो।

*6) जवाब सुनने का ज़र्फ*
अगर जवाब अपनी राय के खिलाफ हो तो भी कुबूलियत का मिज़ाज हो।
दलाइल सुनने की आमादगी हो।
आलिम की नीयत पर बदगुमानी न की जाए।
यही इल्मी अख़लाक़ है।

*7) फतवा और मुनाज़रा में फर्क*
फतवा अमल के लिए होता है।
मुनाज़रा ग़लबा के लिए होता है।
मोमिन का मक़सद अमल होना चाहिए, ग़लबा नहीं।

*8) जवाब के लिए मुनासिब वक़्त देना*
इल्मी सवाल करने का एक अहम अदब यह भी है कि:
सवाल पूछ कर सब्र से इंतज़ार किया जाए
फौरन जवाब न मिलने पर बार बार तक़ाज़ा न किया जाए।
ग्रुप्स में जल्द बाज़ी और दबाओ न डाला जाए।
जवाब देने वाला दलाइल देखने का मोहताज होता है।
हवाला तलाश करने की ज़रूरत होती है।
कभी मुख्तलिफ अक़वाल का मुवाज़ना करना पड़ता है‌।
यह काम चंद मिनट का नहीं होता।
 फुक़हा का तर्ज़ यही था कि वह जवाब देने में जल्दी नहीं करते थे।
इमाम मालिक रहमतुल्लाह अलैह से चालीस सवाल पूछे गए, अक्सर में फरमाया: "لا أدري" (मैं नहीं जानता) यानी तहक़ीक़ के बगैर जवाब नहीं देते थे।
 *जल्द बाज़ी के नुक़सानात* 
गलत या अधूरा जवाब।
बगैर तहक़ीक़ फतवा।
आलिम पर गैर ज़रूरी दबाओ।
इल्मी माहौल का मुतास्सिर होना।

अगर कभी फौरी मसला हो तो वाज़ेह लिख दें:
"यह मसला फौरी दरकार है"
लेकिन फिर भी अदब व सब्र बरकरार रहे।

 *खुलासा* 
इल्मी सवाल के चार बड़े आदाब:
इखलास।
अदब।
वज़ाहत।
सब्र (जवाब के लिए वक़्त देना)।
जो शख्स सब्र करता है, वही सही इल्म तक पहुंचता है।

वल्लाहू आलम बिस्सव़ाब