चांदपुर, सहारनपुर और देवबंद की यात्रा का वृत्तांत
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रिशहात कलम✍🏻
गुल रज़ा राही अररियावी
✍🏻हमारी ज़िंदगी अहबाब जामिया के हमराह हंसी ख़ुशी कट रही थी, सैर व तफरीह, गपशप ख़ारजी किताबों का मुताला, उस्ताद मोहतरम से दरसी इस्तिफ़ादा सब बेहतरीन चल रहा था, ऐसा लगता था कि यही असल ज़िंदगी है और शायद यही रहेगी, इसी भरम में था कि नाज़िम इम्तिहान शशमाही इम्तिहान का एलान निकालकर मेरे सफ़ीहाना ख़याल पर पानी फेर दिया (, वही इम्तिहान जिससे हम जैसे आशुफ़्ता सर भागते हैं, घबराते हैं और चाहते हैं कि इम्तिहान टल जाए और न हो तो बेहतर है ताकि किताबों की सरदर्दी से बच सकें (पर ये हमारी नादानी और हमारा सफ़ीहाना ख़याल है जो कि बेमानी है) पर वो कहते हैं ना जो होता है भले के लिए होता है, हर चीज़ में ख़ुदा की हिकमत व मसलहत पिन्हा होती है, और इस में बंदे के लिए ख़ैर ही ख़ैर होता है, भले से बाज़ दफ़ा बज़ाहिर ये चीज़ तकलीफ़देह और बार गिरां मालूम हो मगर इस में हमारा ही फ़ायदा होता है
इसी क़बील से इम्तिहान भी है
इम्तिहान के फ़वाइद:
ख़्वाह वो कोई भी इम्तिहान हो हमें नई सिम्त देता है और ज़िंदगी में तरक़्क़ी की तरफ़ क़दम बढ़ाने में मुअस्सिर किरदार निभाता है, सलाहियत में निखार पैदा करता है, इस्तिदाद को जिला बख़्शता है, सोचने समझने का ज़ाविया बदल देता है, और इल्मी लियाक़त में पुख़्तगी पैदा करता है-
साबिका ज़माने में तलबा इल्मी ज़ौक़ व शौक़ के मालिक और तालीम में इनहिमाक ज़्यादा रखते थे तो इस की ज़रूरत नहीं थी मगर अब ये चीज़ें हम में कमियाब है इसी वजह से मदारिस में इम्तिहान की ज़रूरत शिद्दत से बढ़ गई, इसी बहाने हम जैसे ग़फ़लत का शिकार तालिबे इल्म वरक़ गर्दानी कर लेते हैं, कुछ किताबें पढ़ लेते हैं )
बस एलान निकलना था कि मस्ती, आज़ादी, ख़ुशी, दिलरुबाई, तंज़ व मज़ाह सब फ़ालिज ज़दा शख्स की तरह सकते में पड़ गया, चेहरे की खुशियाँ मुरझा गई, मस्तियाँ महव हो गई, आज़ादी पस दीवार ज़िन्दां में महबूस हो गई, हमेशा इम्तिहान में गोल गोल अंडे या फ़र्त हैरत में मुबतला कर देने वाला नताइज का ख़ौफ़ क़दम क़दम पर सताने लगा, ख़जालत व शर्मिंदगी से लबरेज़ ख़त घर पहुंचने की दहशत ने ग़फ़लत के पर्दा को कुछ चाक किया और बादिल ना ख़्वास्ता किताबों के इबारत की रुनुमाई और शनासाई होने लगी, जैसे नई नवेली दुल्हन हो जिस से पहली मरतबा शनासाई की गुफ़्तगू हो रही है और तादम हयात हमेशा साथ निभाने का वादा हो रहा हो, बइयनीही यही हाल किताबों का बन गया
और इन से इसी तरह की गुफ़्तगू का मिज़ाज बन गया अब किताबों के साथ बेवफ़ाई नहीं होगी, इन के हुक़ूक़ अदा करने में पेश पेश रहूंगा,
ख़ैर किसी तरह कुछ तैयारी तो हो गई
और एक दिन वो आया जब तमाम अहबाब जामिया में नफ़सा नफ़सी का आलम शुरू हुआ, कोई किसी से गुफ़्त व शुनीद के लिए तैयार नहीं हत्ता कि नज़र उठाने और तांक झांक में भी ख़ौफ़ महसूस करने लगे वो साथी जो हमेशा क़रीब होते थे, उन्होंने अब क़ुर्बत पर माज़रत पेश कर दी और किसी ताऊन से कुल्ली तौर पर दस्त बरदार हो गए, भाई तौसीफ़, भाई आसिम भाई सोहेल कुछ तो रहम करो, मेरे पास आकर बैठो बात चीत करो कुछ सवाल हल करा दो, न गुल रज़ा भाई न आज हम कुछ नहीं बता सकते, मुझे माफ़ कर दो, मैं मजबूर हूं अगर कुछ बताऊं निगरां हज़रात हम पर डोंडों की बारिश करेंगे, मुझे इम्तिहान से महरूम कर देंगे और हमारा यहां जीना दुशवार होगा मुझे माफ़ कर दो निगरां हज़रात के हाथों मजबूर हूं कुछ नहीं कर सकता (मेरे हालात ऐसे हैं कि मैं कुछ नहीं कर सकता) जब सब ताऊन से दस्त बरदार हो जाते हैं और ना उम्मीदी के आसार नुमाया होते हैं तो ख़ुदा से उम्मीदें बढ़ जाती हैं, बस नुसरत इलाही, कुछ अपनी टूटी फूटी तैयारी पर एतमाद करते ख़ामा फ़रसाई शुरू कर दी, बिहमदिल्लाह इम्तिहान के तमाम परचा बज़ग़म खुद काफ़ी हद तक दुरुस्त गए हैं और अच्छे नताइज की उम्मीद भी है,
तकमील इम्तिहान के बाद ज़ेहनी बोरियत व उकताहट को ख़त्म करने, फ़िक्री शऊर जिला को बख़्शने के लिए सियाहत का इरादा किया -
आग़ाज़ सफ़र :
हमारे बरादर मोहतरम क़ारी बदीउज़्ज़मां साहब और रफ़ीक़ान दरस मौलवी तौसीफ़ व आसिम का इसरार हुआ कि बिजनौर आएं तो मैं ने अव्वलन माज़रत कर दी मगर चूंकि इसरार था मज़ीद माज़रत की गुंजाइश नहीं बची, मुझे बिजनौर जाना पड़ा, जाने का एक सबब तौसीफ़ भाई के छोटे भाई ज़काउल्लाह सलमा के तकमील क़ुरान की दुआइया नशिस्त भी थी-
इस लिए मैं ने बिजनौर सफ़र का इरादा कर लिया और दोपहर की चिलचिलाती धूप में निकल गया (चूंकि छुट्टी में अहबाब जामिया को मदरसा वीरान मालूम होता है, दिल भी नहीं लगता, अक्सर अहबाब अपने घर या फिर अपने रिश्तेदार से मिलने चले जाते हैं ताकि इम्तिहान के थकन को दूर किया जा सके और दोबारा फिर तालीम के लिए यकसूई के साथ कमर बस्ता हो सके-
बरें बिना अहबाब बना वक़्त ज़ाए किए रख़्त सफ़र तैयार रखते हैं और इम्तिहान से फ़ारिग होने के बाद सफ़र के लिए चल पड़ते हैं)
मैं भी इसी वजह से निकल गया था -
ख़ैर टेम्पो पर बैठ गया, गपशप लगाते और सोते सोते दो घंटा के बाद बिजनौर चांदपुर की तारीख़ी सरज़मीन पर हमारी रसाई हुई, क़ारी बदीउज़्ज़मां साहब ने मुस्कुराते चेहरों के साथ हमारा इस्तिक़बाल किया और ठंडा वगैरा लेकर आएं, दोपहर की दावत रफ़ीक़ मुकर्रम मौलाना अशरफ़ साहब ने की थी तो फिर उसी के मदरसा में पहला ज़ुहराना तनावल किया, असर बाद मौलाना अशरफ़ साहब ने मदरसा की मस्जिद और कुतुब ख़ाना का तार्रुफ़ कराया-
उन्होंने बताया कि जामिया की मस्जिद तक़रीबन पांच सौ साल पुरानी है, जामिया का कुतुब ख़ाना बेशुमार बेश क़ीमती किताबों से लबरेज़ थी उन्होंने बताया कि इन में से बाज़े कुतुब वो हैं जो कमियाब हैं और हिंदुस्तान में दस्तयाब नहीं तो वो उरदुन व अम्मान से मंगवाई गई है, ये बेहतरीन ज़ौक़ है कि इंसान अपने सरमाया को कुतुब बीनी और किताबों की ख़रीदारी में सर्फ़ करे-
असर बाद एक बुज़ुर्ग आलिम दीन की दूसरी मस्जिद में वअज़ व तज़कीर की मजलिस थी, हम ने वहां भी शिरकत की, इन के क़ीमती नसीहतों को गोश बर आवाज़ होकर समाअत किया, अश्इया क़ारी साहब के पास तनावल किया
अगले दिन तकमील क़ुरान की दुआइया नशिस्त थी उसी की तैयारी में मौलवी तौसीफ़ और हम अहबाब दिन भर मसरूफ़ रहे तमाम असातज़ा, उलमा और कुछ मुताल्लिकीन को प्रोग्राम में शिरकत की दावत का सिलसिला जारी रहा-
ज़ुहर के बाद दुआइया मजलिस शुरू हुई तिलावत कलामुल्लाह और नात रसूल से महफ़िल का आग़ाज़ हुआ, दो हज़रात ने हुफ़्फ़ाज़ की अहमियत पर ख़िताब फ़रमाया, मौलवी आसिम अररिया ने अपनी पुरकशिश आवाज़ और तरन्नुम के साथ तहनीयत नामा पढ़ा, बाद अज़ां हाफ़िज़ ज़काउल्लाह सलमा ने क़ुरान का आख़री हिस्सा पढ़ा फिर रक़्क़त आमेज़ दुआ हुई-
तौसीफ़ भाई की जानिब से पुरलुत्फ़ दावत :
मौलवी तौसीफ़ की जानिब से शानदार पुरतकल्लुफ़ नाश्ता का इंतिज़ाम था साथ ही अश्इया का भी जिस में मछली चावल शामिल थी, लोगों ने शिकम सैर होकर खाना खाया, इस के बाद फिर तौसीफ़ भाई ने ज़काउल्लाह के उस्ताद को खुसूसी इनाम से नवाज़ा और दीगर उस्तादों में मिठाई तक़सीम करवाई -
नुक्ता की बात :
एक बात जो मुझे नामुनासिब लगी वो ये कि मदरसा के असातज़ा और मुहतमिम का हाफ़िज़ ज़काउल्लाह सलमा को कुछ इनाम न देना क्यों कि ये वो मौक़ा होता है जिस में तालिबे इल्म को अपनी पहली कामयाबी पर ख़ुशी होती है अगर इस ख़ुशी में कोई इनाम मिल जाए तो तालिबे इल्म को आगे बढ़ने में हौसला मिलता है और मज़ीद मेहनत की तरफ़ रगबत होती है, और फिर इस हिर्स व तमअ में सही पर मेहनत ज़रूर करता है अगर मैं इसी तरह कामयाब होता रहा तो मुझे इनाम मिलता रहेगा और ये मुशाहिदा और हक़ीक़त भी है)
इतवार की सुबह तक मेरा चांदपुर में क़याम रहा इन दिनों लोगों ने जिन में मदरसा सय्यदना उमर फ़ारूक़ के असातज़ा और मुहतमिम साहब शामिल हैं उन्होंने मुहब्बतों और दुआओं से नवाज़ा, हज़रत क़ारी नज़रुल इस्लाम साहब और मौलाना अशरफ़ साहब की खुसूसी इनायतें और नवाज़िशें रहीं, और मछली चावल की पुरतकल्लुफ़ दावत भी -
अल्लाह इन सब हज़रात को जज़ाए ख़ैर अता फ़रमाए -बक़िया अय्याम की मेज़बानी क़ारी बदीउज़्ज़मां साहब ही अंजाम दे रहे थे क्योंकि वो मेहमान नवाज़ हैं,
हफ़्ता की सुबह मुहब्ब मुकर्रम मौलाना मोहसिन साहब क़ासमी ने फ़ोन किया और हुक्म दिया कि आप देवबंद जाएं कुछ काम है तो बंदा इस के हुक्म की तामील में इतवार की सुबह देवबंद के लिए निकला लेकिन गाड़ी सहारनपुर तक कि थी और देवबंद के लिए अगली गाड़ी शाम के वक़्त थी इस दौरान मज़ाहिर उलूम ही ज़ियारत का इरादा हुआ तो ट्रेन पे ही रफ़ीक़ मोहतरम मौलवी गुफ़रान को पैग़ाम इरसाल किया कि मैं मज़ाहिर उलूम आ रहा रहूं चूंकि कई दिनों से इन का भी इसरार था आप मज़ाहिर उलूम आएं ज़ियारत व मुलाक़ात हुए सालों हो गए हैं तो इन के हुक्म तामील में भी चला गया और मेरे इलाक़ाई साथी मौलवी शोबान मुतअल्लिम मज़ाहिर उलूम वक़्फ़ भी थे-
सहारनपुर हाज़िरी :
सहारनपुर (तारीख़ी शहर अकाबिर उलमा की ख़ानक़ाह, मौलाना ख़लील अहमद सहारनपुरी रह की इल्मी व तदरीसी दरसगाह, शैख़ ज़करिया की तरबियत गाह, शैख़ यूनुस की गुलिस्तां,) पहुंचते ही राक़िम ने अव्वलन इन्हें फ़ोन किया और मज़ाहिर उलूम वक़्फ़ पहुंचा इस की क़दीम इमारतों को देखा, इस का हुस्न ने क़ल्ब को सुकून व फ़रहत बख़्शा, मौलवी शोबान आएं मुलाक़ात हुई फिर दोपहर का खाना हम ने साथ खाया, खाने से फ़राग़त के बाद मज़ाहिर उलूम जदीद की तरफ़ क़दम रंजा हुआ दो चंद क़दम बढ़ाने के बाद हम वहां पहुंच गए (वहां की दिलकश पुरकशिश इमारत जिस पर नज़र पड़ते ही आदमी समझ जाता है कि ये शैख़ यूनुस का गुलशन है, शैख़ आक़िल का ये चमन है ) मौलवी गुफ़रान चूंकि इम्तिहान के थकन की वजह से आराम फ़रमा रहे थे तो बरवक़्त फ़ोन नहीं उठा सके, लेकिन जब नींद से बेदार हुए तो फ़ौरन मेसीज किया और कॉल के ज़रीए माज़रत की पर मैं ग़फ़लत की वजह से नहीं उठा पाया, नमाज़ ज़ुहर हम ने मज़ाहिर उलूम जदीद के क़दीम वसीअ व अरीज़ मस्जिद में अदा की, इस के बाद मैं ने फ़ोन लौटाया तो मुलाक़ात हुई कुछ देर हाल व अहवाल दरयाफ़्त किया गुफ़्त व शुनीद होती रही, मेरे मनअ के बावजूद इस ने कोल्ड्रिंक मंगवा कर मेज़बानी का हक़ अदा कर दिया, फिर वो पढ़ने चले गए मैं सो गया, आंख खुली तो गाड़ी का वक़्त हो चुका था तो मैं ने गुफ़रान भाई को फ़ोन किया तो वो आएं और हमें मुहब्बतों और शफ़क़तों के साथ अलविदा किया तक़रीबन एक घंटे के क़लील वक़्त में देवबंद पहुंचा-
देवबंद हाज़िरी:
देवबंद की सरज़मीन दुनिया में मोहताज तार्रुफ़ नहीं, इस की रोशन तारीख़ और ख़िदमात मुल्क व मिल्लत के लिए एक नमूना है और ये खुद अहले हक़ का तार्रुफ़ भी है, इस ने जहां दीन की नश्र व इशाअत, एहक़ाक़ हक़ व इब्ताल बातिल का काम किया है, वहीं मुल्क की आज़ादी और तरक़्क़ी में बेमिसाल और लाजवाब किरदार अदा किया है ऐसी मुक़द्दस सरज़मीन में मेरी आमद मेरे लिए सआदत थी, मग़रिब से कुछ देर क़ब्ल देवबंद पहुंचा, अहबाब इम्तिहान की तैयारी में मसरूफ़ थे, मैं ने किसी को ज़हमत देना मुनासिब नहीं समझा अलबत्ता मेरे रफ़ीक़ मोहतरम मौलवी मुकर्रम कैफ़ी जो कि बेतकल्लुफ़ साथी हैं इन से राब्ता किया तो वो कमरा में पढ़ रहे थे और कई साथी थे, सब से बात चीत हुई और फिर मग़रिब का वक़्त हो गया हम सब ने मग़रिब की नमाज़ क़ब्रिस्तान वाली मस्जिद में अदा की, फिर टहलने निकल गए मेरे एक इलाक़ाई रफ़ीक़ जिन से दोस्ताना ताल्लुक़ फेसबुक से हुआ था और बहुत ही मुहब्बत करने वाले साथी मौलवी नवाज़िश थे इन से मुलाक़ात करना चाहा इन का भी बारहा इसरार था कि आप इस बार देवबंद आएं तो मुझ से ज़रूर मुलाक़ात करें, मैं मुंतज़िर व मुश्ताक़ हूं आप की ज़ियारत का ख़ैर मैं ने इन से राब्ता किया तस्वीर न देखने की वजह से अजनबियत सी लगी दोनों एक दूसरे को ढूंढते रहे फिर मुलाक़ात हो ही गई, कमरा ले गए खाने की दावत दी चूंकि मौलवी मुकर्रम कैफ़ी ने अपनी दावत से शिकम सैर कर दिया था तो मज़ीद की कुछ खाने की गुंजाइश नहीं थी तो मजबूरन मनअ करना पड़ा, इन के अश्इया कर लेने के बाद हम दोनों बाहर चहल क़दमी करने निकल गए, उन्होंने अपनी ज़िद शुरू कर दी कि आप कुछ ठंडा गरम खा पी लें, कुछ नहीं तो एक आध मिठाई ही खा लें, मैं ने शिद्दत से मनअ कर दिया कि नहीं मोहतरम मैं आज तो कुछ भी नहीं खाऊंगा, दिलचस्प तफ़रीही और तालीमी बात चीत होती रही, वो हमें अपने तालीमी हवाले हमें मुस्तफ़ीद करते रहे- चूंकि अगले दिन इन का इम्तिहान था तो राक़िम ने इन्हें ज़हमत देना मुनासिब नहीं समझा इन से बाद में मुलाक़ात के अज़्म के साथ रुख़सत हो गया -
राक़िम फिर पुराने अहबाब से मिलने शैख़ुल इस्लाम मंज़िल की तरफ़ गया जिन में मौलवी अबू बकर अररिया मौलवी अबू बकर व अबू ज़र देहली शामिल हैं कमरा में गया तो देखा कि अबू बकर देहलवी सलमुल्लूम की वरक़ गर्दानी कर रहे हैं और इनहिमाक बहुत ज़्यादा है, सलाम दुआ करके कमरा की तरफ़ आ गया, मुकर्रम भाई के साथ जाकर बिस्तर इस्तराहत पर सोने के लिए पहुंच गया मुकर्रम भाई तो पढ़ते रहे और राक़िम सो गया सुबह साढ़े सात होते ही तमाम अहबाब इम्तिहान देने चले गए,
राक़िम भी अपने पुराने असातज़ा से मिलने मदरसा अशरफ़ उलूम पहुंच गया तो वहां मौलाना तौहीद आलम साहब से मुलाक़ात हुई, फिर मौलाना मुफ़्ती इनामुल हक़ क़ासमी मुहतमिम मदरसा हाज़ा, मौलाना ज़हीर साहब और निहायत ही मुश्फ़िक़, नर्म गुफ़्तार उस्ताद मोहतरम हज़रत मौलाना मुफ़्ती अखलद साहब से मुलाक़ात हुई और चंद नसीहतें भी कीं, फिर उन्होंने फ़रमाया कि अगर आप क़याम करेंगे तो आप की मेरे यहां दावत है, राक़िम चाहता था कि दावत क़ुबूल करे पर मदरसा के उसूल व ज़ाब्ते पर अमल तालिबान उलूम नबविया के लिए लाज़िम है, इसी लिए मैं ने ये इख़्तियार लिया कि अगर मदरसा की तरफ़ से एलान में नरमी होगी तो ज़रूर शिरकत करूंगा,
ख़ैर अल्लाह की मर्ज़ी ये हुई कि मदरसा में हाज़िरी मंगल को शाम के बजाए बुध की सुबह को टल गई और इस का एलान भी तहरीरी शक्ल में आ गया तो फिर राक़िम मुतमइन हुआ, पीर के दिन ठहर गया और राक़िम ने उस्ताद मोहतरम को ये इत्तिला दी कि राक़िम आज ठहरेगा -
असर बाद अबू ज़र व अबू बकर दोनों भाइयों के हमराह चाय ख़ाना में गया माशाअल्लाह वो चाय ख़ाना ज़ाहिरी व बातिनी हुस्न व लताफ़त से लबरेज़ था अबू बकर भाई ने मेरे लिए और अबू ज़र भाई के लिए तो केले का जूस और अपने लिए चाय मंगवाया, गुफ़्त व शुनीद के साथ हम मशरूबात से लुत्फ़ अंदोज़ होते रहे, बाद अज़ां सैर व सियाहत होती रही फिर मौलवी अबू ज़र व अबू बकर के हमराह लज़ीज़ अश्इया तनावल कर लेने के बाद वो सब इम्तिहान की तैयारी के लिए निकल गए-
इस के बाद मैं ने अपने बहुत ही क़रीबी दोस्त मौलवी असजद नुमानी को मुलाक़ात के लिए फ़ोन किया पर मसरूफ़ियत के सबब वक़्त पर फ़ोन न उठा सके बहर हाल कुछ देर इंतिज़ार के बाद उन्होंने फ़ोन किया और मालूम किया कि आप कहां हैं तो ने राक़िम ने बताया कि मैं फ़लां जगह पर हूं, मौसूफ़ आएं और गुफ़्त व शुनीद करते करते होटल तक ले कर चले गए पर मैं ने साफ़ मनअ कर दिया कि मैं शिकम सैर हूं मज़ीद कुछ खाने की गुंजाइश नहीं रखता वो इसरार करते रहे पर मैं मजबूरी की वजह से मनअ करता रहा और खाने में इस की मुवाफ़िक़त नहीं की, फिर इस के बाद तवील वक़्त तक तक़रीबन एक बजे शब तक बात चीत होती रही घूमते हंसते मज़ाक़ करते करते सरपंच होटल में चाय नोशी से सरफ़राज़ कर ही दिया इतनी लंबी गुफ़्तगू जैसे बिछड़ा यार कई सालों के बाद मिल रहा हो, फिर मैं ने इन्हें मज़ीद ज़हमत नहीं दी और खुद ही आराम गाह की तरफ़ जाने की इजाज़त हासिल की और मैं सोने के लिए शैख़ुल इस्लाम मंज़िल गया और मौलवी अबू बकर को फ़ोन किया उन्होंने अपने पास बिस्तर लगवा दी- फिर बरादरम मौलवी नवाज़िश ने कॉल किया कि अगर कोई दिक्कत हो तो मेरे कमरे में आ जाएं, खटमल होने की वजह से मैं ने इन के हुक्म की तामील की, चुनांचे मैं इन के पास आ गया और बात चीत होते होते तक़रीबन डेढ़ बज गए तो हम सो गए-
सुबह हुई तो देखा कि असजद भाई की तक़रीबन सात आठ कॉल आई हुई थी इन को कॉल लगाया उन्होंने कहा कि जन्नत टी स्टॉल आएं,
तो राक़िम मौलवी नवाज़िश को ले कर वहीं चला गया देखा कि सिर्फ नाम ही जन्नत है वरना इस का नज़्म व नस्क और बिखरे सामान जहन्नुम से कम नहीं था गरचे आग़ाज़ में ये होटल इस्म बा मुसम्मा के क़रीब था मगर अब इस की हालत ना गुफ़्ता बह थी ख़ैर उन्होंने नाश्ता में बिरयानी मंगवाई और असजद भाई की मौजूदगी में हम ने नाश्ता किया इन से कहा कि आप मेरी मुवाफ़िक़त करें पर उन्होंने गुज़श्ता शब का बदला मुझ से लिया और मुवाफ़िक़त से मनअ कर दिया तो मुझे अकेले ही हाथ साफ़ करना पड़ा, फिर कमरे में गया ही था कि अबू बकर भाई आएं उन्होंने कहा कि चलें नाश्ता करें, मैं ने मनअ किया पर माने नहीं और मेरी एक नहीं सुनी और होटल ले कर गए दो बारा नाश्ता करवा दिया -
कमरा में आकर थोड़ी देर नवाज़िश भाई के साथ बात चीत हुई, चूंकि इन्हें भी अपने रिश्तेदार से मिलने देहली जाना था तो मैं वहां से आख़री मुलाक़ात करके असजद भाई के पास गया, उन्होंने पहले से केले तैयार रखे थे ज़बरदस्ती केला खिलवा दिया फिर इन से मज़ीद बात चीत हुई, फिर वो कपड़ा धोने चले गए और मैं इजाज़त ले कर बाज़ार चला गया कपड़े की ख़रीदारी की और इन को घर की तरफ़ रवाना कर दिया-
वक़्त मौऊद पर उस्ताद मोहतरम का फ़ोन आ गया और काम से फ़ारिग होकर इन के घर पे पहुंचा, पुर लुत्फ़ दावत में शरीक हुआ और अलहमदुलिल्लाह दावत बेहतरीन रहा चूंकि कई यक उलमा और भी थे जो शरीक दावत थे, उलमा के साथ दावत में शिरकत का लुत्फ़ ही कुछ और होता है -
आफ़ताब की तपिश के बावजूद मुझे वहां से निकलना पड़ा, सलाम व मुसाफ़हा के उस्ताद मोहतरम ने दुआओं से नवाज़ा और फ़रमाया कि देवबंद जब भी आना हो मुझे ज़रूर मुत्तला करें, ये मेरे तईं उस्ताद जी कि शफ़क़त है अल्लाह तआला हज़रत को इस का नेअमुल बदल अता फ़रमाए -
ख़ैर टहलते टहलते जल्दी से मकतबा अन नूर आया तो देखा कि मकतबा बंद है वहां से कुछ किताबें लेनी थी, चूंकि मकतबत अन नूर के निगरां मेरे उस्ताद मोहतरम मौलाना नदीम इक़बाल साहब हैं जिन की दुआएं, शफ़क़तें और इनायतें इस राक़िम आजिज़ के साथ बराबर रहती है इसी वजह से उस्ताद जी ने मुझ से फ़रमाया कि अगर कभी आप के पास पैसा की गुंजाइश न हो और किताबें लेनी हो तो बिला झिजक किताबें मंगवाएं और पैसा हस्ब सहूलत इरसाल करते रहें और तालीम के हवाले से जो भी ताऊन दरकार हो मुझे ज़रूर याद करें
इस पर और इस जैसे शफ़क़त पर मैं अपने तमाम इस्तातज़ा का तह दिल से शुक्र गुज़ार हूं, मकतबा अन नूर के निगरां और मेरे उस्ताद जी से पहले दो मरतबा मुलाक़ात हो चुकी थी,
इस लिए वहां से जल्दी दोबारा असजद भाई के पास वापस आ गया थोड़ी देर क़याम के बाद वहां से इजाज़त ले कर मुकर्रम भाई के पास आया वहीं लेटा तो आंख लग गई, ऐन वक़्त पर आंख खुली तो देखा नौचंदी का वक़्त हो गया और भाई मुकर्रम नहीं हैं पस जल्दी से बग़ैर इत्तिला के निकलना मुनासिब समझा, जल्दी से निकल कर ऑटो पर सवार हुआ और स्टेशन पहुंचा थोड़ी देर के इंतिज़ार पर यक लौता नौचंदी आ गई और सवार हुआ अलहमदुलिल्लाह सीट मिल गई,
ये सफ़र नामा लिखते लिखते सफ़र अपनी मंज़िल तक पहुंच गया और स्टेशन पर फ़रोकश होने के बाद बहुत से अहबाब जामिया से मुलाक़ात हुई, फिर शब 11 बजे के क़रीब जामिया में हमारी हाज़िरी हुई -
मुहतमिम साहब से मुसाफ़हा हुआ, और फिर अश्इया तनावल किया जो कि रास्ते में होटल से ही अनज़र भाई ने लिया था
ख़ैर अलहमदुलिल्लाह ये सफ़र निहायत ही हुस्न व ख़ूबी, ख़ैर व आफ़ियत के साथ अपने हुस्न अंजाम को पहुंचा
अल्लाह तआला हमारे तमाम अहबाब और मेज़बान को मेहमान नवाज़ी का बेहतरीन सिला अता फ़रमाए, और इन की ज़िंदगी को खुशियों से भर दे आमीन सुम्मा आमीन